मृत्यु  …एक निःशब्द प्रतिक्रिया है 
आत्मा के निकलते ही 
जो सन्नाटा बिखरता है 
उसे आँसुओं में बहाना मुमकिन नहीं 
यादों का सैलाब 
तोड़ता है मन के बाँध को 
अंदर दर्द की विभीषिका 
और बाहर - सामाजिक तकाज़ा 
अन्य ज़िम्मेदारियाँ !
यादों की गहराइयाँ बढ़ती जाती हैं 
मन के संदूक में कितनी बातें जमा होती जाती हैं !!
……… 
जीवन-मृत्यु की सरहद पर 
अपने शारीरिक आडम्बर से बाहर निकल 
अजीज आत्माओं से 
कभी बातें की हैं ? 
करके देखना  ....... कई सुलझे तथ्य मिलते हैं !!!

मृत्यु की अलग-अलग अभिव्यक्ति 

लावण्या शाह 
सुप्रसिद्ध कवि स्व० श्री नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री हैं और वर्तमान में अमेरिका में रह कर अपने पिता से प्राप्त काव्य-परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

इच्छा - अनिच्छा के द्वंद में धंसा , पिसा मन
धराशायी तन , दग्ध , कुटिल अग्नि - वृण से ,
छलनी , तेजस्वी सूर्य - सा , गंगा - पुत्र का ,
गिरा , देख रहे , कुरुक्षेत्र की रण- भूमि में , युधिष्ठिर!
[ युधिष्ठिर] " हा तात ! युद्ध की विभीषिका में ,
तप्त - दग्ध , पीड़ित , लहू चूसते ये बाणोँ का , सघन आवरण ,
तन का रोम रोम - घायल किए ! ये कैसा क्षण है ! "
धर्म -राज , रथ से उतर के , मौन खड़े हैं ,
रूक गया है युद्ध , रवि - अस्ताचलगामी !
आ रहे सभी बांधव , धनुर्धर इसी दिशा में ,
अश्रु अंजलि देने , विकल , दुःख क़तर , तप्त ह्रदय समेटे ।
[ अर्जुन ] " पितामह ! प्रणाम ! क्षमा करें ! धिक् - धिक्कार है !"
गांडीव को उतार, अश्रु पूरित नेत्रों से करता प्रणाम ,
धरा पर झुक गया पार्थ का पुरुषार्थ ,
हताश , हारा तन - मन , मन मंथन
कुरुक्षेत्र के रणाँगण में !
[ भीष्म पितामह ] " आओ पुत्र ! दो शिरस्त्राण,
मेरा सर ऊंचा करो !"
[ अर्जुन ] " जो आज्ञा तात ! "
कह , पाँच तीरों से उठाया शीश
[ भीष्म ] " प्यास लगी है पुत्र , पिला दो जल मुझे "
फ़िर आज्ञा हुई , निशब्द अर्जुन ने शर संधान से , गंगा प्रकट की !
[ श्री कृष्ण ] " हे , वीर गंगा -पुत्र ! जय शांतनु - नंदन की !
सुनो , वीर पांडव , " इच्छा - मृत्यु", इनका वरदान है !
अब उत्तरायण की करेंगें प्रतीक्षा , भीष्म यूँही , लेटे,
बाण शैय्या पर , यूँही , पूर्णाहुति तक ! "
कुरुक - शेत्र के रण मैदान का , ये भी एक सर्ग था !


अनुपमा पाठक
रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना, "अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

मृत्यु पर
एक पुस्तक पढ़ती हुई
जीवन के बारे में
सोचती रही...

कैसे इस ओर से उस ओर
हो जाता है प्रस्थान
चल देती है आत्मा
इस धाम से उस धाम

शरीर यहाँ पंचत्व में
विलीन हो जाता है
नियति के हाथों
इंसान कितना दीन हो जाता है

पूर्व निर्धारित घटनाक्रमों के आधार पर
बस अभिनय ही तो करना है
फिर क्यूँ किसी से बैर भाव
चलें ख़ुशी से जितना लिखा हुआ चलना है

पुरुषार्थ
भाग्य बदल देता है
दृढ़ता का सूर्य
हमारी जीवन धरा को रौशनी देता है

उस सूर्य के
प्रकाश में
लीन रहे जो सदा
सत्प्रयास में

उसके जीवन का हर पहर
सत्कर्मों में व्यस्त हो जाता है
चमकता है उसका तेज तब भी
जब जीवन का सूर्य अस्त हो जाता है

जीवन के बाद भी एक जीवन है
जो अपनों की यादों में हम जीते हैं
चक्रवत चल रहा समय है...
आते है फिर वही जो पल भर पहले बीते हैं

उस पल का ध्यान जो हर पल रहे
जब न रहेंगे हम
जब औरों के लिए छोड़ जायेंगे
केवल यादों के मौसम

तब कितने ही क्षणिक जीवन के संताप
क्षण में मिट जायेंगे
जो मिली है ज़िन्दगी
हम उसमें झूमेंगे, नाचेंगे और गायेंगे

जीवन के महोत्सव का आनंद
मन विभोर कर देगा
तब एक विलक्षण जादू 
हर निराश शाम को भोर कर देगा

जीवन मृत्यु के बीच की
सूक्ष्म लकीर का ज्ञान रहेगा
तो आजीवन जीवन के प्रति
आभार और सम्मान रहेगा

ये मृत्यु ही है
जो जीवन को विशिष्ट बनाती है
क्षणिकता के सौन्दर्य का
हमको भान कराती है

महत्व उसका ही है
जो खो जाता है
और खोने से पहले संभावनाओं के
अगणित बीज बो जाता है

मिटने का अधिकार
अमरत्व से कहीं श्रेष्ठ है
औ' जीवन अपनी निकृष्टतम दशा में भी
मृत्यु से ज्येष्ठ है

एक घट लगा रहे और उसमें
राम नाम का मोती भरता जाए
स्मित मुस्कान के साथ घर लौटने का सुकून हो मुख पर
जब जीवन हाथ छुड़ाए...!

मृत्यु को परिभाषित करती इन अभिव्यक्तियों के साथ परिकल्पना ब्लॉगोत्सव मे बस इतना ही, मिलती हूँ कल फिर इसी जगह इसी समय ...तब तक शुभ विदा!

9 comments:

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  2. आपकी प्रस्तुति... आपकी रचना... आपका कविता... रचनाओं को यूँ सजा देती हैं कि मन अभिभूत हो जाता है...!
    इस अद्भुत श्रेय के लिए कोटि कोटि आभार...!
    ***
    मृत्यु …एक निःशब्द प्रतिक्रिया है
    Very well said...!!!

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    उत्तर
    1. *आपका कविता= आपकी कविता
      कुछ न कुछ त्रुटी रह ही जाती है...:(

      हटाएं
  3. कमेंट क्या लिखें ,जब समझ में ना आये तो अपनी उपस्थिति कैसे बताये
    !!
    ऐसे ....

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  4. जीवन और मृत्यु के विषय पर बहुत ही उत्कृष्ट रचनाएं है ! विशेष तौर पर अनुपमा जी की रचना बहुत प्रभावित करती है !

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  5. ये मृत्यु ही है
    जो जीवन को विशिष्ट बनाती है
    क्षणिकता के सौन्दर्य का
    हमको भान कराती है
    .... बहुत सही
    बेहतरीन रचनाओं का चयन एवं प्रस्‍तुति
    आभार

    उत्तर देंहटाएं

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