हिन्दी साहित्य के आरंभ और विकास में कई महान कवियों और रचनाकारों ने अपना योगदान दिया है, जिनमें से एक हैं छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत. सुमित्रानंदन पंत नए युग के प्रवर्तक के रूप में जाने जाते हैं जिनका जन्म 20 मई, 1900 में कौसानी, उत्तराखंड में हुआ था. सुमित्रानंदन पंत के जन्म के मात्र छ: घंटे के भीतर ही उनकी मां का देहांत हो गया और उनका पालन-पोषण दादी के हाथों हुआ.

सुमित्रानंदन पंत आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक युग प्रवर्तक कवि हैं, जिन्होंने भाषा को निखार और संस्कार देने के अलावा उसके प्रभाव को भी सामने लाने का प्रयत्न किया. उन्होंने भाषा से जुड़े नवीन विचारों के प्रति भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया. सुमित्रानंदन पंत को मुख्यत: प्रकृति का कवि माना जाने लगा, लेकिन वास्तव में वह मानव-सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के भी कुशल कवि थे.

महाकवि सुमित्रानंदन पन्त का महाकाव्य लोकायतन उनकी विचारधारा और लोक-जीवन के प्रति उनकी सोच को दर्शाता है. इस रचना के लिए पंत को सोवियत रूस तथा उत्तर-प्रदेश सरकार से पुरस्कार भी मिला था.

    28 दिसम्बर, 1977 को इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में सुमित्रानंदन पंत का देहांत हो गया. उनकी मृत्यु के पश्चात उत्तराखंड राज्य के कौसानी में महाकवि की जन्म स्थली को सरकारी तौर पर अधिग्रहीत कर उनके नाम पर एक राजकीय संग्रहालय बनाया गया है.

कवी पन्त की वह रचना,जो कई पत्रिकाओं से खेद सहित लौटी, वह उनकी अविस्मर्णीय रचना हुई --- इस रचना को पढ़ते हुए सोचें कि हताश हो जाने से मंजिल नहीं मिलती ..... गिरेंगे नहीं,रुकेंगे नहीं तो चलना-दौड़ना कैसे सीखेंगे !

यह धरती कितना देती है -सुमित्रानंदन पंत 


मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी,
और फूल फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा !

पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
वन्ध्या मिटटी ने न एक भी पैसा उगला !
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल  हो गए !
मैं हताश हो, बाट जोहता रहा दिनों तक,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर !
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोप था, तृष्णा को सींचा था !

अर्धशती हहराती निकल गयी है तब से !
कितने ही मधु पतझर बीत गए अनजाने,
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूली, शरदें मुस्काई,
सी-सी कर हेमंत कँपे , तरु झरे, खिले वन !
औ' जब फिर से गाढ़ी ऊदी लालसा लिए,
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर,
मैंने, कौतूहलवश, आँगन के कोने की 
गीली तह को यों ही ऊंगली से सहलाकर 
बीज सेम के दबा दिए मिटटी के नीचे !
भू के अंचल में मणि मानिक बाँध दिए हों !

मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को ;
और बात भी क्या थी, याद जिसे रखता मन !
किन्तु, एक दिन, जब मैं संध्या को आँगन में
टहल रहा था - तब सहसा मैंने जो देखा !
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से !
देखा, आँगन के कोने में कई नवागत 
छोटी-छोटी चाता ताने हुए खड़े हैं !
चाता कहूं की विजय पताकाएं जीवन की ,
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्ही, प्यारी -
जो भी हो, वे हरे हरे उल्लास से भरे 
पंख मार कर उड़ने को उत्सुक लगते थे,
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़िया के बच्चों - से !

निर्मिमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता,
सहसा मुझे स्मरण हो आया, कुछ दिन पहले,
बीज सेम के रोप थे मैंने आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधों की यह पलटन 
मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से 
नन्हे नाटे पैर पटक, बढती जाती है !
तब से उनको रहा देखता - धीरे धीरे 
अनगिनत पत्तों से लद , भर गयी झाड़ियाँ 
हरे भरे तंग गए कई मखमली, चंदोवे !
बेलें फ़ैल गयी बल खा, आँगन में लहरा, -
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का 
हरे हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को !
मैं अवाक रह गया वंश कैसे बढ़ता है !
छोटे, तारों - से छितरे, फूलों के छींटे 
झागों- से लिपटे लहरी श्यामल लतरों पर 
सुन्दर लगते थे, मानस के हंसमुख नभ-से,
चोटी  के मोती-से, आँचल के बूंटों-से !

ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ टूटी !
कितनी साड़ी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,
पतली चौड़ी फलियाँ, - उफ, उनकी क्या गिनती !
लम्बी लम्बी अंगुलियाँ - सी, नन्हीं नन्हीं 
तलवारों - सी, पन्ने के प्यारे हीरों - सी,
झूठ न समझें, चन्द्र कलाओं-सी नित बढती,
सच्चे मोती की लड़ियों - सी, ढेर ढेर खिल,
झुण्ड-झुण्ड भिलमिलकर कचपचिया तारों-सी !
आ: इतनी फलियाँ टूटीं, जाड़ों भर खायी,
सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के 
जाने अनजाने सब लोगों में बंटवाई,
बंधु , बांधवों, मित्रों,अभ्यागत मंगतों ने 
जी भर-भर दिन-रात मोहल्ले भर ने खाईं !
कितनी सारी फलियाँ ! कितनी प्यारी फलियाँ !

यह धरती कितना देती है ! धरती माता 
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को !
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्त्व को !
बचपन में, छि: स्वार्थ लोभ वश पैसे बोकर ।

रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ ।
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं ,
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं ,
जिससे उगल सके फिर धुल सुनहली फसलें 
मानवता की-जीवन श्रम से हंसें दिशायें !
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे ।


मैं नहीं चाहता चिर सुख-सुमित्रा नंदन पन्त

मैं नहीं चाहता चिर सुख
मैं नहीं चाहता चिर दुख,

सुख दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख!
सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरण,
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन!

जग पीड़ित है अति दुख से
जग पीड़ित रे अति सुख से,
मानव जग में बँट जाएँ
दुख सुख से औ’ सुख दुख से!

अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न,
दुख-सुख की निशा-दिवा में,
सोता-जगता जग-जीवन।

यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;
चिर हास-अश्रुमय आनन
रे इस मानव-जीवन का!


श्री सूर्यकांत त्रिपाठी के प्रति / सुमित्रानंदन पंत
छंद बंध ध्रुव तोड़, फोड़ कर पर्वत कारा
अचल रूढ़ियों की, कवि! तेरी कविता धारा
मुक्त अबाध अमंद रजत निर्झर-सी नि:सृत--
गलित ललित आलोक राशि, चिर अक्लुष अविजित!
स्फटिक शिलाओं से तूने वाणी का मंदिर
शिल्पि, बनाया,-- ज्योति कलश निज यश का घर चित्त।
शिलीभूत सौन्दर्य ज्ञान आनंद अनश्वर
शब्द-शब्द में तेरे उज्ज्वल जड़ित हिम शिखर।
शुभ्र कल्पना की उड़ान, भव भास्वर कलरव,
हंस, अंश वाणी के, तेरी प्रतिभा नित नव;
जीवन के कर्दम से अमलिन मानस सरसिज
शोभित तेरा, वरद शारदा का आसन निज।
अमृत पुत्र कवि, यश:काय तव जरा-मरणजित,
स्वयं भारती से तेरी हृतंत्री झंकृत।

3 comments:

  1. बहुत अद्भुत और उत्कृष्ट....

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  2. पंत जी की उत्कृ्ष्ट कृ्तियों के लिये आभार !

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  3. यह साँझ-उषा का आँगन,
    आलिंगन विरह-मिलन का;
    चिर हास-अश्रुमय आनन
    रे इस मानव-जीवन का!
    परिचय की इस कड़ी में पंत जी की रचनाओं को साझा करने के लिये आभार

    सादर

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