हम भी आदमी थे काम के
हैं भी काम के 
यकीनन रहेंगे भी काम के 
फुर्सत हो न हो 
निकालेंगे फुरसत 
कहेंगे अपनी बात 
निःसंदेह जो होगी ख़ास 
कह सकते हो जीवन उत्सव का पर्याय 

मनोज जी को पढ़ना ऐसे ही एहसास देता है - गर आपको न हो ज्ञात तो हो जाये इनसे मुलाकात यानि इनके ब्लॉग से -


पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥

कल्पना करें - कितना अच्छा लगेगा जब एक लड़का डिग्री लेकर दौड़ता हुआ अपने माता-पिता के पास आएगा और उनके चरणों में नतमस्तक होकर कहेगा – हे माते! हे तात!! मेरी मेहनत रंग लाई और आपलोगों के अशीष और शुभकमनाओं का फल है कि आज मैं `LOVE’ में पोस्ट-ग्रैजुएट हो गया हूं। फिर जिसे वो मन ही मन चाहता था उसके पास दौड़ा हुआ जाएगा और कहेगा – हे प्रिये! इस लव में पोस्ट ग्रैजुएट इंसान का प्रेम स्वीकार करो! प्रेमिका बड़े नखरे और अदा से कहेगी, ‘अहो! तुम्हें विलम्ब हो गया! अब मुझे ‘लव’ पर रिसर्च कर चुके इंसान को अपना जीवन-साथी वरन करना है।’ इस तरह प्रेम पर पी-एच.डी. किए प्रेमी का प्रेम बाज़ार में महत्त्व काफ़ी बढ़ जाएगा। ... और प्रोफ़ेसर और प्रिंसिपल की तो चांदी ही होगी। फिर तो वह पुराना और घिसा-पिटा डायलॉग नए रूप में अपनी चमक-दमक बिखराते हुए दिखेगा –“ बच्चे! मैं उस College का प्रोफ़ेसर हूं जिसके तुम स्टुडेंट हो।” और शान से कहेंगे –

रोम-रोम रस पीजिए, ऐसी  रसना  होय;
‘दादू’ प्याला प्रेम का, यौं बिन तृपिति न होय।

सन्दर्भ कुछ यूँ है कि कोलकाता का एक महाविद्यालय जो देश का सबसे पुराने महाविद्यालयों में से एक था, आजकल विश्विद्यालय का दर्ज़ा पा चुका है। ख़बर है कि ‘लव’ को उसके पाठ्यक्रमों में शामिल कर लिया गया है। सुनने में आया है कि अमेरिका के मैसचुसेट्स विश्विद्यालय में ‘सोशियोलॉजी ऑफ लव’ पढ़ाया जात है। हो सकता है यह धारणा वहीं से उठा ली गई हो। हम अंधानुकरण करने में माहिर तो हैं ही। यूँ कि देखने वाली बात ये होगी कि जिस ‘प्यार’ को पढ़ाया जायेगा वह देसी होगा या विदेशी, यह उत्सुकता का विषय है। देसी प्यार तो आर्ट फ़िल्म की तरह धीरे-धीरे परवान चढ़ता है। विदेशी प्यार में जो जलवे हैं, उसे हमारे यहां बड़े चाव से देखा-सुना जाता रहा है। सो प्यार का विदेशी संस्करण ‘लव’, चाहे वह पढ़ाई के रूप में ही क्यों न हो, हमें ख़ूब भाएगा, उम्मीद तो यही की जा रही है।

घोषित (?) यह पाठ्यक्रम सभी वर्ग के स्टूडेंट्स को आकर्षित कर रहा है। कहा जा रहा है कि इस पाठ्यक्रम के ज़रिए छात्रों को प्रेम के प्रति संवेदनशील बनाया जाएगा। पाठ्यक्रम के विषय – द ट्रान्सफॉर्मेशन ऑफ इन्टिमेसी, सेक्सुअलिटी, लव एंड एरोटीसिज़्म, लिक्विड लव, द आर्ट ऑफ लविंग आदि पर तनिक ग़ौर करें तो समझ में आएगा कि इस पाठ्यक्रम से संवेदना बेचारी तो दहाड़ मारकर फूट ही पड़ेगी।

प्रेम का इतिहास और ऐतिहासिक प्रेमी और उसकी प्रासंगिकता के विषयों में पढ़ना कितना रोचक रहेगा!

लोगों का कहना है कि अब तक शिक्षा के क्षेत्र में भावनाओं को कोई जगह नही दी गई थी। इस पाठ्यक्रम के आ जाने से एक अच्छी शुरूआत हुई है, यह तो माना जा ही सकता है। कल को ईर्ष्या, नफ़रत, घृणा, धोखा, अफेयर्स-ब्रेक‍अप, आदि विषयों के लिए रास्ते खुलेंगे और इन्हें सीरियसली लिया जाएगा। अब तो जैसे हर सेशन के बाद दर्जनों ‘लव गुरु’ विश्विद्यालयों से निकलेंगे, वैसे ही कल को ‘ब्रेक‍अप गुरु’, ‘नफ़रत गुरु’ और ‘धोखा गुरु’ की भी तैयारी कराने वाले पाठ्यक्रम आ जाने से ऐसे गुरुओं की कमी नहीं रहेगी।

इस पाठ्यक्रम में दाखिला लेने की होड़ अभी से शुरू हो गई है। पहले प्यार की तरह “पहला फॉर्म” भरने का चार्म हर किसी को आकर्षित कर रहा है। हो भी क्यों नहीं, इस विषय के अकादमिक-इतिहास में उनका नाम पहले विद्यार्थी के रूप में सदा के लिए दर्ज़ जो हो जाएगा। दूसरी बात जो उभर कर सामने आ रही है वह यह सम्भावना कि लोग इस कोर्स में दाखिला लेने के बाद पास ही नहीं करना चाहेंगे।

मक़तबे इश्क़  में    इक  ढंग  निराला  देखा
उसको छुट्टी न मिली जिसको सबक़ याद हुआ।

क्लासेज़ इतनी रोचक होगी कि शायद ही कोई अनुपस्थित होना चाहेगा। यानी शत-प्रतिशत अटेंडेंस की गारंटी ही समझिए।

जेहि के हियँ पेम रंग जामा। का तेहि भूख नींद बिसरामा।

कितने रोचक स्पेशल-पेपर होंगे .. देसी मजनूं/लैला, या फिर विदेशी रोमियो/जुलियट ..। जब किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में इस विषय  के विद्वानों को बुलाया जाएगा तो उद्घोषक कहेगा कि हमारे बीच प्रेम के प्रकांड पंडित मौज़ूद हैं और श्रोताओं की तालियों से सारा हॉल गूंज उठेगा। इन ढ़ाई आखर वालों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। सुनने में आया है कि यह विषय ‘LOVE’ के नाम से जाना जाएगा। अच्छा ही है। प्रेम या प्यार में तो ढाई आखर ही होते हैं। इसे पढ़ने वाले एक और क्रेडिट ले जाएंगे कि वे चार आखर के ज्ञाता हैं। वैसे भी LOVE में जो खुलापन है, आज़ादी है, मस्ती है, ... वह प्यार में कहां!

कॉस्मेटिक्स की बिक्री बढ़ेगी। पुरुष और महिलाएं दोनों वैनिटी बैग लेकर निकला करेंगे। सज-संवर कर घर से निकलने वाले विद्यार्थियों को भी उस तरह के अभिभावकों से मुफ़्त की डांट नहीं सुननी पड़ेगी, जो कल तक कहते रहे हैं, कि “कॉलेज में तुम यही सब (लव-शव) पढ़ने जाते हो?” बल्कि अब छात्र सिर ऊँचा कर कहेगा कि “मैं तो इसके (लव-शव) फाइनल ईयर का छात्र हूँ।”

कई विषयों को लेकर यूं ही प्रतिस्पर्द्धा रहती है कि वह प्राकृतिक विज्ञान की श्रेणी में है या सामाजिक विज्ञान की श्रेणी में। इस विषय के जुड़ जाने से यह प्रतियोगिता और भी गहरा जाएगी। छात्रों को भी उत्सुकता है कि उन्हें कला संकाय में जाना होगा या विज्ञान  संकाय में। एक गुप्त सर्वेक्षण के अनुसार यह पता चला है कि छात्र भी यह चाहते हैं कि इसे विज्ञान संकाय में जगह मिले। कला तो भावना, संभावना और कल्पना पर आधारित होती है। विज्ञान तो प्रैक्टिकल के आधार पर सत्य का साक्षात्कार कराता है। इसलिये ‘लव’ में दाखिला लेने के बाद जब प्रैक्टिकल भी करने को मिल जाए तो फिर तो सोने पर सुहागा है।

इस डिग्री को पाकर यदि विद्यार्थियों को नैकरी मिल गई तो चांदी ही चांदी, वरना यह शे’र तो गुनगुना ही सकते हैं,

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया।
वरना हम भी आदमी थे काम के॥

अब उन चचा को कौन समझाए जो कह रहे हैं कि ‘सौहार्द्र, नैतिक शिक्षा की बात होती तो देश का माहौल सुधरता। प्रेम की पाठशाला खुल रही है, ... संस्कारों की अवहेलना पता नहीं हमें कहां तक ले जाएगी?’
अरे चाचा,
अकथ कहानी प्रेम की, कछू कही न जाइ।
गूंगे    केरी   सरकरा   खावै   अरु    मुसकाइ॥

इसीलिए ---

दादू   पाती   प्रेम   की,   बिरला    बाँचै     कोई।
वेद पुरान पुस्तक पढ़ै, प्रेम बिना क्या होई॥

और हमारे जैसे कई ब्रिलियेण्ट लोग, यह सोचकर, मन मसोस कर, रह गये होंगे कि काश यह कोर्स कुछ साल पहले शामिल हो गया होता, तो आज हम भी समाज की सम्वेदनशीलता में इजाफ़ा कर रहे होते। लेकिन अब पछताने से क्या लाभ जब समय की चिड़िया ने सिर की सारी खेती चुग डाली है।


मुझे आलोचक नहीं चाहिए
हां, जब मैं
[%E0%A4%9D%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%82%E0%A4%B0+%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8+291.JPG]पप्पू पेंटर पर लिखता हूं,
जब कालू रिक्शे वाले की बातें करता हूं,
तो मुझे आलोचक की आलोचना नहीं चाहिए।
नहीं चाहिए तारीफ भी...
जब मैं उनके दर्द को दर्द कहूंगा,
उनकी गाली-गलौज वाली भाषा को
उनकी हताशा-निराशा को
जैसा है वैसा ही लिखूंगा।
पचास फीट ऊपर पोल पर चढ़कर चित्र गढ़ता
वह जो पप्पू पेंटर है
सीढ़ियों का सहारा लेकर नहीं चढ़ता ।
अब आप अपनी आलोचना के बाण चलाएंगे
मेरी कल्पनाशीलता पर प्रश्न चिह्न लगाएंगे
कि कवि एक सीढ़ी तो लगा ही सकता था।
पर मैं पप्पू की परेशानियां कम नहीं कर सकता
आप गढ़ सकते हैं तो गढ़ दीजिए
पप्पू की ज़िन्दगी में सीढ़ी का सहारा जड़ दीजिए !
पर शाम होते ही सीढ़ियां बेचकर वह
सफेद द्रव्य वाला पाउच पकड़ लेगा
और जब तरंग उतरेगी
तो बिना सीढ़ियों के फिर पोल पर चढ़ लेगा।
झुम्मन जब
पीकर दारू पीटेगा भुलिया को
तो
बता दूंगा जग को ...
बेटे के हिस्से की रोटी भी
खा जाएगा
और बेटा भूखे पेट सो जाएगा।
मैं सब को बता दूंगा वह क्या करता है
लेकिन यह नहीं बताऊंगा
क्यों करता है
मुझे फिर भी आलोचक नहीं चाहिए,
नहीं पसंद है उनकी आलोचना।
हां, जब मैं किसी राजकुमार पर
लेखनी चलाऊंगा
किसी राजा, मंत्री या अधिकारी के चारण गीत गाऊंगा
तब आलोचक आगे आएं, उनका स्वागत है !
वो बताएं कि मेरी लेखनी कमज़ोर है, ग़ुलाम है, चापलूस है !!!
सिर्फ कशीदे काढ़ना ही जानती है
तस्वीर के सिर्फ उजले पक्ष को ही पहचानती है,
डरती है मेरी लेखनी सच को दिखाने से
मान लूंगा।
पर जब मैं भोलू और बुधिया पर लिखता हूं
तो जो है .. वही लिखता हूं
इसीलिए आलोचक से नहीं डरता हूं
बुधिया का चेहरा काला है, तो काला है
उसके गालों पर जूते के रास्ते
हाथ होते हुए काला पॉलिश चढ़ गया है
तो वही तो बताऊंगा
अब इस शब्दचित्र को,
आलोचक संवारना चाहें भी तो नहीं संवारने दूंगा।
ये उसका चेहरा है, आपका क्या
आपके जूते पर तो चमक आ गई ना !
उसके चेहरे पर चमक तो तब आएगी
जब आप उसे अठन्नी देंगे
और शाम के पहले ही वह पव्वा चढ़ा लेगा।
जेठ की दुपहरी में
जब मैं कालू रिक्शेवाले के पीछे बैठता हूं
तो उसके पसीने को नहीं देखता
उसकी देह की दुर्गंध मेरी नाक में बसी होती है
सिर फट रहा होता है
वैसे में मुझे कुछ दिखता नहीं, मैं अपनी नाक के साथ
आंख भी बंद कर लेता हूं
पर लिखता मैं वही हूं जो मुझे दिखता है
और आप हैं, आलोचक जी
कि मुझे बता रहें हैं मेरी चित्रण में विसंगतियां हैं !
मुझे आपकी आलोचना नहीं चाहिए !
जब मैं यह लिखता हूं कि राजा भालचंद्रजी सच्चे जनसेवक हैं
तो आप आइए
मेरी लेखनी से निकले इस चित्र पर
अपनी कलम चलाइए
जमकर मेरी आलोचना कीजिए
मेरी रचना की कमज़ोरी गिनिए
पर उनके लिए गढ़े हुए अपने शब्द नहीं बदलूंगा
शब्द तो ... जो मैंने बुधिया, भोलू, कालू, झुम्मन-झींगुर
के लिए लिखे हैं
वह भी नहीं बदलूंगा
क्यूंकि मुझे जो दिखा है
मैंने वही लिखा है
अब जो राजाजी, साहबजी, बड़े बाबू का नहीं दिखा मुझे
वह कैसे लिख दूं ?
मुझे तो यही दिखा कि
राजाजी आते हैं
आश्वासनों की दवा पिलाते हैं
बुधिया, भोलू, कालू, झुम्मन-झींगुर पी लेता है
और उसी के सहारे पांच साल जी लेता है
तो राजाजी कैसे बुरे हुए
फिर तो मैं लिखूंगा ही
राजा भालचंद्रजी सच्चे जनसेवक हैं
उन्होंने पांच साल हमारी सेवा की है, उन्हें ही जिताइए।
पर आप मुझे कलुआ, बुधिया, झुम्मन-झींगुर
की तस्वीरों को रंग-विरंगे रंगों से रंगने की प्रेरणा न दें।
उन्हें मैंने काली रोशनाई से ही लिखा है
क्योंकि वह मुझे वैसा ही दिखा है।
आइए आपको भी दिखाता हूं
तपेदिक से तपा
वह जो ठेला खींच रहा है
बयालिस डिग्री सेल्सियस के तापमान में
सड़क को अपने स्वेद से सींच रहा है
उसे बरगद की छांव में सुस्ताने की सलाह
मैं नहीं दे सकता
अन्यथा उसकी बीमार बेटी सुमरतिया की स्मृति में
उसे कुछ दिन और सुस्ताने पड़ेंगे ... ...
इस दुनियां के रीत-धरम भी तो उसे निभाने पड़ेंगे !
अब आप इसे मेरी क़लम की कमज़ोरी कहें या कायरता
पर मत दिखाइए अपनी वीरता।
आलोचकजी ! मैं तो उसे ठेला खीचता हुआ ही दिखाऊंगा
ताकि वह खींच-खींच कर बेटी के लिए दवा-दारू जुगाड़ सके,
अपना कुछ क़र्ज़ उतार सके।
वह जो पेड़ तले पगली झुमरी लेटी है
किसी भले घर की बेटी है
और उधर धूप में जो बच्चा लेटा है
उसका नाजायज़ बेटा है
किसी इंसान के फरिश्ते ने उसे छला था
तभी तो उसकी कोख में वह नौ महीने पला था
इज़्ज़त के साथ-साथ
मानसिक संतुलन खो चुकी है
निकलती नहीं , अधरों में जो सांसें रुकी हैं
पांवों तले जिस क़ालीन को आप रौंद रहें हैं
उसके हर रेशे में
किसी बालगोपाल की अंगुलियों के
करतब कौंध रहें हैं
उस ढाबे में
जूठी प्लेटें धोने से मिली टिप से
रूखी-सूखी रोटी खाकर
फुटपाथ पर सोया हुआ आदमी
नींद में बेखबर है
कि उसकी सारी जमा-पूँजी
और बिका हुआ घर भी
उसकी बहन को
दहेज की आग से बचा न सका
और इसी सदमे से
उसकी माँ चल बसी ।
झींगुर दास को ही लीजिए
पूरे गांव के लिए वह झिंगुरा है
पर उसका अलग ही दुखड़ा है
मेरा ही नहीं, कइयों के खेत जोतता है
सबका पेट भरे, धान-गेंहूं रोपता है।
और जब खेतों में फैलती है हरियाली
मन से करता है रखवाली
पर जब सारा गांव चैन से सोता है
तब झींगुर बरगद तले
आधी-आधी रात को रोता है
क्यूंकि पिछले साल भूख से व्याकुल हो
उसका बेटा रेल से कट गया था 
क्या मेरे दिए गए दो सौ रुपए से उसका दर्द घट गया था ???
पर मैं इनके बारे में ज़्यादा नहीं सोचता
आलोचकजी! आप उनका दर्द बांट लीजिए
अपनी आलोचना के अथाह कोश से
उनके लिए भी
हो सके तो
कुछ शब्द छांट लीजिए।
हां जब मैं अपनी रचना में
प्रेयसी के रूप-गीत गाता हूं
तब तो आप ज़रूर से आगे आते हैं
और मेरी अकविता को
श्रृंगार रस की अनुपम कविता बताते हैं
अगर आपकी आलोचना में रस है
तो इनके जीवन से
करुण रस निकाल दीजिए
और शब्दों से ही सही
उनके जीवन में भी
हास्य रस की कुछ बूंदें डाल दीजिए।
मेरी यह कविता लम्बी हो गई तो हो गई ...
पाठक पढ़ें या न पढ़ें
मैं जो लिखना चाह रहा था, लिख दिया
अब आप कहेंगे
इतनी लंबी कविता की क्या आवश्यकता थी
कवि अपनी बात कम शब्दों में कह सकता था
पर... ...
आलोचकजी ! लगता नहीं आपको कि
मेरी क़लम की नींब पर जिनकी तस्वीर गड़ गई है
उनके लिए मेरी यह
एक लंबी कविता भी छोटी पड़ गई है ... ... ...

पूरी ज़िन्दगी है इस कविता में - कड़वी सच्चाई का कटु श्रृंगार रस वाकई कम है  …। 

इसी के साथ आज का परिकल्पना ब्लॉगोत्सव  सम्पन्न, मिलती हूँ कल फिर सुबह 10 बजे परिकल्पना पर ...

7 comments:

  1. मनोज भाई के ब्लॉग के सारे पोस्ट पढ़ती हूँ …
    बहुत रोचक लगते हैं .....

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  2. मनोज दादा को हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें |

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  3. मनोज जी की लेखन शैली के तो शुरु से कायल रहे हैं।

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  4. मनोज भाई को पढना हमेशा ही अलग अनुभव देने वाला रहता है ।

    मेरे दिमाग में आज डाउनलोड होते विचार

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  5. मनोज जी हमेशा सधा हुआ संवेदनशील लिखते हैं ... गरिमामय लिखते हैं ...
    एक बहुत ही अच्छी रचना के लिए बधाई उन्हें ...

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  6. एक लंबी कविता भी छोटी पड़ गई है ... ... ...बिल्‍कुल सच कहा
    मनोज जी को जब भी पढा़ है आपकी हर प्रस्‍तुति नि:शब्‍द कर देती है
    आभार

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