सुबह की रूह बन गई हो तुम 
सूरज तुम्हारे रक्त से लाल है 
......
तुम जीना चाहती थी 
तुम जी रही हो .....
नहीं ज़रूरत किसी गवाह की 
नहीं ज़रूरत अपराधियों को फांसी देने की 
तुम्हारी गवाही ख़ुदा हर दिन देता है 
बेमौत मरेंगे अपराधी - बालिग़ भी, नाबालिग भी !!!



 रश्मि प्रभा
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ज्योति थी तुम जीते जी, ज्योत हो तुम मर कर भी

तेरी चीख नहीं सुनी हमने
पर घोर शोर है मन में
धधक उठी आज आग
My Photoहमारे हिस्से के हर कण में  

हो तुम मौजूद नहीं पर
तेरी ख़ामोशी कहती है सबसे
मचेगा प्रलय भारतभूमि पर
अगर जगो ना तुम अबसे    

आ गया वक़्त है जब
हम खुद से करें तदबीर  
और बदलें सबसे पहले
अपने समाज की तस्वीर

खोल दे बेड़ियाँ बेटियों के पैर से,
दें हम उसके हाथ कलम
लिखने दे उसे खुद की तकदीर,
मिटाने दे उसे खुद के अलम   

हम ना दें अब और उसके
गमज़ा-ओ-हुस्न की मिसाल
तंज़ न दें उसको बदलने को,
हम ही बदलें अपनी चाल

हमने माना की सारे बुजुर्ग
होंगे नहीं हमारे हमकदम  
नदामत है हमारे ज़माने की,
करें अज़्म लड़ेंगे खुद हम

वो जो हर अपना घर में
मांगेगा दहेज़ गहने जेवर
अहद लो आज खुद उठके
तुम दिखाओगे चंगेजी-तेवर  

ये शपथ लो ब्याह ना आये
कभी बेटी की शिक्षा की राह
उसको रुतबा-ओहदा पाने दो
जिसकी उसको मन में है चाह

दामिनी!

तुम जा चुकी हो उस मिटटी में
जहां हम भी एक रोज़ आयेंगे
काश! जो तुम न देख सकी
उस समाज की दास्ताँ सुनायेंगे

ये मत समझना तुम
व्यर्थ हुए तुम्हारे प्राण
तन्द्रासक्त भारतभूमि पर
जागेंगे जन एक नवविहान

खोल दी सबकी आँखें,
झकझोड़  दिया अन्तर भी
ज्योति थी तुम जीते जी,
ज्योत हो तुम मर कर भी

निहार रंजन,


स्याह सा अकेलापन

स्याह सा अकेलापन...
डर लगता है मुझे....
इस घिरते अंधेरे से...
सन्नाटे में गूंजती आवाजें.....
सोने नहीं देती मुझे....
अजनबी कदमों की आहटें...
चौंका देती हैं मुझे...
दूर कहीं गुजरता है कुछ....
उठ जाती हूं नींद से मैं...
पसीने - पसीने.. घबराई हुई.....
पूछ्ती हूं परछाईयों से....
क्या जानती हूं तुम्हें....
पैरों को मोड़े.. घुटनों पे सर रखे....
खुद में खुद को समेटे हुये....
जैसे खुद को संभालती हूं मैं....
कुछ भूली - बिसरी बातें....
कुछ धुंधले से चेहरे...
याद आते हैं मुझे....
मन भींग जाता है...
और आंखें भी...
नमकीन पानी से...
भीतर कहीं....
कुछ टूटता जाता है...
और बढ़ जाता है...
खालीपन.....
जाने क्यूं उठने का....
दिल नहीं करता....
ना ही देखने का..
वक्त की आंखों में....
यूं ही चुपचाप खामोश गुजर..
जाये ये जिंदगी...
अब लड़ने का दम नहीं मुझमें...

मोनिका (मान्या)
शोर...

क्या वक़्त है...!!
हर शख्स बदलाव चाहता है...
My Photo
बगावत से या अहिंसा से,
शब्दों से या बातों से
मगर चाहते सब हैं...
कोई चाहता है सत्ता बदलना...
कब कॉंग्रेस जाये और बी० जे० पी० आये...
किसी को चिढ़ है बिहारी से,बंगाली से,
कोई धर्म की पताका फहरा रहा है....
कि हिन्दू सलामत रहें,मुस्लिम मिट जाएँ...
कहीं भाषा की लड़ाई है,
कि हिन्दी पिछड़ रही है...
कहीं जाति का रोना है....
मैं ठाकुर,तू चमार
कोई आसाराम का पुजारी है तो रविशंकर का दुश्मन....
कोई मंदिर चाहता है,मस्जिद तोड़कर....
कोई औरत को आँखों से उघाड़ रहा है,
कोई ढाँकने की दुहाई दे रहा है...
हाँ माना,
कि हम हर पल,हर बात पर बंटे हुए है....
पर हमारे यहाँ,
"अनेकता में एकता" का ढोंग जो हैं..
सो हम सब बदलाव चाहते हैं...
अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से,
हर चीज में...
सिवाय मानसिकता के...

-कुमार 

7 comments:

  1. रश्मिजी निहार रंजनजी की कविता ने तो झकझोर के रख दिया ...बहुत सुन्दर लिनक्स ...हमेशा की तरह

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  2. लाजबाब रचना,,,,बहुत सुंदर उम्दा प्रस्तुति,,,

    recent post: मातृभूमि,

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  3. ...असल में नारी- विमर्श परिकल्पना टीम ही कर रही है । इसके लिए रश्मिप्रभा जी और रवीन्द्र जी बधाई के पात्र हैं ।

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  4. निहार रंजन जी की कविता ने मन छू लिया बाकी रचनायें भी शानदार

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  5. धधक उठी आज आग
    हमारे हिस्से के हर कण में
    तन्द्रासक्त भारतभूमि पर
    जागेंगे जन एक नवविहान ??
    अनेकता में एकता" का ढोंग जो हैं..
    सो हम सब बदलाव चाहते हैं...
    अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से,
    हर चीज में...
    सिवाय मानसिकता के...

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  6. कुछ लोग नारी- विमर्श को केवल तथाकथित नारीवादियों का ही अधिकार मानते हैं,स्त्रियों की समस्याएँ उन्हें केवल स्त्रियों की ही लगती हैं।यहाँ तक कि एक सामाजिक मुद्दे को दरकिनार कर ऐसे लोग अपनी निजी खुन्दक निकालते हैं,गोलबंदी करते हैं ।इनकी बुद्धि पर तरस ही आता है ।

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  7. बहुत सुंदर उम्दा प्रस्तुति,...

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