युग का आरम्भ इंसान के जन्म और उसकी इंसानियत से हुआ . प्रेम,विश्वास,मर्यादा,रिश्ते,सम्मान ...... इनके समुचित संयोग असंयोग से युगों की अपनी एक विशेषता हुई .पर नारी ....सतयुग से कलयुग तक ,पर कोई बदलाव नहीं
...सतयुग से कलयुग तक की यात्रा अंजू चौधरी की आँखों से .......

अपनों का साथ


हर डग पर हर पग पर जाने अनजाने ही ,
एक बूंद गिरती है और बिखर जाती है |
आज ओशो की किताब पढ़ते हुए जब इन पंक्तियों  पे नज़र पड़ी तो मन में अचानक एक सवाल उठा कि इस धरती पे जन्म और मृत्यु का सिलसिला क्यों है ?क्यों हर युग में एक औरत का जन्म किसी कामना पूर्ति के लिए हुआ है ?  क्यों हर युग में सीता ,अहिल्या और द्रौपदी जैसी नारियों को ही हर कसौटी के लिए चुना गया ? क्यों पुरुष प्रधान समाज में नारी को ही  केन्द्र बिंदु की भांति सबके बीच ला खड़ा कर दिया जाता है ? ऐसे अनेक सवाल है जो आज मेरे मन में तूफ़ान मचा  रहे है और इनका उत्तर ही तो मेरी समझ में नहीं आ रहा .
कहते है खाली दिमाग विचारों की जननी होती है और लिखने वाला तो वैसे ही बहुत सोचता है हो सकता है कि रसोई में काम  करते हुए या कॉफी बनाते हुए ,दूध के साथ साथ मेरे विचार भी मेरे ही भीतर उबल रहे थे ,जिनका बाहर आना जरुरी था | एक तुलनात्मक  सोच ने मेरे इस लेख को जन्म दिया और ये लेख किस कसौटी पे रखा जाएगा ये मैं भी नहीं जानती .

उगता सूरज सुबह का ,प्राची लाल हो गई .पक्षियों के गाने फूट पड़े ,बंद कलियाँ खिलने लगी -- सब सुन्दर है !सब अपूर्व है ,फिर भी इस क्षण अगर मेरा मस्तिष्क आंदोलित हो उठे तो मैं क्या करूँ ,ऐसा क्यों हो रहा है | जहाँ हृदय के प्रश्न खत्म होते है वहाँ से अनुभव की यात्रा शुरू होती है और ये ही बात मैंने बहुत वक्त से महसूस कर रही हूँ कि युगों युगों से नारी अपने ही आसपास के पुरुषों से छली जा रही है ,युग कोई भी रहा हो नारी का जीवन कठिन था ,है और आने वाले वक्त में भी ऐसा ही कठिन रहेगा ...वक्त और युग कोई भी हो नारी के जीवन में कोई परिवर्तन  होने वाला नहीं है | सब से सुना है कि सतयुग की शुरुवात  शिव और सती के मिलन से हुई थी ,पर उस युग में सती अपने पिता द्वारा ही छली गई ,जो शिव से ब्याह के बाद पिता द्वारा उचित सम्मान ना मिलने की वजह से उसे अपने आप को यज्ञ की अग्नि के हवाले करना पड़ा |सबसे सर्वश्रेष्ठ सतयुग को ही माना गया है कि इस युग में सबसे अधिक धार्मिक और सात्विक कार्य किए गए है ,पर इसी युग के अंत में माता अहिल्या का भी ज़िक्र है . कहा जाता है कि माता अहिल्या बहुत सुन्दर थी और ऋषि गौतम से ब्याही हुई थी ,गौतम ऋषि को वेदों का बहुत ज्ञान था और माता अहिल्या सुंदरता के लिए जानी जाती थी . देवता इंद्र का  माता अहिल्या की सुंदरता ने मन मोह लिया था ,वो उसे किसी भी प्रकार पाना चाहते थे ,पर ऋषि गौतम से डरते थे .एक रोज़ जब गौतम ऋषि स्नान करके लौटे तो उन्होंने इंद्र देवता को अपनीकुटिया से बाहर निकलते हुए देखा और बिना कुछ सोंचे समझे और कुछ जाने बिना अपनी पत्नी अहिल्या के लिए मन में गलत धारणा बना ली ..इंद्र के वहाँ से जाते ही उन्होंने अपनी पत्नी अहिल्या को श्राप दिया कि तुम पत्थर की चट्टान बन  जाओ .ये कैसी धारणा है एक आदमी की ,जो बिना सुने ,बिना समझे अपनी बुद्धि से कुछ भी समझ ले और बिना सोंचे समझे अपनी पत्नी को श्रापित कर दे युगों तक ,अजीब सी विडम्बना है इस दुनिया की .फिर त्रेतायुग में राम के वनवास के साथ सीता भी उनके साथ वन गई उन्ही के साथ रही ...रावण हरण के बाद जब सीता को राम लेके आए तो भी उनकी अग्निपरीक्षा के बिना सीता को स्वीकार नहीं किया गया ...ये कैसा विश्वास है और एक धोबी के कहने मात्र  से कि एक रात बाहर रही हुई औरत को वो स्वीकार नहीं करेगा राजा राम की तरह ...इतनी सी बात पर राम ने सीता को अकेले उस वक्त जंगल में छोड़ने का आदेश दे दिया  जब वो माँ बनने वाली थी ,ये सोंचे बिना की उसका इस वक्त क्या और कैसे होगा... हम सीता की बात तो करते हैं पर  लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की बात किए बिना तो रामायण भी अधूरी सी लगती है . उर्मिला की तपस्या तो सीता जी से भी कठिन है ब्याहता होते हुए उसने वनवास की पीड़ा को झेला था ...अपने पतिलक्ष्मण के वनवास जाने पर अकेले रहना कितना पीड़ा दायक होता है ये कोई उर्मिला से ही पूछे .और फिर आया   द्वापर युग...यहाँ भी द्रौपदी को देखे बिना ,समझे बिना एक औरत जो कि रिश्ते में उसकी सास थी ,माँ समान थी उन्होंने ही द्रौपदी को पाँचो भाइयों में बाँट  लेने का आदेश  दे दिया ,एक औरत की इतनी दुर्गति ,इतना अपमान कि एक औरत और पाँच पति ???? ये समय का कैसा खेल है औरत ही औरत की दुश्मन बन गई .क्या कभी द्रौपदी ने सोचा  होगा कि एक समय में एकाधिक पुरुषों के साथ शयन करना होगा  ...कितनी लज्जा और दुःख की बात रही होगी उसके लिए ,उसके सिवा इस दुःख  को और कौन अनुभव कर सकता है .एक साथ पंच पतियों का स्पर्श उफ्फ्फ्फ्फ़ | कभी कभी इसके लिए उसने कितने अपमान औरव्यंग्यों का सामना भी किया होगा |
कहते  हैं कि अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित का जिस दिन अभिषेक हुआ ,उसी दिन से कलयुग का प्रारंभ हुआ और आज इस कलयुग में ....जब सब कुछ धर्म के विपरीत हो रहा है तो हम कैसे इस बात को सोच सकते है कि आज के वक्त एक नारी का सम्पूर्ण सम्मान होता होगा .जबकि कवियों की कवितायों में औरत के रूप को उसके सौंदर्य को वर्णित करते है ,सुंदरी ,अप्सरा और  गजगामिनी जैसे शब्दों से
उसे नवाज़ा जाता है | वहीँ दूसरी और दिनों दिन औरत के साथ बदसलूकी की घटनाएँ तेज़ी से बढ़ रही है | एक युग में सीता अपना दुःख ,लज्जा ,अपमान छुपाने के लिए धरती की गोद में चली गई ,तो सती ने अपनी आहुति अग्नि में दे दी ,द्रोपदी की वजह से महाभारत का युद्ध हुआ ...ये लांछन लेकर वो कैसे अपने जीवन को जी पाई होगी |
आज का युग ...और आज के युग के लोगों की दिल के साथ काली सी सोच ...जो औरत को आज भी भोग्या की नज़र से ही देखते है .मैं ये नहीं कहती कि हर आदमी ,समाज गलत होता है पर इतने लोगों की भीड़ में अगर हँस मिलते हैं तो वहाँ बगुलों की भी कमी नहीं है जो मुहँ में राम और बगल में छुरी लिए घूमते हुए मिल जाएंगे .अगर मैं ये कहूँ कि नारी का जीवन कठपुतलियों जैसा है तो ये कोई अतिशयोक्तिपूर्ण बात नहीं होगी क्यों कि हम सब देखते और समझते है की उसे जाने अंजाने मनमानी  डोर से नचाया जाता है जो  अदृश्य हो कर भी उसके मन-मस्तिष्क को काबू किए रहती है .भले ही आज के समाज में ऐसी औरतो की तादाद बढ़ रही है जो अकेले रहना पसंद करती है ,पर फिर भी उसकी आत्मनिर्भरता किसी ना किस के संग बंधी होती है ,चाहें वो पिता हो ,भाई  या कोई ऐसा दोस्त जो उसके करीब हो क्यों कि वो पुरुष की भांति सर्वथा  आत्मनिर्भर नहीं होती इसलिय उसके भीतर के हर बड़े तूफ़ान बवंडर वो चाहें विचारों के हो ,वासनाओं के या उसी के शोर गुल के जो उसके भीतर चलते है ...कोई कहें या ना कहें वो अपने आप ही एक कठपुतली बन नाचने को मजबूर हो जाती है .अपने आप से लड़ना जितना मुश्किल है उतना ही आसान  संसार और उसकी बातों से भागना है ,खुद को हठयोगी साबित करने के चक्कर में कब वो अपना नुकसान कर जाती है ये उसे भी बहुत देर से पता चलता है .एक औरत के जीवन में पढ़ लिख जाने के बाद भी जब तकलीफ कम नहीं होती और उसी दुखो के चलते उसके जीवन की बदलियां घनी से घनी होती जाती जाती है तो उसका खड़ा पर से भी विश्वास डगमगाने लगता है |युगों से नारी को देवी का दर्ज़ा देकर उसके मन की इच्छायों को दबाने का जो सफल प्रयास किया गया वो आज भी कायम है ,अपने मन की करने से पहले अनेको अनेको प्रश्नों से घिरी नारी स्वतः  अपना जीवन जीना भूल जाती है पर मैं अपने मन की ये बात जरुर  कहूँगी कि औरत कोई देवी नहीं अपितु वो एक साधारण मानव के रूप में खुद को देखना अधिक पसंद करती है ताकि वो भी एक सुलभ सा जीवन जी सके अपने मन के पवित्र रिश्ते के साथ भले ही वो रिश्ता  पति-पत्नी का ,भाई बहन का ,पिता पुत्री का या फिर सखा-सखी का हो ......बिना किसी स्वार्थ ,बिना किसी ढकोंसले के .अंत में मैं अपनी बातरखने के लिए ये ही लिखना  अधिक उचित समझती हूँ कि इस पृथ्वी पर सब अपना-अपना जीवन जीने के लिए आए हैं तो उन्हें उनके हिस्से का जीवन जीने देना चाहिए |

अंजु ( अनु )



भले ही यकीं ,अब करो ना करो तुम
मैंने जो कहना था ,कह दिया
कहाँ तक सही है ,और कहाँ तक गलत
अब क्या होने वाला है ,किसको पता है
क्या हो गया है ,क्या हो रहा है
मैंने बहुत कुछ ,कम में इसमें लिखा है ||
शायद इसीलिए अंजू ने कहा - 

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते .. Older Post - अपनों का साथ

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ..

वो कागज़ कि कश्ती ...

वो बारिश का पानी ...

कितन अच्छा तो वो बच्चपन का

खेलना ...मस्ती भरे दिन थे ..मौजो की थी राते

ना कुछ सोचना....न कोई चिंता ...

मस्त मौला सा था सब वातावरण

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ....


क्यों हम बड़े हो गए है ..

दुनिया की रीत में खो गए है

क्यों हम भी मशीनी हो गए है

खो गया है भावनायो का समंदर ...

क्यों अपने भी अब बेगाने हो गए है

क्यों यहाँ बेगाने अपने हो गए है ...........


अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ..

कम से कम दिल के सचे तो होते

अब देखो झूठ से लबालब हो गए है ..

चापुलूसी के घने जंगल में गहरे खो गए है

भटक गए है काया और माया के जाल में

यहाँ आके सब खूबसूरती के दंगल में फंस गए है


अच्छा होता हम बच्चे ही रहते .....

लड़ते झगड़ते पर साथ तो रहते

पर अब तो सब्र का पैमाना यू छलकता है

किसीकी छोटी सी बात भी नश्तर सी लगती है

तोडी सब्र की सारी सीमायें ...

हर दोस्त को दुश्मन बनाते चले गए ...


अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ....

खेलते वो खेल जो मन में आता हमारे

कम से कम दिलो से तो ना खेलते थे हम ..

कभी छिप जाते ...कभी रूठ जाते

कम से कम संगी साथी हमहे

कही से भी ढूंढ़ तो लाते..

मानते हमहे साथी मिन्नतें करके

परअब क्या किसी से रूठना .और क्या है किसी को मनाना

कौन है अब जिस है अपना बनाना ...

हम पहले भी अकेले थे....और

अब भी अकेले है ......

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ........


आप वटवृक्ष पर आज की आखिरी प्रस्तुति का आनंद लीजिये और मुझे अनुमति दीजिये । कल उत्सव में अवकाश 
का दिन है इसलिए फिर मिलती हूँ 17 दिसंबर यानि सोमवार को सुबह 10 बजे परिकल्पना पर । 

तबतक के लिए शुभ विदा !

7 comments:

  1. अंजू जी का सुन्दर लेख पढवाने के लिए आप दोनों का आभार

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  2. आलेख की शुरुआत बहुत अच्छी ......स्त्री विमर्श को केन्द्र में रखा गया है .....जो की आज की हर रचना में उठ रहा है ....पर इमानदारी से कहें .....तो सिर्फ लेखन अभिव्यक्ति हेतु .....अन्यथा कहीं भी तो कुछ नया नही ...सटीक उदाहरणों को लिया है अंजू जी ने ....जो बदलाव को प्रेरित सोच का अंजाम है ...आभार रश्मि जी ...रविंदर जी ....बहुत अच्छा लग रहा है इस उत्सव में शामिल होकर ....

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  3. वो कागज़ कि कश्ती ...वो बारिश का पानी ...कितन अच्छा तो वो बच्चपन काखेलना ...मस्ती भरे दिन थे ..मौजो की थी राते

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  4. बहुत बढ़िया आलेख..आभार रश्मि जी..

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  5. अंजू जी ने नारी के सम्मान पर अपनी बात बहुत सशक्त तरीके से रखी है , लेकिन उस लेख की शुरुआत में उनहोंने लिखा है कि नारी का जीवन कठिन था , है और रहेगा
    मैं पूरी तरह सहमत हूँ कि नारी का जीवन कठिन था , मैं ये भी मानता हूँ कि उनका जीवन कठिन है लेकिन साथ ही मुझे इस बात पर पूरा विश्वास है कि ये जीवन कठिन रहेगा नहीं | मुझे नहीं मालूम कब सतयुग था कब कलयुग , या कि सतयुग श्रेष्ठ है या कलयुग लेकिन मुझे इतना मालूम है कि विश्वास बड़ी चीज है | अगर आप कुछ परिवर्तन लाना चाहते हैं तो सबसे पहले ये अटल विश्वास बहुत जरूरी है कि परिवर्तन होगा |
    अंजू जी पूरी विनम्रता के साथ मेरा आपसे अनुरोध है भूत और वर्तमान तो लगभग बीत चुके लेकिन भविष्य को लेकर जरूर आशान्वित रहें | (ये सिर्फ मेरी निजी राय है)

    सादर

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