क्रम-दर-क्रम आखिकार हम प्रवेश कर ही गए परिकल्पना उत्सव के पांचवे दिन के आखिरी पड़ाव में। मध्यांतर से पूर्व  दुनिया समाप्त होने की संभावनाओं की जब बात हुयी तो अब क्यों न ईश्वर को सामने लाया जाये, क्योंकि ईश्वर ने तो जवाब गढ़े - पर खुद प्रश्नों के सैलाब में फंस गए :


अपने जवाबों को खुद ही तलाशता 

प्रश्नों के सैलाब में बुरी तरह फंस गया 
वह इंसानों की तथाकथित बेबसी से निर्विकार हो गया है 
अदालत - त्रिदेव की 
कटघरे में - त्रिदेव 
वकालत - त्रिदेव की 
गवाह - त्रिदेव 
न्यायकर्ता - त्रिदेव :) 
कई दिनों महीनों वर्षों से कृष्ण अपराधी बन खड़े हैं, भक्त दुःख से भ्रमित सवालों की पाण्डुलिपि लिए खड़ा है वंदना गुप्ता एक प्रयास के साथ 

यूँ ही नहीं पहेलियाँ बुझाओ

सुना है 

प्रेम पहला द्वार है

जीवन का 

सृष्टि का

रचयिता का

रचना का

सृजन का

मोक्ष का 

मगर उसका क्या

जो इनमे से 

कुछ ना चाहता हो

ना जीवन

ना सृजन

ना मोक्ष

और फिर भी

पहुँच गया हो

दूसरे द्वार पर

या कहो 

अंतिम छोर पर

आखिरी द्वार पर

मगर ये ना पता हो

अब इसके बाद 

क्या बचा

कहाँ जाना है

क्या करना है

कौन है उस पार

जिसकी सदायें 

आवाज़ देती हैं

जिसे ढूँढने 

हर निगाह चल देती है

जिसे चाहने की 

हर दिल को शिद्दत होती है

जिसे पाना 

हर रूह की चाहत होती है

ये अंतिम द्वार के उस पार

कौन सा शून्य है

कौन सा अक्स है

कौन सा शख्स है

कौन सा तिलिस्म है

कौन सी उपमा है

कौन सी अदृश्य तरंग है

जो चेतनाशून्य कर देती है

जो ना दिखती है 

ना मिलती है

फिर भी अपनी 

अनुभूति दे जाती है

सब खुद में समाहित करती है

क्या वो प्रेम का लोप है

क्या अंतिम द्वार पर 

प्रेम दिव्यजीवी हो जाता है 

या फिर प्रेम 

सिर्फ पहले द्वार पर ही रुक जाता है

अंतिम द्वार पर तो 

प्रेम का भी प्रेम में ही विलुप्तिकरण  हो जाता है

और सिर्फ 

अदृश्य तरंगों में ही प्रवाहित होता है 

और वहाँ

प्रीत ,प्रेम और प्रेमी तत्वतः एक हो जाते हैं ..........निराकार में परिभाषित हो जाते हैं

कौन है उस पार ...........एक आवाज़ तो दो

बताओ तो सही ...........अपने होने का बोध तो कराओ 

यूँ ही नहीं पहेलियाँ बुझाओ .........ओ अंतिम छोर के वासी !!!


तो प्रश्न उठता है फिर पैदा ही क्यों किया वो बीज

जग नियंता 

नियंत्रित किये है 
सारी सृष्टि
मगर "मैं" अनियंत्रित है
अस्फुट है 
बेचैन है 
खानाबदोश ज़िन्दगी आखिर 
कब तक जी सकता है
हाँ ........."मैं" वो ही 
जिसका अंकुर 
सृष्टि के गर्भ में ही उपजा था
और बह रहा है 
तब से निरंतर
अपने साथ काम ,क्रोध और लोभ 
की आंधियां लेकर 
और देखता है जहाँ भी उपजाऊँ भूमि
बीज रोपित कर देता है
जो वटवृक्ष बन पीढियां तबाह कर देता है
युगों को अभिशापित कर देता है
और आने वाली पीढियां
उसे ढ़ोने को मजबूर हो जाती हैं
क्योंकि "मैं" रुपी 
चाहे रावण हो या कंस या दुर्योधन
हमेशा युगों पर प्रश्नचिन्ह छोड़ गया
जिसकी सलीब आज भी 
सदियों से ढ़ोती पीढियां 
उठाने को मजबूर हैं
क्योंकि नहीं मिल रहा उन्हें
अपने प्रश्नों का सही उत्तर
नहीं हुई ऐसी खोज जो कारण 
की जड़ तक जा सके
बस लकीर के फकीर बने 
सवालों को गूंगा किये
हम एक अंधी दौड़ में चल रहे हैं 
और कोई यदि सवाल करे 
तो उसे ही पागल घोषित कर रहे हैं
ऐसे में "मैं" तो पोषित होना ही है
क्योंकि उसके पोषक तत्त्व तो यही हैं 
क्या "मैं " को ज़मींदोज़ करने के लिए
हर बार प्रलय जरूरी है ?
ये "मैं" की परिपाटी बदलने के लिए
क्या उसकी टहनी के साथ 
दूसरी शाखा नहीं जोड़ी जा सकती
जो "हम" के फूलों से पल्लवित हो 
और सृष्टि कर्ता का सृजन सफल हो 
या ये उसकी सरंचना का वो छेद है 
जिसे वो स्वयं नहीं भरना चाहता 
क्योंकि 
मदारी के खेल में बन्दर को तो सिर्फ उसके इशारों पर नाचना होता है 
जो ये नहीं सोच पाता 
क्या असर पड़ेगा इसका द्रष्टा पर 
फिर सुना है
सृजनकर्ता को नहीं पसंद 
"मैं" का अंकुर 
तो प्रश्न उठता है फिर पैदा ही क्यों किया वो बीज ??????????

इंसानी जीवन के अनगिनत पहलुओं में जिसे सबसे निचले पायदान पर खड़ा होना चाहिए उसे हम सबसे उच्च स्थान दे देते हैं और वो ही उसके विनाश का कारण बनता है सुनते आये हैं देखते आये हैं मगर अनदेखा करते रहे हैं और उसी के कारण विनाश का तांडव नृत्य होता रहता है ये सब जानते बूझते भी क्या कारण है जो इन्सान हो या प्रकृति "मैं" के अंकुर से मुक्त नहीं हो पाती इन्हीं प्रश्नों के जवाब ढूंढ रही है आज प्रकृति की हर कड़ी ्।क्यों "मैं " को जन्म दिया गया जब इश्वर को "मैं " का अभिमान ही नहीं है पसंद ..........कोई न कोई तो कारण होगा क्योंकि इससे मुक्त इन्सान नहीं हो पाता तो  जो साधना के मार्ग पर अग्रसित हो तो उसके लिए तो इससे बचना और भी मुश्किल हो जाता है ऐसे में कौन सा अवलंबन है जो मैं से बचा सके और जीवन्मुक्त बना सके और व्याकुल ह्रदय जग नियंता से ही कर बैठता है यही प्रश्न कि जब तुम्हें पसंद ही नहीं है तो उसे पैदा ही क्यों किया और उसमे सारी  सृष्टि को लगा दिया ? क्या खुद को परिभाषित करने के लिए या अपने अहम् को पोषित करने के लिए क्योंकि तुम भी तो यही चाहते हो कि भक्त हो या ज्ञानी सब कुछ छोड़कर तुम्हारी शरण में आ जाये तो तुम उसका योगक्षेम वहन करोगे तो क्या ये अहम् नहीं हुआ तुम्हारा ...........एक ऐसा प्रश्न जिसकी भूलभुलैया में जग नियंता भी फंस जाता है लेकिन भक्त उसका उत्तर खोज ही लेता है और शायद यही भक्त और भगवान का खेल होता है जिसमे "मैं" होकर भी नहीं रहता और हम में तब्दील हो जाता है .


क्योंकि अगर होती सच्चाई तो देते जवाब जरूर ...

इबारतों के बदलने का समय यूँ ही नहीं आता 

एक जूनून से गुजरना पड़ता है इतिहासकारों को 

और तुमने मुझे विषय सबसे दुरूह पकड़ा दिया 

देखती हूँ 

कर जाते हो कानों में सरगोशी सी और 

मैं ढूंढती रहती हूँ उसके अर्थ 

क्या कहा था 

कहीं गलत तो नहीं सुन लिया 

क्या चाहा  तुमने 

कभी कभी पता ही नहीं चलता 

आज भी तुमने कुछ कहा था 

तब से बेचैन हूँ 

पकड़ना चाह  रही हूँ सिरा

बात प्रेम की थी 

तुम्हारे खेल की थी 

कैसे भूलभुलैया में डाला है तुमने 

मुझसे प्रेम करो 

मगर मैं न तुम्हें चाहूँगा 

और तुम करो निस्वार्थ प्रेम 

वैसे सोचती हूँ कभी कभी 

यदि निस्वार्थ प्रेम करना ही है

तो तुमसे ही क्यों 

सुना है प्रेम प्रतिकार चाहता है 

प्रेमी भी चाहत की परिणति चाहता है 

अच्छा बताओ तो ज़रा 

कैसा खेला रचाया है तुमने 

बस मुझे खोजो 

कोई चाहत न रखो 

निस्वार्थ चाहो 

अब मेरी मर्ज़ी 

मैं मिलूँ या नही 

दिखूं या नहीं 

ये ज्यादती नहीं है क्या 

कोई तुमसे करे तो ............

मगर तुमने प्रेम किया ही नहीं कभी 

किया होता तो दर्द को जाना होता 

और हम मूढ़ हैं न कितने 

बिना तुझे देखे तेरे दीवाने हो गए 

और अब तुम अपनी चलाते हो

अजब मनमानी है 

तुम पर कोई है नहीं न 

कान उमेठने के लिए 

एक तरफ भुलावे में रखते हो 

कर्त्तव्य को ऊंचा बताते हो 

दूसरी तरफ कहते हो 

मानव मात्र से प्रेम करो 

और जब वो प्रेम करता है 

तो उसे कहते हो 

आपस में प्रेम नहीं 

दिव्य प्रेम करो 

अरे ये क्या है 

है न तुम्हारी दोगली नीति 

कैसे संभव हो सकता है ऐसा 

जो संस्कार बचपन से पड़े हों 

उनसे कैसे छूट सकता है इन्सान 

जिसने सदा प्रेम का पाठ  पढ़ा हो

कैसे इन्सान से विमुख हो सकता है 

और सिर्फ तुम्हें चाह सकता है 

जिसे कभी देखा नहीं 

बस सुना है तुम्हारे बारे में 

क्या प्रेम खिलवाड़ है तुम्हारे लिए 

की तुम्हें तो बिना देखे करे 

और जिनके साथ 

बचपन से लेकर एक उम्र तक

तक साथ निभाया हो 

उन्हें भूल जाए उनसे प्रेम न करे

और उस पर  कहते हो

अब सबसे मुख मोड़ लो 

क्या इतना आसान हो सकता है 

सब जानते हो तुम्

बस हमें ही गोल गोल 

अपनी परिधि में घुमाते हो 

लगता है तुमने ऐसा 

अपनी सहूलियत के लिए किया है 

तभी सामने नहीं आते 

बस भरमाते हो 

दिव्य प्रेम के नाम पर 

क्योंकि सामने आने पर 

प्रेम का उत्तर प्रेम से देने पर 

घाटे  का सौदा कर लोगे 

और रात  दिन सबकी 

चाहतों को  पूरा करने में ही लगे रहोगे

आम इन्सान की तरह 

और तुम्हें आम इन्सान बनना पसंद नहीं है 

तभी खास बने रहते हो 

डरते हो तुम 

और देखो हमें 

कैसे दो नावों की सवारी कराते हो 

सोचो ज़रा 

दो नावों का सवार कब सागर के पार उतरा है 

ये जानते हो तुम 

इसलिए अपने मायाजाल में उलझा रखा है 

और खुद तमाशा देखते हो 

ओ उलझनों के शहंशाह 

या तो बात कर 

सामने आ 

और प्रेम का अर्थ समझा 

मगर यूँ कानों में 

हवाओं में 

सरगोशियाँ मत किया कर 

नहीं समझ पाते हम 

तेरी कूटनीतिक भाषा 

अगर इंसानी प्रेम से ऊंचा तेरा प्रेम है 

तो साबित कर 

आ उतरकर फिर से धरती पर

और दे प्रेम का प्रतिकार प्रेम से 

रहकर दिखा तू भी हमारी तरह 

दाल रोटी के चक्कर में फंसकर 

प्रेम से और फिर दे प्रेम का उत्तर 

और करके दिखा निस्वार्थ प्रेम 

गोपी सा प्रेम, राधा सा प्रेम, मीरा सा प्रेम

तब रखियो ये चाहत 

कि  प्रेम करो तो निस्वार्थ करो 

या दिव्य प्रेम करो 

कभी कभी तुम्हारी ये बातें कोरी  भावुकता से भरी काल्पनिक लगती हैं

क्योंकि अगर होती सच्चाई तो देते जवाब जरूर .....

कृष्ण मुस्कुरा रहे - क्योंकि गीता में सारे उत्तर हैं - अमिट और विस्तृत !


इसी के साथ मैं रश्मि प्रभा आपसे विदा लेती हूँ  और आपको ले चलती हूँ वटवृक्ष पर जहां 




आप कविता का आनंद लें और मुझे अनुमति दें ताकि कल के कार्यक्रमों को सहेज सकूँ .........

इसी के साथ शुभ विदा !

7 comments:

  1. सच ही है ...मन के सवाल बहुत है और उनका जवाब ...आज तक कुछ नहीं

    खूबसूरत प्रस्तुति

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  2. बस लकीर के फकीर बने
    सवालों को गूंगा किये
    हम एक अंधी दौड़ में चल रहे हैं
    और कोई यदि सवाल करे
    तो उसे ही पागल घोषित कर रहे हैं
    ऐसे में "मैं" तो पोषित होना ही है
    क्योंकि उसके पोषक तत्त्व तो यही हैं
    क्या "मैं " को ज़मींदोज़ करने के लिए
    हर बार प्रलय जरूरी है ?
    sarthal lekhan Vandana ji ka ...

    abhar Rashmi di ..

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  3. मुझे और मेरी रचनाओं को परिकल्पना पर स्थान देने के लिए हार्दिक आभार रश्मि जी

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  4. सवालों के घेरे में कैद श्रीकृष्ण...भक्तों पर ही छोड़ देते हैं सवालों के उत्तर...वक्त के साथ साथ सभी प्रश्नों के जवाब मिल ही जाते हैं|

    वन्दना जी रचनाएँ सदा झकझोरती हैं...आभार संकलित रचनाओं के लिए|

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  5. अच्छी रचनाएं पढ़वाने के लिेए आभार....

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  6. आपके शीर्षक को तीनों ही कविताएं अपने-अपने तरीके से बखूबी सजा रही हैं |
    मैं यहाँ एक बात और कहना चाहूँगा - पहली कविता को लिखने का ढंग मुझे बहुत पसंद आया , छोटी-छोटी पंक्तियाँ , विरामों का ध्यान आदि इन कुछ बातो ने कविता को पढ़ना बहुत आसान , रुचिकर और रसपूर्ण बना दिया है |

    सादर

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  7. वंदना जी का लेखन हमेशा ही प्रभावित करता है ... सभी रचनाएं सशक्‍त लेखनी का परिचय देती हुई उत्तम बन पड़ी हैं
    आभार आपका इस प्रस्‍तुति के लिये

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