समय बदल जाते है, मौसम बदल जाते हैं मगर यादें अमिट छाप छोड़ जाती है वक़्त की आती -जाती रफ्तार पर । उत्सव के दो दिन बीत चुके हैं और आज है तीसरा दिन, चलिये चलते हैं मंच की ओर जहां अपनी कविता के साथ उपस्थित हो रही हैं संध्या शर्मा :

एक पैसे में भरपेट खाने जैसा सुख है भावनाओं को सिरहाना बना गहरी नींद सोना और सपने देखना .... अभिव्यक्तियाँ संजीवनी बन जाती हैं - 

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अभिव्यक्ति की सुंदरियां  
भावों के कालजयी मंच पर
हंसती, मुस्कुराती,गाती 
ख़ुशी से थिरक रही हैं 
मंद, तेज़ चाल चलती 
शब्दों की रंग बिरंगी 
चूनर पहन इठलाती 
करती फिर रही हैं 
प्रतिभा का प्रदर्शन  
रूप का जादू दिखाती 
सजीली मुस्कान लिए 
आभार प्रकट करती...

हमारे मन की व्याकुलता 
झंझावातों की तपिश 
नयनो में उमड़ता 
अस्तित्व का ज्वार
झूठी प्रसंशा से भरी 
करतल ध्वनियाँ 
इतनी पीड़ा के घाव
उनका ठाठ-बाट
ऐश्वर्य-वैभव सब कुछ 
बनाये रखेगा 
क्या उनका भी हृदय 
हो जायेगा विह्वल
द्रवित मन बचा सकेगा 
उनकी यह सुन्दरता...

क्या तब भी ये सुंदरियां 
बाहर से जैसी दिखती है 
अन्दर भी वैसी ही होंगी ?????

दर्द अभिव्यक्ति के रास्ते खोजता है .... बूंद बूंद शब्दों संग बह जाता है .....
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लालटेन की लौ को तेज कर के जैसे ही वो अपनी किताबें उठाकर चटाई पर बैठी , उसे अपने बाप की आवाज सुनायी दी - " क्या नौटंकी कर रही है ! जा , चौके में जाकर अम्मा का हाथ बंटा , कुछ घर का काम काज सीख | तुझे पढ़ा कर हमें बैरिस्टर नहीं बनाना | "
" जी , बाबू जी |"
वो उठी , उसने एक नजर आँगन में बेफिक्र होकर खेलते अपने भाई की ओर देखा और मन मसोसकर चौके की तरफ बढ़ दी--

मेरी आजादी गुम सी है,
दो प्यासी आँखें नम सी हैं ,
मुझको भी तो उड़ना है ,
इस पिंजरे को हटवा दो ,
पंख मेरे भी लगवा दो ||

जो तुमसे पाया , उतने में
अब तक सारी खुशियाँ देखीं ,
खिड़की से नजरें दौड़ाकर ,
अब तक ये दुनिया देखी ,
मुझको खुद कुछ पाना है ,
जो बेड़ी हैं वो खुलवा दो ,
पंख मेरे भी लगवा दो ||

मुझमें भी तुम सी हिम्मत है ,
मेरे भी ऊंचे अरमां हैं ,
उस पार मुझे भी जाना है ,
दीवार खड़ी है , गिरवा दो ,
पंख मेरे भी लगवा दो ||
..............
सुख गुल्लक में खनकती यादों का -
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शब्द धारा: एक गुल्लक ज़िंदगी... (मधुरेंद्र मोहन पाण्डेय)


आज फिर एक दिन का खर्चा है
आज फिर एक नोट कम होगा।
ज़िंदगी की सुनहरी गुल्लक से
खाली से दिन का बोझ कम होगा।

ऐसे खर्चे है रोज दिन का नोट
हाथों से बस फिसल गया जैसे।
आदतन खूब संभाला उसको,
वक्त का नोट उड़ गया जैसे।

फिर से गुल्लक को लेके हाथों
उम्र का वजन तौलना होगा।

नोट तो रोज़ खर्च होता है
बदले में मिल गए मुझे चिल्लर
शाम को घर पे अपनी गुल्लक में
डाल देता हूं यादों के चिल्लर

और मैं देखता हूं गुल्लक को
आज तो कुछ वजन बढ़ा होगा।

ऐसा ही एक वक्त आएगा
नोट सारे ही खर्च होंगे जब,
सिर्फ यादों के ढेर से सिक्के
मेरी गुल्लक में ही रहेंगे तब

खूब खनकाउंगा मैं वो गुल्लक
उससे सांसों का बोझ कम होगा।

सारे नोटों के खर्च होने पर
सिक्को से भर चुकी हुई गुल्लक।
वक्त की बेरहम सी ठोकर पर
फूट जाएगी सुनहरी गुल्लक।

सारे चिल्लर बिखर से जाएंगे
दोस्तों को भी तजुर्बा होगा।

फूटते ही सुनहरी गुल्लक के
लोग लूटेगें उसकी कुछ बातें,
कुछ की आंखों से अश्क छलकेंगे
कुछ के दिल को मिलेगी सौगातें।


एक गुल्लक मिलेगी मिट्टी में
सबके हाथों में कुछ ना कुछ होगा।


परिकल्पना पर मैं रश्मि प्रभा मिलती हूँ एक मध्यांतर के बाद, तबतक वटवृक्ष पर आप पढ़ें : 
गीता पंडित की कविता .....भाव-कलश: क्यूंकि मैं एक स्त्री हूँ ! 

9 comments:

  1. एक गुल्लक मिलेगी मिट्टी में
    सबके हाथों में कुछ ना कुछ होगा।
    ...
    मेरी आजादी गुम सी है,
    दो प्यासी आँखें नम सी हैं ,
    ...
    दर्द अभिव्यक्ति के रास्ते खोजता है .... बूंद बूंद शब्दों संग बह जाता है .....
    तीनो ही रचनाओं का चयन एवं प्रस्‍तुति लाजवाब
    बहुत-बहुत बधाई आप सभी को
    आभार सहित

    सादर

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  2. शानदार रचनायें सहे्जी हैं।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचनाओं का संगम है!

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  4. ये सुंदरियाँ- "कम शब्दों में बड़ी बात कहने में सफलता |"
    गुल्लक- "नए अंदाज में प्रस्तुति , बहुत अच्छी लगी विशेषकर शुरुआत |"
    सादर

    उत्तर देंहटाएं

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