यह सच है कि बाहरी जगत का प्रभाव घना है
पर इसका अर्थ क्या ?
बाहर की यह दुनिया ,जैसा चाहे ,वैसा हमें नचाये
जब चाहे रुला दे या फिर चाहे तो हंसा दे
हम क्या वातावरण की
प्रतिक्रिया मात्र बन कर रह जाएँ ?
हमारा अपना भी तो ,एक व्यक्तित्व है ,अस्तित्व है
जन्म से लेकर आये हैं हम -
एक स्वभाव ,एक सामर्थ्य
जो इस बाहरी शत्रु से लड़ सकता है
वातावरण से पूर्णतः अप्रभावित होकर !

प्रकृति का एक रहस्य जान लो
याद रखो - हमारा मूल स्वभाव दिव्य है
सत्य की पहचान यदि कठिन है ,
तो सरल भी है ,
समय लग सकता है ,
पर एक बार सही सोचने की आदत ,
और गलत को नकारने का प्रयत्न शुरू हुआ
कि मुक्त होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ।
मन को अंतर्मुखी करो
शीघ्र ही बाहर की अवस्थाएं शक्ति हीन होंगी
वातावरण ,घटनाएँ या वस्तुएं
 परिवर्तनशील है 
इन को महत्त्व देना भूल है --
पर इनसे निर्देशित होना है
क्योंकि तब जो ज़मीन होगी ,
वह अधिक उपजाऊ होगी !

अक्षांशों और देशांतर के जाल में
मेरी स्थिति 
इन दिनों कुछ इस तरह है
कि लोग मुझे
पराजित और उदास कहते है.

मैं यहां एक निर्द्वन्द्व प्रतीक्षा में
बीत रहा हूँ
और वहाँ तुम
एक दुर्निवार व्याकुलता में गतिशील हो.

हमारे पास समय और
दूरी का 
एक सीधा सा सवाल है
चुनौती सिर्फ इतनी है
कि इसे हल करने के लिए
हमें अपने गुरुकुलों को छोड़ना होगा.

इस समय यहाँ रात के
ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं
आकाश साफ है
और सप्तऋषि अपनी जगहों पर अटल
न जाने किस मंत्रणा में लीन हैं.

यह कर्क रेखा
जो मेरे शहर के थोड़ा बांये से गुजरती है
तुम्हारे शहर से बस ज़रा सा ही दायें तो है.

यहां मेरे चारों तरफ
हवा है,आकाश है, अकेलापन और उम्मीद है.

अगर यही चीज़ें
तुम्हारे आस पास भी हैं
तो देशकाल और वातावरण के तर्क से
हम कितने पास हैं...
देखो तो...!


वो एक कतरा जो भिगो कर
भेजा था अश्कों के समंदर में
उस तक कभी पहुँचा ही नहीं
या शायद उसने कभी पढ़ा ही नहीं 
फिर भी मुझे इंतज़ार रहा जवाब का 
जो उसने  कभी दिया ही नहीं 
जानती हूँ ............
वो चल दिया होगा उन रास्तों पर 
जहाँ परियां इंतजार कर रही होंगी
कदम तो जरूर बढाया होगा उसने
मगर मेरी सदायें आस पास बिखरी मिली होंगी
और एक बार फिर वो मचल गया होगा
जिन्हें हवा में उडा आया था 
उन लम्हों को फिर से कागज़ में 
लपेटना चाहा होगा
मगर जो बिखर जाती है
जो उड़ जाती है
वो खुशबू कब मुट्ठी में कैद होती है
और देखो तो सही
आज मैं यहाँ गर्म रेत को 
उसी खुशबू से सुखा रही हूँ 
जिसे तूने कभी हँसी में उड़ाया था
बता अब कौन सी कलम से लिखूं
हवा के पन्ने पर सुलगता पैगाम
कि ज़िन्दगी आज भी लकड़ी सी सुलग रही है 
ना पूरी तरह जल रही है ना बुझ रही है 
क्या आँच पहुंची वहाँ तक ?

एक  सोच है, जब कोई अड़चन या मन में दुविधा हो तो खुद से अकेले में बाते करना, सोचना और एक नयी उर्जा के साथ आगे बढ़ना,मन में एक नयी रोशनी का संचार करता है |बहुत अधिक सोचने की अवस्था में किसी एक दोस्त की छोटी सी कही गई बात भी मन के भीतर उत्साह भर देती है|

हम अपने साथ साथ 
अपने साथ के समस्त तारों को 
अपने अंदर चमकते हुए महसूस करते हैं 
ये सब,हमारे भीतर अपनी अपनी 
रोशनी संग विराजमान हैं 
जब जग सो जाता हैं ,
तो विचार और शब्द हमारी 
सोच के साथ
आंखमिचौली खेलने लगते 
नींद से बोझिल आँखे,
अचानक से, मौन के तारे गिनने लगती है
रात की अटारी में हम सब 
अपने अपने विचारों संग 
एक नया गीत बुनते हैं 
रात की चलती पवन
मन में उठे अति उत्साहित विचारों को 
शब्द देती हैं 
और हम सारथी बन
अपने गीतों को 
एक  नई राह दिखाते हैं ,
हमारी आशाओं से  
स्वतंत्रत विचार बनते  हैं
जैसे मरुस्थल का अपना सौंदर्य होता है
और पत्थर भी पूजे जाते हैं
ठीक वैसे ही,वो खुदा 
हमारी असफलता में हाथ थामता है
और सफलता की राह की ओर
हमें एक साथ आगे बढ़ाता हैं 
दिन प्रतिदिन,धीरे-धीरे 
हम कदम से कदम मिला 
आज और सदा-सर्वदा के लिए 
एक ही पथ के साथी बन 
उन्मुक्त भाव से,
अब हम 
साथ साथ विचरण करने को तैयार हैं |

परिकल्पना ब्लॉगोत्सव में आज बस इतना ही, मिलती हूँ कल फिर इसी समय, इसी जगह ...तबतक अनुमति दीजिये रश्मि प्रभा को। 

3 comments:

  1. हमेशा की तरह सुन्दर अवलोकन …………मुझे स्थान देने के लिये आभार्।

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  2. याद रखो - हमारा मूल स्वभाव दिव्य है
    सत्य की पहचान यदि कठिन है ,
    तो सरल भी है ,
    सभी रचनाएँ उत्‍कृष्‍ट एवं गहन भाव लिये

    उत्तर देंहटाएं

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