अब हम पहुँच चुके हैं परिकल्पना उत्सव के चौथे दिन के अंतिम पड़ाव पर जहां ऋता शेखर 'मधु' की रचना शीलता से मैं आपका परिचय कराऊँ उससे पहले महादेवी की कुछ पंक्तियाँ : 




बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!
नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में,
प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में,
प्रलय में मेरा पता पदचिन्‍ह जीवन में,
शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में
कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं...

नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ,
शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ,
फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ,
एक होकर दूर तन से छाँह वह चल हूँ,
दूर तुमसे हूँ अखंड सुहागिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं...

आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के,
शून्य हूँ जिसके बिछे हैं पाँवड़े पलके,
पुलक हूँ जो पला है कठिन प्रस्तर में,
हूँ वही प्रतिबिम्ब जो आधार के उर में,
नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं...

नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी
त्याग का दिन भी चरम आसिक्त का तम भी,
तार भी आघात भी झंकार की गति भी,
पात्र भी, मधु भी, मधुप भी, मधुर विस्मृति भी,
अधर भी हूँ और स्मित की चांदनी भी हूँ
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महादेवी जी की इन पंक्तियों को साकार करती हैं ऋता शेखर 'मधु' अपने विचारों के सौजन्य से .... भूमिका की ऊँगली छोड़ बढ़ते हैं उनकी रचनाओं की उद्दात लहरों में .... प्रत्येक लहर में कुछ अलग सा है =
तुम 'टफ़' नहीं हो

एक लड़की थी जिसका चुप-चुप सा चेहरा मुझे बहुत आकर्षित करता था|ऐसा लगता था जैसे सबके बीच होकर भी वह वहाँ पर नहीं है|अपने बारे में वह बातें भी नहीं करती थी| बाद में पता चला कि हैवान पति के चंगुल से किसी तरह उसकी जान बच पाई थी|उस वक्त उसके दो बच्चे थे जो दो और तीन साल के थे|बच्चों के लिए वह नौकरी कर रही थी| उस लड़की के सामने पहाड़ सी ज़िन्दगी पड़ी थी|उसके घर वाले चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले किन्तु वह नहीं मानी|
घर आने पर मैंने उस लड़की को केन्द्र में रखकर एक कविता लिखी और उसे पर्स में रख लिया|दो दिनों बाद ऐसा संयोग लगा कि वह मेरे पास ही बैठी थी|मैंने उसे बताया कि मैं थोड़ा बहुत अपनी कलम चलाती रहती हूँ और इंटरनेट पर डालती हूँ|
मैंने उससे कहा कि मैंने एक नई कविता लिखी है,जरा पढ़कर बताओ कैसी बनी है|
यह कहकर मैंने उसे वह कागज पकड़ा दिया|मैं लगातार उसे देख रही थी क्योंकि मैं उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहती थी|वह पढ़ने लगी...

नारी
सीधी लौ बनी
गर्व से तनी
स्थिरता से
तिल तिल कर जलती रही
रौशनियाँ लुटाती रही
आँधियों को आना था
आकर गुजर गईं
मद्धिम होती लौ को
अपने ही बलबूते
संभालती रही
पर जलती रही|

आँधियों की कसक लिए
लौ ने फिर से सर उठाया
रौशनी को तेज बनाया
मौसम बदले
हालात बदले
ख़यालात बदले
उपमा मिली
अडिग पर्वत की
उस पर्वत के भीतर झाँको
क्या कह रहा है वह
इसे तो आँको
कण-कण में बिखरा
सिर्फ धूल है वह
शौर्य के सूरज से पूछो
कितनी निराश किरणों को
झेला है उसने
खिले बसंत से पूछो
पतझर की पीड़ा भी
दबी मिलेगी
बहती नदी से पूछो
रोड़े पत्थरों से गुजरती
कितनी लहुलुहान है वो
खिलखिलाते वन उपवन से पूछो
कैक्टसों को भी पाला है उसने|

जीवन में कभी घबड़ाना नहीं
जिन्हें जीने का मकसद बनाया
बस उनके लिए ही जीती जाओ
दुनिया के लिए तुम ‘टफ’ हो
पर मैं जानती हूँ
तुम ‘टफ़’ नहीं हो
क्योंकि, तुम एक नारी हो
क्योंकि, तुम एक माँ हो|

उसकी आँखों से टपकते आँसुओं ने मेरी पूरी कविता ही धो डाली थी|मैंने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा और हमारे बीच एक रिश्ता बन गया|अब बहुत सारी बातें हैं जो वह मुझसे शेयर करती है| एक दिन मैंने उससे पूछा ...तुमने दूसरी शादी क्यों नहीं की|
‘दीदी, इससे मेरी जिन्दगी तो सँवर जाती पर बच्चों से उनकी माँ छिन जाती’’...फिर मैंने कुछ नहीं कहा...शायद वह सही थी|
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दूजा धन लागे भला,खरच किया बिन मोह-दोहा ग़ज़ल

माता-पिता वृद्ध हुए, पुत्र समंदर-पार
बना आज दस्तूर यही, छिन जाता आधार|

बरगद की छाया बने, छौने पर दिन-रात
कुलाँचे भर भाग चला, भूला ममता-प्यार|

बूढ़ी काया है विकल, लगी द्वार पर आँख
कुल-दीपक के वास्ते, देखे पंथ निहार|

दूजा धन लागे भला, खरच किया बिन मोह
निज- धन पर गाँठ सत्तर, माया मोह अपार|

तन्हा राहों पर मिले, चन्द कदम का साथ
बिन अहं के साथ चलो, यह जीवन का सार
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बहू, घर चलो...


रात बीतने को आई किन्तु वकील साहब की आँखों में नींद नहीं थी| सारी सात वे अँधेरे में ही कमरे की छत की ओर आँखें गड़ाए ताकते रहे| कभी करवट बदलते, कभी उठकर बैठ जाते| लग रहा था बहुत ही उधेड़बुन में थे| जिन्दगी में अक्सर दोराहों का सामना हो जाता है जिनमें किसी एक रास्ते को चुनना बहुत कठिन लगता है| किन्तु निर्णय तो लेना ही पड़ता है उन्हें, जो सभ्य और संस्कारी होते हैं| जिनमें दूरदर्शिता नहीं होती उनके सामने कभी दोराहे नहीं आते...जीवन जैसे चल रहा है, बस ठीक है|

    वकील साहब का एक सुखी परिवार था| सुंदर पत्नी और शादी के लायक एक बेटा था जिसे वे बहुत प्यार करते थे| गाँव में अपनी खेती-बाड़ी थी, प्रैक्टिस भी खूब चलती थी| धनाढ्‌यों में गिनती होती थी उनकी| महल जैसा घर और घर में नए मॉडल की दो गाड़ियाँ थीं, एक उनके लिए और दूसरी उनके सुपुत्र के लिए| वकील साहब दिन भर किताबों में उलझे रहते| बेटे की देख-रेख का सारा भार उनकी पत्नी पर था| नवाबों की तरह वह पल रहा था| जब भी पैसे की जरूरत होती माँ इन्कार नहीं करती| बेटे से सख्ती नहीं कर पाती थीं| नतीजा यह रहा कि वह बिगड़ैल नवाब के रूप में जाना जाने लगा| किसी तरह से उसने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की थी| आकर्षक डीलडौल, घुँघराले बाल, गोरा चिट्टा था| बचपन से कभी अभाव नहीं जाना था इसलिए पैसे को पानी की तरह बहाता था| गुस्सा तो नाक पर ही रहता| जब वह किसी तरह की कोई नौकरी में नहीं जा सका तो वकील साहब ने बिजनेस में लगा दिया| यहाँ वह सफल हुआ, क्योंकि उस बिजनेस में दबंग की ही जरुरत थी|
   इतने धनी-मानी घर में अपनी बेटी को देने के लिए कई पिता उत्सुक थे| खूब रिश्ते आने लगे| अन्त में हर प्रकार से जिसे योग्य समझा गया वह निहारिका थी| लड़की की सारी खूबियों से सुशोभित...अर्थात लम्बी , गोरी, घर के कामकाज में निपुण, सुशील और आज्ञाकारिणी| सभी खुश थे| वकील साहब की पत्नी बड़े ही शौक से शादी की खरीदारियाँ कर रही थीं| निश्चित समय पर विवाह संपन्न हुआ| घर में खूब रौनक आ गई| इस घर में आकर निहारिका भी अपने भाग्य सराह रही थी|

  सुंदर पत्नी पाकर वकील साहब का बेटा भी प्रसन्न था| हमेशा दोस्तों के साथ घूमने के बजाय घर में ही रहता| किन्तु अपने बेटे के स्वभाव को लेकर वकील साहब सदा सशंकित रहते| बहू की हर जरूरत और सुख सुविधा पर नजर रखते| बहू भी सास-ससुर की सेवा में तल्लीन रहती| समय बीता...वकील साहब और उनकी पत्नी दादा-दादी बने| पोते को गोद में ले फूले न समाते थे| दिन बीतने लगे|

एक दिन वही हुआ जिसका डर था...सभी लोग डायनिंग टेबल पर बैठे खाना खा रहे थे| बेटे ने निहारिका को गरम पराठा लाने को कहा...तभी मुन्ना रोने लगा| निहारिका उसे संभालने चली गई| नवाबज़ादे ने इसे अपनी तौहीन समझा और खाने की प्लेट जमीन में पटक दिया| माता-पिता तो उसके गुस्से से वाकिफ़ थे ही, किन्तु निहारिका के लिए पति का यह रूप नया था| वह सहम गई और रोने लगी| वकील साहब ने भी खतरे की घंटी को समझा| किसी तरह से बहू को समझाया| निहारिका बच्चे के कारण उसपर अधिक ध्यान नहीं दे पाती थी| इस कारण वह रईसजादा अधिकतर समय घर के बाहर बिताने लगा और बुरी  संगति में पड़ने लगा|

  उसके बाद इस तरह की घटनाएँ अक्सर घटने लगीं| मैके के अच्छे संस्कार लेकर आई थी, इसलिए घर को अखाड़ा नहीं बनाना चाहती थी| वह हरसंभव चुप रहने का प्रयास करती| निहारिका की चुप्पी वकील साहब के बेटे की हिम्मत बढ़ाती गई| अब वह कभी- कभी निहारिका पर हाथ भी उठा देता| यह निहारिका को बहुत बुरा लगता फिर भी सास- ससुर का ख्याल करके चुप रह जाती क्योंकि उनसे उसे कोई शिकायत नहीं थी|

  गुस्सैल तो वह था ही, किन्तु हर हमेशे  मार-पीट का माहौल निहारिका को बरदाश्त नहीं होने लगा| अब तो वह किसी किसी रात घर भी नहीं आता था| वकील साहब की चिन्ता बढ़ती जाती थी| बेटे को समझाना चाहा, लेकिन उसका मन तो कहीं और उलझ गया था| वह निहारिका की ओर देखना भी पसन्द नहीं करता था| एक बार निहारिका का मन हुआ कि वह सब कुछ छोड़छाड़ कर वापस मैके चली जाए किन्तु संस्कार यह कदम उठाने की इजाजत नहीं दे रहे थे|

  एक दिन तो हद ही हो गई...वह नशे में धुत लड़खड़ाता हुआ आया और पत्नी को घर से निकल जाने का आदेश दिया| वह सकते में आ गई| उसने ससुर जी की ओर देखा| वकील साहब ने उसे समझाने की कोशिश की किन्तु वह कहाँ समझने वाला था| उसने उनके साथ भी बदतमीजी से बात की| निहारिका कुछ बोलना चाह रही थी तो नवाबज़ादे ने उसे जोर से धक्का मारा| अचानक हुए इस प्रहार को वह झेल नहीं पाई| गोद में मुन्ना भी था| दोनों ही औंधे मुँह गिर पड़े| उसने किसी तरह मुन्ने को तो बचा लिया किन्तु खुद उसका सर जमीन से टकरा गया| सर से खून निकलने लगा| मुन्ना बेतहाशा रोए जा रहा था|  माँ ने कुछ कहना चाहा तो उन्हें भी चुप कर दिया| परिस्थिति बेकाबू हो गई थी| वकील साहब बेटे की इस हरकत से बहू के सामने शर्मिन्दगी महसूस कर रहे थे| समय पर बेटे पर अंकुश न लगाने का परिणाम सामने था| उन्होंने डॉक्टर को बुलाया और बहू की मरहम पट्टी करवाई| डॉक्टर से उन्होंने झूठ बोल दिया कि वह सीढ़ियों से गिर गई है|

  अभी तक निहारिका ने अपने मैके में कुछ नहीं बताया था| किन्तु वह पढ़ी-लिखी लड़की थी| जहाँ तक हो सका उसने सहनशीलता दिखाई...किन्तु कब तक? यह सवाल उसके जेहन में बार-बार उठने लगे| मुन्ने के भविष्य का सवाल भी सामने था|

     उसने घर छोड़ने का फैसला ले लिया| अश्रुपूरित नजरों से उसने सास-ससुर से विदाई ली| वकील साहब के पास कहने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे|

   निहारिका पिता के घर के दरवाजे पर खड़ी थी| उसे विश्वास था कि पिता जी उसका साथ देंगे| काँपते हाँथों से उसने कॉलबेल बजाया| दरवाजा पिता ने ही खोला| बेटी के सर पर बँधी पट्टी देखकर उनका कलेजा मुँह को आ गया| अनुभवी आदमी थे, पल भर में ही सारा माजरा समझ गए| बेटी को गले से लगा लिया|पिता का स्नेहिल स्पर्श पाते ही वह फूट पड़ी| उसने रोते-रोते सबकुछ बताया| पिता ने निर्णय सुना दिया कि अब वह उस हैवान के पास वापस नहीं जाएगी|

     इधर सारी दुनिया के लिए लड़ने वाले वकील साहब को अचानक सामने दोराहा नजर आने लगा| एक तरफ बेटा था तथा दूसरी ओर बहू और पोता| इसी उधेड़बुन में उन्हें सारी रात नींद नहीं आई थी| बेटा को घर छोड़ने के लिए कहें , दिल यह मानने को तैयार नहीं था| बहू जिसने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया, उसे कैसे बेघर कर दें| उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था| बहुत सोच-विचार कर उन्होंने फैसला ले लिया| पत्नी मानने को राजी न थी| उसे भी समझाया|

  वकील साहब बहू के मैके पहुँचे| निहारिका और उसके पिता ने आवभगत में कोई कसर नहीं रखा| वकील साहब ने कहा-“ बहू, घर चलने के लिए तैयार हो जाओ|”

निहारिका ने पिता की ओर देखा|

पिता ने कहा-“ क्षमा कीजिए वकील साहब, मैं आपकी इज्जत करता हूँ किन्तु बेटी को न भेजूँगा| मुझे उसकी जान पर खतरा नजर आ रहा है| शार्ट टेम्पर्ड व्यक्ति कब क्या कर बैठे, इसका कोई ठिकाना नहीं| आप यहाँ आते-जाते रहें, पर निहारिका को न भेजूँगा|”

   “मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, ऐसा कुछ न होगा| मेरा घर बहू और पोते का है, अपने बेटे को मैंने घर से निकाल दिया है| निहारिका सम्मान के साथ वहाँ रहेगी|”

   निहारिका के पिता अवाक् रह गए| ऐसा भी होता है कि बहू के सम्मान के लिए इकलौते बेटे को घर से निकाल दें| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दाँतों तले ऊँगली दबाकर रह ग‌या| वकील साहब बहू और पोते को आदर के साथ घर ले आए| बहू अपने स्वभाव के अनुरूप घर को सँभालती हुई मान मर्यादा से रहने लगी| पोते को उन्होंने बहुत अच्छी शिक्षा दी| अब वह एक ऊँचे पद पर कार्यरत था| एक बार वकील साहब के बेटे ने घर आने की कोशिश की किन्तु पिता से दो टूक जवाब सुनकर वापस लौट गया|

धीरे-धीरे वकील साहब का शरीर वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा था| निहारिका और मुन्ना जी जान से उनकी सेवा करते| कभी किसी भी काम के लिए उन्हें दोबारा नहीं बोलना पड़ता| वकील साहब की पत्नी बेटे के लिए दुखी रहती थी पर बहू और पोते से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी| समय बीता, मौत आनी थी, आई| वकील साहब का निधन हो गया| निहारिका निःशब्द रोए जा रही थी| उसे यही लग रहा था कि यदि उन्होंने सहारा नहीं दिया होता तो पिता के घर में वह जी जाती किन्तु एक बेचारी की तरह जिन्दगी हो जाती| माता-पिता बेटी को घर में रखकर समाज की आलोचना का शिकार बनते सो अलग| 

  अब दाह-संस्कार की बारी आई|वकील साहब का बेटा भी पिता के अन्तिम दर्शन के लिए मौजूद था| मुखाग्नि वही देना चाहता था| वकील साहब ने कह रखा था कि मरने के बाद उनकी वसीयत तुरत पढ़ी जाए और उस अनुसार ही काम किया जाए| वसीयत में यह लिखा था कि दाह-संस्कार का काम पोते के हाथो ही संपन्न हो| पत्नी के निधन के उपरांत सारी जायदाद निहारिका के नांम लिखी गई थी| जिसने भी सुना वकील साहब के न्याय पर दंग रह गया| अपने बेटे को छोड़ दूसरे की बेटी को सहारा देकर वकील साहब ने समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था|

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सिसकी की कहानी सिसकी की जुबानी

सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं...खुशियों में हम नाचते हैं...गाते हैं...पर कभी कभी किसी के व्यवहार से मन आहत होता है तो हमारे अन्दर एक सिसकी फँस जाती है...वह फँसी हुई सिसकी कुछ कहना चाहती है...

मै हूँ,
हृदय में छुपी
एक छोटी सी सिसकी
वक्र निगाहें देख
बाहर निकलने में ठिठकी
कभी अश्रु बन टपकती
कभी नि:श्वास बन निकलती
कभी निर्विकार
सूनी आँखों से ताकती
कभी चेहरे पर
उदासी बन उभरती
कभी बेबस बन तड़पती
खुद को समझा लेती
हृदय पर ठेस लगती
दर्द महसूस करती
‘आह’ बन कराहती
अन्दर ही अन्दर
उमड़ घुमड़
रक्तचाप बढ़ाती
मैं, छोटी सी सिसकी|

छुपी छुपी उब जाती
मुस्कान की चुनर ओढ़
बाहर निकल टहलती,
महफ़िल में गर मैं होती
हंसी के फ़व्वारों में
चुपचाप बैठी रहती,
दिल में तुफ़ान लिए
कई कई सवाल लिए
मुस्कुराहटों की फुहार लिए,
अपनों की निगाहों से
छुप नहीं पाती
स्नेह- स्पर्श से
सदा पिघल जाती
मैं, छोटी सी सिसकी|

जहाँ ऐसा तलाशती
जहाँ क्रंदन कर पाती
चीख चीख कर
आर्तनाद गुंजाती
आँसुओं के सैलाब में
रुदन की नौका पर
बहकर विलीन हो जाती
बोझिल मासूम हृदय को
हल्का कर पाती,
मैं, नन्हीं सी सिसकी|
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बड़े सयाने,फिर भी मासूम

किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा|वापसी के रास्ते में सोचा,अपने सुपुत्र की गृहस्थी भी देखती चलूँ जहाँ दो-तीन बैचलर बच्चे एक फ्लैट लेकर रहते हैं और जौब करते हैं|बस, ये सृजन उसी वक्त का है-

बड़े सयाने
फिर भी मासूम
असमय बड़े होते ये बच्चे
आधुनिकता की त्रासदी कहूँ
या समय की माँग
ममता की छाँव छिन गई है
देख उन्हें दिल भर आता है
सिर्फ फोन का ही नाता है|

बड़े सयाने
पर ज्यूँ सर रखा गोद में
लगा, लेटा है
वही पाँच साल का
मासूम बच्चा
अपनी हर बात कहने को आतुर
एक अव्यक्त उपालम्भ था
आँखों में चमका इक मोती
दिख न जाए माँ को
इसका भी ख्याल था
पर माँ तो माँ है|
कहो या न कहो
नम आँखों को लाख छुपाओ
बातों से भी खूब रिझाओ
किन्तु उस हँसती व्यथा को
छुपा नहीं सकते
क्यूँकि माँ तो माँ है|

कुक का बना
खाते ये बच्चे
कुछ दिन ही सही
मिलेगा ममता का खाना
एक संतुष्टि
दिखती चेहरे पे
आफिस के लज़ीज़ खाने
अब नहीं मन भाते|

ज्यूँहि, चलने का वक्त आया
आँखों में उदासी तिर आई
बड़े यत्न से उसे छुपाया
पर माँ तो माँ है|
हाथ झुके थे
चरण-स्पर्श को
आशीर्वाद का हाथ भी
रख दिया था सर पे
पर क्यूँ कुछ देर
उठ न पाए
डर था
अश्रु –बिन्दु दिख न जाए
पर माँ तो माँ है|

उम्र इतनी भी बड़ी नहीं
विवाह बंधन में बँध सके
अकेलेपन को झेलते
खुद को सँभालते
बड़े सयाने
फिर भी मासूम
असमय बड़े होते ये बच्चे|

१) मधुर गुंजन  http://madhurgunjan.blogspot.in/
२) हिन्दी हाइगा  http://hindihaiga.blogspot.in/

अब विदा लेने का समय आ गया है, लेकिन एक प्रस्तुति अभी शेष है । तो चलिये चलते हैं वटवृक्ष पर जहां मधुरेंद्र मोहन पाण्डेय उपस्थित हैं अपनी कविता मोबाइल लेकर ......यहाँ किलिक करें 

इसी के साथ मैं रश्मि प्रभा , आप सभी से विदा लेती हूँ कल सुबह 10 बजे परिकल्पना पर पुन: मिलने के वादे के साथ । 

10 comments:

  1. आपने बिल्‍कुल सही कहा ऋता जी का लेखन बहुत ही उत्‍कृष्‍ट है कहानी एवं रचनाएं बहुत ही अच्‍छी लगी ... बधाई सहित आभार

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  2. ऋता दी :) एक लाजबाब रचनाकार... साहित्य के हर विधा में गजब का दखल रखती हैं... हर रचना अपने में लाजाबाब :)

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  3. ऋता जी का लेखन तो है ही लाजवाब ………सुन्दर कहानी के साथ सुन्दर रचनायें

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  4. पहली कविता "तुम टफ नहीं हो" बहुत ही अच्छी लगी , बहुत सुंदरता से दिल जीतने की कला सिखाती |
    वकील साहब की कहानी ही बहुत अच्छी लगी , बहुत सामान्य शब्दों को प्रयोग करते हुए एक मजबूत चित्र का सृजन | और किसी भी रचना की ये सबसे बड़ी विशेषता है कि वो पाठक के सामने चित्र बना पति है या नहीं |

    सादर

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  5. ॠिता जी को पढ़ना सदैव एक सुखद अनुभव रहा है..बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचनाओं के चयन के लिए आभार...

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  6. …सुन्दर कहानी के साथ बहुत सुन्दर रचनायें...ऋता ्की लेखन शैली बहुत ही लाजवाब है इसमें कोई शक नही..

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  7. आपके अद्भुत लेखन को नमन,बहुत सराहनीय प्रस्तुति.बहुत सुंदर
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  8. साहित्य की विभिन्न विधाओं का बहुरंगी लेखन !

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  9. ऋता दी जितना प्यारा और खूबसूरत दिल रखती हैं, उतनी ही सुन्दर और भावप्रवण उनकी रचनाएँ भी होती हैं...।

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आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

 
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