उत्थिष्ठ भारत " सौरभ राय 'भगीरथ' के उत्कृष्ट काव्य-संग्रह की सबसे पहली विशेषता - जिससे मैं प्रभावित हुई, वह है इसका 'समर्पण पृष्ठ' और आभार पृष्ठ . समर्पण के और आभार की पंक्तियाँ कवि के सकारात्मक कोमल ह्रदय के पुष्पित संस्कार हैं ... और जिस जमीन पर संस्कार हो, उसके शब्द अर्जुन के बाण और कर्ण के कवच की याद दिलाते हैं . उम्र के 24वें पड़ाव पर इस युवा कवि ने इतनी अद्भुत परिक्रमा की है कि प्रतीत होता है कि वेद,उपनिषद,युगों की अविरल बहती स्थापित भावनाओं को छूकर समय ने इसके उन्नत ललाट पर रोली-अक्षत लगाया है . 
पहली कविता 'भारतवर्ष' इकबाल के विश्वास की याद दिलाती है .... 'ज़रा नम हो तो यह मिटटी बड़ी ज़रखेज़ है साकी' 
निःसंदेह - नाउम्मीदी का सवाल ही बह गया जब इस रचना की आखिरी पंक्तियों की मैंने घूंट भरी -

वास्को डि गामा ढूंढ रहा है 
कहाँ है?
कहाँ है भारतवर्ष ? ....

ऐसे प्रश्न तभी उठते हैं,जब घायल मन ख़ुद वास्को डि गामा बनने की धुन में कलम की पतवार से पदचिन्हों की तलाश करता है !

'बटन' कविता बचपन की सोच को हरे कर जाती है . जी हाँ सिर्फ घाव हरे नहीं होते, कल्पना में जो विश्वास अदम्य उड़ान भरता है,वह भी हरा हो जाता है जब कवी की कलम कहती है -

तुम्हें पता है ?
....
तुम्हीं हो 
जो आग में तपने से नहीं डरते ...
.....
तो क्या तुम बटन से पहिये में बदल 
दौड़ नहीं सकते ? 

चाह लो तो पूरी कायनात साथ देती है - निर्भर है कि चाहत में कितनी सच्चाई और स्थिरता है !

ज़िन्दगी अंगारों पे चलकर जब एक शक्ल पाती है तो उसके शब्द,उसका नज़रिया कोलाहल,नाटकीयता से परे सूक्ष्मता के सैलाब पर ध्यानावस्थित होता है - नक्सलवादी रचना इस ध्यान का सृजन है ...

माँ की लोरी सुननेवाला पहाड़ी बच्चा 
ख़ामोश हो जाता है पहाड़ सा 
....
एक दिन अचानक 
अपने पिता को 
वो दिखलाता है -
पहाड़ सी धंसी छाती में धंसी आग 
सपने - जिनसे उसे निकाल फेंक दिया गया .................... 


पढ़ते हुए मुझे नज़र आता है वो बच्चा जो माँ की लोरी में रोटी पाकर बुत बन जाता है और अनाजों से भरे गोदाम को सपनाता है - रुकावट उसे पिता के आगे हठ की तरह खड़ा करता है - अपनी कठिनाइयों को क्षमता खामोश पहाड़ सा मन ही बना सकता है,बनाता है . 

रूह सिहर जाती है जब यह युवा कवि आदिवासी स्त्री की व्यथा को प्रश्नों की चीख से भरे आंसुओं की स्याही से उद्धृत करता है -

किस लोक में जी रही हो 
क्या इतना भी नहीं जानती -
भगवान् ने आदमी नहीं बनाया 
आदमी ने भगवान् बनाया है 
तुम्हें दबाने के लिए ! .... 

धर्मान्ध लोगों पर युवा मन ने रोष नहीं .... रोष में छुपे दर्द को उभारा है . बेबस आँखों ने जब आदिवासी औरतों की दुर्दशा को देखा होगा तो कोमल कच्चे मन ने क्या क्या सोचा होगा - इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है . 
पूरी किताब आस-पास के सजीव मंजरों से बनी है ........... सत्य जब हुबहू उभरता है तो भारत आह्वान करता है - यह आह्वान सौरभ राय का भगीरथ प्रयास है, जो कहता है -

मेरी कलम कमान है 
जिसकी प्रत्यंचा चढ़ 
निकली कवितायेँ टकराती हैं 
तुम्हारी पुरानी दीवार से 
इसकी प्रतिध्वनि 
क्या तुम्हें हस्तिनापुर की गलियों में 
सुनाई नहीं देती ?

तुम्हारी दीवार को फांद 
मेरी कलम तलवार में बदल जाती है 
लड़ती है 
तुम्हारे षडयंत्रों से 
और रेत देती है 
तुम्हारे दुर्विचारों का गला !!! ....... 

समर्पण के आरंभिक पंक्तियों को मुखर कर दिया है कवि सौरभ ने अपनी इस कविता में -

अकेलेपन का मिलाप  

नहीं मैं इस मिलाप की व्याख्या नहीं करुँगी, क्योंकि मेरा इतना कहना आपके पढने की जिज्ञासा को प्रबल करने के लिए काफी है . अगर इस युवा कवि की किताबें आपके पास नहीं तो यकीन मानिये - आप सच्चे पन्नों की सरसराहट से वंचित रह जायेंगे . आप मिल सकते हैं सौरभ राय से  -

कविताएँ | Sourav Roy


5 comments:

  1. आपने अपने लेख के माध्यम से बहुत सुन्दर परिचय कराया है सौरव की कविताओं का | इनको ज़रूर पढना चाहूँगा | समय मिलते ही सबसे पहले इन कविताओं को पढूंगा | आभार

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  2. बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!बेहतरीन अभिव्यक्ति.सादर नमन ।।

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  3. कविताओं के माध्यम से सौरव् जी का सुंदर परिचय ,,,

    recent post: बसंती रंग छा गया

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  4. कौतुहल का बीज रोप दिया आपने ...अब तो सौरव को पढ़ना ही होगा

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  5. आपकी रचना निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें।

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