पाप और पुण्य,सही और गलत की परिभाषा क्या है ? प्रायः आम लोग (आम की संख्या अत्यधिक है) पाप को स्त्री के शरीर से जोड़ते हैं, इज्ज़त भी ....... अजीब है आम लोगों की सामाजिक व्यवस्था !!! पाप और पवित्रता एक निजी सोच है और इस निजी सोच में हर दिन एक अहिल्या का जन्म होता है ! यदि हादसे से इज्ज़त चली जाती है तो क्यूँ सिर्फ स्त्री की ?!? पढ़ाने से पहले एक बात कहूँ - ऊँगली प्रायः उस पर उठती है जो चुप रह जाता है और ख़ामोशी का परिणाम गंगा ...... समझ रहे न ?

आइये आज इस विषय पर कुछ रचनाओं से मैं आपको मुखातिब करवाती हूँ =

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जरूरी नहीं है कि,
आप पढ़ें
इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता
और एकदम संस्कारित होते हुए भी,
देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां।
आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए,
वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय,
तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्लील रचना?
यूं भी,
जिस तरह आपके संस्कार जरूरी नहीं हैं मेरे लिए,
वैसे ही,
आपका इसका पाठक होना
और फिर
लेखक को दुत्कारना भी नियत नहीं किया गया है,
साहित्य के किसी संविधान में।
यह दीगर बात है कि,
हमेशा यौनोत्तेजना के समय नहीं लिखी जातीं
अश्लील कविताएं!
न ही पोर्न साइट्स के पेजेज़ डाउनलोड करते हैं,
स्खलित पुरुषों के थके हाथ।
कई बार,
भूख से बोझिल लोग,
पीते हैं एक अदद सिगरेट
और दुख से हारे मन,
खोजते हैं शराब में शांति।
ऐसे ही,
बहुत पहले बताया था,
धर्म के एक पुराने जादूगर ने,
संभोग में छिपे हैं
शांति और समाधि के मंत्र।
उन तपते होंठों में,
फंसाकर अपने प्यासे लब,
`वह' भी तो हर बार नहीं तलाशता,
काम का करतब।
कभी-कभी कुछ नम, कुछ उदास,
थके हुए थोड़े से वे होंठ,
ले जाते हैं मेडिटेशन-मुद्रा में।
मंथर, बस मुंह से मुंह जोड़े
कुछ चलते, कुछ फिरते अधर...।
कोई प्रेमी क्यों चूमता है अपनी प्रेयसी को?
प्रेयसियां आंखें मूंद उस मीठे हमले की क्यों करती हैं प्रतीक्षा?
इन कौतूहलों के बीच, सत्य है निष्ठुर --
पुरुष का सहज अभयारण्य है स्त्री की देह
और
मैथुन स्वर्गिक,
तब तक,
जिस वक्त से पहले मादा न कह दे,
तुम अब नर नहीं रहे
या कि
मुझे और कोई पुरुष अच्छा लगता है!
एक पहेली हल करने के लिए ज़िलाबदर हो गए हैं विक्रमादित्य
और तड़ीपार है बेताल,
जिसे दुत्कारते हैं तमाम पंडित
नर्क का द्वार कहकर,
उसमें प्रवेश की खातिर,
किसलिए लगा देते हैं,
सब हुनर-करतब और यत्न?
औरत की देह जब आनंदखोह है
तब
वह क्यों हैं इस कदर आपकी आंख में अश्लील?

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अस्मितास्वयंवर(डॉ पूनम गुप्त)
स्वयंवर
 जो हुआ था अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका का
सीता और द्रोपदी का
क्या वास्तव में स्वयंवर था क्या?
अगर था,
तो क्या थी स्वयंवर  की परिभाषा?

स्वेच्छित वर चुनने का अधिकार
अथवा
कन्या का नीलामी युक्त प्रदर्शन!
जिसमे इच्छुक उमीदवार
धनबल की अपेक्षा
 लगाते थे अपना बाहू-बल
दिखाते थे अपना पराक्रम और कौशल
और जीत ले जाते थे कन्या को
भले ही उसकी सहमति हो या न हो.

तभी तो उठा लाया था  भीष्म
उन तीन बहनों को
अपने बीमार,नपुंसक भाइयों के लिए
और अर्जुन ने बाँट ली थी याज्ञसेनी
 अपने भाइयों में बराबर

वास्तव में ही अगर
स्वयंवर का अधिकार
नारी को  मिला होता
तो अम्बा की 
आत्म(हत्या) का बोझ
इतिहास न ढोता.
महाविध्वंस्कारी,महाभारत का
 महायुद्ध न होता
और हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास
 कुछ और ही होता .
हाँ! कुछ और ही होता .


Sudhinama: गृहणी(साधना वैद)

मैंने उसे देखा है
मौन की ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरी
सपाट भावहीन चेहरा लिये वह
चुपचाप गृह कार्य में लगी होती है
My Photoउसके खुरदुरे हाथ यंत्रवत कभी
सब्जी काटते दिखाई देते हैं ,
कभी कपड़े निचोड़ते तो
कभी विद्युत् गति से बच्चों की
यूनीफ़ॉर्म पर प्रेस करते !
उसकी सूखी आँखों की झील में
पहले कभी ढेर सारे सपने हुए करते थे ,
वो सपने जिन्हें अपने विवाह के समय
काजल की तरह आँखों में सजाये
बड़ी उमंग लिये अपने पति के साथ
वह इस घर में ले आई थी !
साकार होने से पहले ही वे सपने
आँखों की राह पता नहीं
कब, कहाँ और कैसे बह गये और
उसकी आँखों की झील को सुखा गये
वह जान ही नहीं पाई !
हाँ उन खण्डित सपनों की कुछ किरचें
अभी भी उसकी आंखों में अटकी रह गयी हैं
जिनकी चुभन यदा कदा
उसकी आँखों को गीला कर जाती है !
कस कर बंद किये हुए उसके होंठ
सायास ओढ़ी हुई उसकी खामोशी
की दास्तान सुना जाते हैं ,
जैसे अब उसके पास किसीसे
कहने के लिये कुछ भी नहीं बचा है ,
ना कोई शिकायत, ना कोई उलाहना
ना कोई हसरत, ना ही कोई उम्मीद ,
जैसे उसके मन में सब कुछ
ठहर सा गया है, मर सा गया है !
उसे सिर्फ अपना धर्म निभाना है ,
एक नीरस, शुष्क, मशीनी दिनचर्या ,
चेतना पर चढ़ा कर्तव्यबोध का
एक भारी भरकम लबादा ,
और उसके अशक्त कन्धों पर
अंतहीन दायित्वों का पहाड़ सा बोझ ,
जिन्हें उसे प्यार, प्रोत्साहन, प्रशंसा और
धन्यवाद का एक भी शब्द सुने बिना
होंठों को सिये हुए निरंतर ढोये जाना है ,
ढोये जाना है और बस ढोये जाना है !
यह एक भारतीय गृहणी है जिसकी
अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है ,
कोई ज़रूरत हो सकती है ,
कोई अरमान हो सकता है ,
यह कोई नहीं सोचना चाहता !
बस सबको यही शिकायत होती है
कि वह इतनी रूखी क्यों है !


मेरा मन: मै गृहणी हूं(प्रीति सुराना)

सुन सखी...! 
तू क्यों करे कोई पश्चाताप???

माना कि तू गृहणी है,
कभी सोचना तू भी ऐसा,
मैने जैसा सोचा था,...
मैं भी तो एक गृहणी हू,
तुझ जैसा ही जीती थी,
सब के सुख दुख सहती,
अपने सपने और इच्छाओं को,
खुद मे समेटे घुटती थी,
मन के भीतर पीड़ा को सहकर,
आत्मसमर्पण करती थी,

एक दिन मन बहुत ही व्यथित हुआ,
मन में अंतर्द्वंद चला,

लगा तालाब की परिधी में ठहरा हुआ पानी हूं मै,
काश मै नदी सा बह पाती,
पर आखिर में जाकर सागर मे ही तो मिल जाती,

सोचा मै पिंजरे का कैद पंछी हूं
काश गगन में उड़ जाती,
पर छोड़ के सपनो का घरोंदा नया घोंसला कंहा बनाती,

माना कि दर्द के भूकंप भी झेले,
सुख के भी तो लगे थे यंहा मेले,
माना सही बीहड़ वन सी तनहाई,
तो कभी विपदाओं के अंधड़ भी आए,

मुश्किल अंधेरों से बाहर आए,
पर तेज तपन भी सह नही पाए,
कितने कितने उतार चढ़ाव, 
पर्वत और घाटी से आए,

सैलाब भी तो आया था प्यार का,
रिश्तों के कितने पौधे लगाए,
दिल में सर्द एहसासों का मौसम,
सपने अरमानो और हसरतों के पतझड़ भी आए,

और कभी आंखों से सावन खूब बहाए,
अपने इस घरोंदे को मैने तिनके तिनके से बनाया,
प्रकृति के हर रंग से मैने इसे सजाया,
मैं ही तो हूं इंद्रधनुष अपने इस रैन बसेरे का,

हर स्वाद और जायका मैने यंही पकाया था,
सबकुछ तो है इसी आंगन में,
जिसे मैनें सपनो से सजाया था,
अब जाकर मुझमें ये विश्वास और गौरव आया,

मैं हूं धरती,
और
ये घर और परिवार है मेरी परिधी,
मेरे बिना मेरा संसार अधूरा,
और ये परिवार मेरी धूरी है,
मैं प्रकृति हूं
मैं सृष्टि हूं
मै नारी हूं
मै गृहणी हूं,.....

इसी के साथ मैं एक और मध्यांतर लेती हूँ , लेकिन उससे पहले आपको ले चलती हूँ वटवृक्ष पर जहां कविता में अपने शहर को बयां कर रही है सोनल रस्तोगी .....यहाँ किलिक करें 

7 comments:

  1. उसके मन में सब कुछ
    ठहर सा गया है, मर सा गया है !
    उसे सिर्फ अपना धर्म निभाना है ,
    एक नीरस, शुष्क, मशीनी दिनचर्या ,
    चेतना पर चढ़ा कर्तव्यबोध का
    एक भारी भरकम लबादा ,
    और उसके अशक्त कन्धों पर
    अंतहीन दायित्वों का पहाड़ सा बोझ ,
    जिन्हें उसे प्यार, प्रोत्साहन, प्रशंसा और
    धन्यवाद का एक भी शब्द सुने बिना
    होंठों को सिये हुए निरंतर ढोये जाना है ....

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  2. विचारों को आंदोलित कर देने वाला प्रभावशाली लिंक संयोजन ...बहुत खूब रश्मि जी!

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  3. सभी रचनाओं में गहन विचारनीय विषय का उल्लेख है -बहुत सुन्दर चयन रश्मि प्रभा जी .

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  4. आभार रश्मिप्रभाजी ! इतनी सुन्दर रचनाओं के बीच मेरी रचना का भी आपने चयन किया ! हर प्रस्तुति लाजवाब है ! ह्रदय से आपका धन्यवाद !

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  5. हर रचना बहुत भावपूर्ण और मन को सोचने को बाध्य करती है |सत्य के बहुत करीब ||
    आशा

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  6. bahut hi sudar sankalan ke liye badhaiyan aur meri rachna ko sthan dene ke liye bahut aabhar,..

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