स्पेस यानी अपना एक निजी दायरा, जिसे हम जीना चाहते हैं ! नहीं चाहते कोई सवाल, कोई बंधन, कोई बहस  … पर क्या यह संभव है हमेशा, हर जगह ? 


स्पेस होना चाहिए, और हर वर्ग का स्पेस होना चाहिए, लेकिन स्पेस का अर्थ स्वछंदता नहीं, और तर्क करते हुए युवा ,महिलाएँ,पुरुष, … अक्सर स्वछंदता को स्पेस मान लेते हैं  ! बुज़ुर्गों के साथ न स्पेस रह जाता है, न स्वछंदता - वे सिर्फ और सिर्फ आश्रित रह जाते हैं !

आजकल स्पेस के बहुत से प्रयोग हो रहें हैं. लेकिन किस संबंध पर हो रहे हैं - यह गौरतलब है !

                 युवा वर्ग और उनके आगे अंधाधुंध परोसी गई तथाकथित आधुनिकता ! जिसके आगे परम्परागत संस्कार बाधक हो चला है, माँ-बाप की निगरानी बाधक हो गई है ! स्पेस यानी तथाकथित आधुनिकता की स्वतंत्रता - सरेआम गले में बाँहें डाले घूमना,अपने से बड़ों की उपस्थिति को अनदेखा करना,डिस्को से लड़खड़ाते क़दमों संग लौटना स्पेस नहीं - उच्श्रृंखलता है ! स्पेस एक सकारात्मक विचार है, जिसमें हर व्यक्ति थोड़ा वक़्त अपने और सिर्फ अपने लिए चाहता है  . शांत नींद,शांत सोच, शांत शून्यता, किसी से बातचीत अपने ढंग से, कार्य चयन,विवाह वगैरह !

महिलाओं के साथ जो अन्याय होता है, उसके खिलाफ बोलते बोलते 'समानता' का प्रश्न उठ गया ! समानता - प्रेम का होना और वर्जनाओं को ताक पर रख देना, दो अलग बातें हैं ! लड़का, लड़की भाई-बहन होते हैं, भाई के कर्तव्य अलग, बहन के अलग ! माँ - बाप - माँ जन्म देती है,पिता सुरक्षा देता है, यदि यह फर्क नहीं होता तो हम कैसे कहते कि उस माँ ने अकेली माँ-बाप का फ़र्ज़ निभाया या उस पिता ने माँ का रोल भी निभाया  . ऐसा करने में फर्क रह ही जाता है !

सुविधाएँ जितनी मिली,बेबाकी उतनी बढ़ी ! सोचनेवाली बात है कि महिलाओं ने एक अलग दृढ छवि हमेशा बनाई है, पर हर क्षेत्र में स्पेस की मांग !? रात गए उनका मनोरंजन के लिए बाहर जाना मात्र लड़कों की होड़ में - स्पेस तो कत्तई नहीं, ना ही समानता का पैमाना है  . लड़कियाँ शालीनता में ही अपना वजूद पाती हैं और तेजस्वी छवि पाती हैं  . रात गए नौकरी के लिए, पढ़ने के लिए बाहर रहना हम स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन क्या दिल की आशंकाओं पर काबू रहता है ? और क्या ऊँच -नीच न बताना स्पेस देना है ?

पुरुष ! स्पेस की बात करते हुए अपनी हर सोच, हर कार्य, हर संबंध को व्यक्तिगत बताते हैं, यह स्पेस नहीं छल है ! छल खुद से भी, परिवार से भी  . स्पेस शारीरिक और मानसिक आराम से है  . हर वक़्त कोई भी व्यक्ति किसी का मनोरंजन नहीं कर सकता, ना ही हाँ में हाँ मिला सकता है, ना ही अपने सारे कामकाज ताक पे रख के दूसरे के काम आ सकता है ! स्पेस है परिवार के साथ अपने क्षण, भीड़ से दूर अपना समय  … 

My Photoराजेश उत्साही - 
निजी केवल वह है जिसे हम अपने अलावा किसी और के साथ किसी भी रूप में साझा नहीं करते । जब साझा ही नहीं करते तो फिर उस पर सवाल,बंधन,बहस कैसे होगी। और जिसे साझा करते हैं वह निजी रहता ही नहीं है।

रश्मि प्रभा - परिवार साझा,परेशानियाँ साझा - पर उसे जीने के लिए निजी समय तो चाहिए ही  … 



अशोक सलूजा -
आज के युग में हर बच्चा.युवक,युवती वयस्क नर नारी अपने लिए तो स्पेस मांगता है और जैसे तैसे ले भी लेता है ..पर वो स्पेस किसी बुजुर्ग  को देना नही चाहता ,,शायद वो समझता है अब स्पेस की इनको ज़रूरत ही नही ...पर ये गलत है ..शायद शांति से रहने ,सोचने और अपना मूल्यांकन करने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरत हम बजुर्गो के लिए ही है...ये मेरी सोच है .......

रश्मि प्रभा - पहले संयुक्त परिवार था,तो बुज़ुर्गों की एक ख़ास हैसियत थी, उनके विचारों का सम्मान था, परन्तु एकल व्यवस्था में,बहु-बेटी के नौकरी करने से कई दुश्वार स्थितियों ने भी जन्म लिया है, जिसकी वजह से उनको अपनी मर्ज़ी का कोना दिया गया है ! बुज़ुर्गों को भी अपना समय अपने ढंग से गुजारने का समय चाहिए, एक स्पेस - जहाँ वे अपने ढंग से सोच सकें !
       पर हर जगह ऐसी बात नहीं, कई जगह बड़े लोग अपने बच्चों को स्पेस नहीं देते, हर चीज में शामिल रहना चाहते हैं, जिससे परेशानियाँ भयावह हो उठती हैं  . 


सतीश सक्सेना 
सबके तो अपने अपने विचार होते हैं , कहीं कड़क और कहीं नरम, हम नहीं चाहते कि वहां "कोई और" दखलंदाजी करे , हम मुखौटे उतारना ही नहीं चाहते , और ईमानदारी का हमारा चेहरा किन्हीं दूसरे "बेईमानों" को पसंद न आये, यह हम पसंद नहीं करते ! 
समस्या यहाँ मुखौटों की है हम एक दूसरे के सामने अपने अपने खूबसूरत लिबासों में ही जाना पसंद करते हैं , गुस्सा तब आता है जब बेहद खूबसूरत मुखौटा लगाए एक बेहद घटिया विचारों का इंसान , आपका अपमान करने का प्रयत्न करे जब कि आप अपना मुखौटा उतार कर ईमानदारी देने का प्रत्न कर रहे हों :)
बेहतर यही है कि हम बाथरूम से बाहर ढके हुए ही आयें ! अन्यथा इंसान हमें पछताने को मजबूर कर देंगे !

रश्मि प्रभा - हस्तक्षेप एक सीमा तक नहीं किया जाना चाहिए, पर विचारों का विस्फोट हो तो हस्तक्षेप होता ही है, होना समय की माँग होती है !

  काजल कुमार 
पर्सनल स्‍पेस बहुत ज़रूरी है. मैं इसे बहुत महत्‍व देता हूं. मैं नहीं चाहूंगा कि‍ मेरे स्‍पेस में कोई intrude करे. और न ही मैं कभी ऐसा करता हूं. मेरे सवाल need to know basis पर होते हैं (अपवाद स्‍वरूप कुछ हो तो याद नहीं)   और इसी की अपेक्षा रखता हूं. घनि‍ष्‍ठता की भी एक सीमा होती है, घनि‍ष्ठता भी अधि‍कार नहीं देती कि‍ घनि‍ष्‍ठ के पर्सनल स्‍पेस में अति‍क्रमण कि‍या जाए. लेकि‍न ये सारी बातें कहने या लि‍खने की होती भी नहीं है. पारस्‍परि‍क समझ ही काफी होती है इसके लि‍ए. मैं ऐसा समझता हूं. आवश्‍यक नहीं कि‍ मुझसे सहमत हुआ ही जाए !

रश्मि प्रभा - निःसंदेह घनिष्ठता की एक सीमा होती है, मित्रता,रिश्ता - आपसी समझ हो तो व्यक्ति यह एहतियात बरतता ही है।  कहा भी गया है कि किसी भी अच्छे सम्बन्ध के लिए दूरी अपेक्षित है !


वंदना गुप्ता 
ज़िन्दगी एक खामोश सफर सी चलती जाती है और जो पथ वो बनाती है उस पर  चलना  मानव  की नियति और चलते जाते हैं सभी उस पर बिना कोई शिकवा शिकायत करे।  सही है सभी जीते हैं जिसके सामने जैसी आती है फिर भी एक खलिश हमेशा दिल के किसी कोने को कुतरती रहती है , क्या यही जीवन है सिर्फ दूसरों के लिए जीते जाना जिसमे अपने लिए अपना कुछ न हो। ये वो हिस्सा होता है जीवन का जिसे उम्र भर हर कोई अनदेखा कर जीता  जाता है और एक वक्त जब आता है कि वो अपने अपनो से ही जब ठुकराया जाता है तब उसे ये ख्याल आता है कि क्या खोया और क्या पाया , क्या अपने लिए ज़िन्दगी में कुछ बचा पाया , कोई अपना हिस्सा जिसके साथ बाकी की उम्र तमाम की जा सके , जिसके साथ कुछ पल अपनी ख्वाहिशों को दिए जा सकें , तब हाथ खाली होने का अहसास होता है मगर आज की दौड भाग की ज़िन्दगी में ये वक्त अब पहले ही आने लगा है , सभी अपने आप में खुद को अकेला महसूस करते हैं और जब ऐसा होता है तब उन्हें लगता है कुछ स्पेस अपने लिए भी होनी चाहिए फिर चाहे भीड में ही क्यों न रहें , निकल पडते हैं अपने साथ अपनी राहों पर और जी लेते हैं सुकूँ के कुछ पल अपने साथ तो एक नयी ऊर्जा का संचार हो जाता है और इंसान जीने लगता है ज़िन्दगी दुगुने जोश से मगर नहीं चाहता कोई दखल अंदाज़ी अपने अपनो की भी उसमें क्योंकि वहाँ वो खुद से बतियाता है , अपना आत्मावलोकन करता है , अपनी खोज करता है , खुद ही प्रश्न करता है और खुद ही जवाब खुद को देता है , एक ऐसा निजत्व जहाँ खुद ही मुजरिम, खुद ही जज और खुद ही जज होता है और इंसान जब खुद जज होता है तो सही निर्णय लेता है और जीवन को जीने के सूत्र उसे खुद से ही मिल जाते हैं , कैसे खुशहाल रहा जाए और कैसे सबको खुश रखा जाए जैसे हर समस्या का हल वो अपने अन्दर ही पा लेता है । ये तो बात हुई उसके अपने स्पेस की जहाँ वो खुद के साथ होता है ।  दूसरी बात है रिश्तों में स्पेस देने को जो बहुत जरूरी है । हम किसी के प्रति इतने संवेदनशील होते हैं कि वो उसमें घुटन महसूसने लगता है तो जरूरी है रिश्ते को बनाए रखने के लिए एक दूसरे को थोडा स्पेस दें फिर वो रिश्ता दोस्ती हो या जीवनसाथी का या बच्चों का । हर रिश्ता एक स्पेस चाहता है जहाँ वो किसी का भी हस्तक्षेप नहीं चाहता तो उस बात को समझना बहुत जरूरी है ऐसे वक्त में सिर्फ़ अपनी बात कह दो और हट जाओ या कहो कि उन्हें खुद निर्णय लेने के लिए जगह दो ताकि उन्हें तुम मे एक अपना शुभचिंतक दिखाई दे न कि डिक्टेटर या उस रिश्ते का थोपना महसूस हो तब हर रिश्ता बचा रह सकता है , एक गहरी साँस ले सकता है जिसमें ताज़गी होगी । अब प्रश्न है क्या ऐसा होना हर जगह और हमेशा संभव है तो ये एक ऐसा प्रश्न है जिस पर ध्यान देना जरूरी है कि हर जगह और हमेशा शायद ऐसा संभव नहीं क्योंकि जरूरी नहीं हर जगह परिस्थितियाँ इंसान के अनुकूल हों , या हमेशा मनचाहा मिलता रहे , समझौते तो करने ही पडते हैं , अपने लिए जगह बनाने के लिए भी पहले एक लडाई खुद से करनी पडती है फिर समाज से उसके बाद भी हम चाहें कि वो जगह सुरक्षित रहेगी हमेशा तो बहुत मुश्किल है , उसे बनाए रखने के लिए खुद को सजग प्रहरी बन पहरा देना होता है तब भी कहीं न कहीं से किसी न किसी दरार से झाँकने ही लगते हैं हस्तक्षेप , उस वक्त जरूरत होती है खुद को बचाए रखने की और समयानुसार निर्णय लेने की तभी संभव है अपने लिए जगह बनाना फिर वो घर हो या समाज या रिश्ते । बस जरूरत है अपनी स्पेस को संभाले रखने की , अपने निजीपन को बचाए रखने की फिर कोई ताकत नहीं जो तुमसे तुम्हारी जगह छीन ले फिर वो चाहे हमेशा हर जगह संभव हो या नहीं , निजत्व बचा रहे तो मुमकिन है हमेशा अपने दायरे में जीना ।

रश्मि प्रभा - एक वक़्त आता है, जब खोने-पाने का हिसाब होता है, आरंभ में ही अतिरेक से बचा जाए तो मुमकिन है अपने लिए सोचना, समय निकालना ! बहुत बारीक रेखा होती है इस सोच की, न मिटी तो जगह है, अन्यथा  … ! कई बार व्यक्ति सकारात्मकता को भी नकारात्मक रूप से ले लेता है और उलझ जाता है। समझौता तो ज़िन्दगी का सार तत्व है  …

सुशील कुमार 

बहुत कठिन है 
बचा लेना कुछ 
जगह खुद के लिये 
होती ही नहीं है 
ऐसी कोई जगह 
अपना कुछ 
अपने ही लिये 
कैसे जिये कोई
कमरे में भरी 
हवा में जैसे 
बारी बारी से 
लेनी हो साँस 
थोड़ी थोड़ी 
थोड़ी देर के 
लिये ही  :) 

रश्मि प्रभा - यह भी सही है, कब कहाँ निस्तैल हो जीवन खत्म हो जाए, वहाँ एक आंतरिक भय के आगे कोई जगह नहीं रह जाती ! लोग स्पेस चाहते हैं, भयभीत आदमी लोगों का साथ - बड़ी मुश्किल होती है !!!

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 

"निरंतर" की कलम से....

निजी स्वंत्रता ,निजी दायरा,स्पेस अथया निजी ज़िंदगी, निजी स्वतंत्रता,निजी दायरा,स्पेस अथया निजी ज़िंदगी कहो 

एक ही बात है,कुंठा रहित,व्यथा रहित ख़ुशी जीवन के लिए सर्वोपरि हैं.इन्हें पाना मनुष्य का अधिकार ही नहीं आवश्यकता भी है,यहां तक की ,पति पत्नी में,माता पिता एवं संतान में ,मित्रों में भी निजी स्वतंत्रता होनी चाहिए 

कोई कितना भी प्रयास करे अथवा चाहे लोग निजी दायरे में प्रवेश नही करें  पर उन्हें ऐसा करने से रोकना पूर्णतया संभव नहीं होता,विदेशों की अपेक्षा भारत में यह अधिक है.

वैसे भी जिज्ञासा,स्वार्थ एवं होड़ मानव स्वभाव है,इनकी पूर्ती के लिए लोग दूसरे  के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं ,साथ ही जो लोग दूसरों से खुद को अधिक समझदार मानते हैं वे इसे सिद्ध करने के लिए ,अपनी बात मनवाने के लिए,जिज्ञासा, स्वार्थ एवं होड़ की पूर्ती के लिए,अपना प्रभुत्व जमाने के लिए हर समय दूसरों के निजी दायरे में अतिक्रमण का प्रयास करते हैं,कई बार सफल भी हो जाते हैं ,उनकी सफलता का कारण उनका प्रयास या इच्छा ही नहीं अपितु,सामने वाले की कमज़ोरी,सम्बन्ध को बिगाड़ने से बचाने का सोच,शर्म,अथवा ऐसा करने वाले  को सम्मान भी हो सकता है (जैसे घर में रिश्तों में पति को ,बड़े बूढ़ों को,गुरु को अग्रज को आदि आदि) पर इससे भी बचा जा सकता है,नम्रता से मन की बात कही जा सकती है,लोगों को हतोसाहित  करने के लिए एक गुरु मन्त्र  भी भली भाँती कारगर सिद्ध होता है,"जब हाँ नहीं कहना चाहते हो,ना कहना सीखना चाहिए ",आरम्भ में इसका विरोध होगा ,लोगों को अच्छा नहीं लगेगा,वे इसे घमंड या अहम कहेंगे पर धीरे धीरे समझ जाएंगे आपके साथ सीमा से अधिक स्वतंत्रता लेने का प्रयास तक  आपको अच्छा नहीं लगेगा,कुछ लोग नाराज़ भी होंगे पर निजी अधिकारों की रक्षा के लिए इतना तो करना ही पडेगा,साथ ही उसका नतीजा सहने के लिए खुद को तैयार भी रहना पडेगा,मज़बूत भी बनाना पडेगा.

रश्मि प्रभा - निजी अधिकारों यानी स्पेस के लिए अधिकतर आदमी बुरा हो जाता है और एक समय ऐसा आता है जब सिर्फ स्पेस रह जाता है, सिर्फ स्पेस !!!

....यह चर्चा अभी जारी है, समय एक विराम का, मिलती हूँ थोड़ी देर में ....

7 comments:

  1. bahut acchi charcha . puraane blogger mitro se jaise milna hi ho gaya ho .
    thanks

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  2. एक विमर्श को सार्थकता प्रदान करने और विचारों को एक मंच पर लाने का आपका प्रयास सराहनीय है दी …………हार्दिक आभार

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  3. बढ़िया चर्चा रही , अच्छा लगा ! आभार रश्मि जी .....

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  4. वाह एक नया अंदाज बहुत खूब । स्पेस :) और सम्मान देने के लिये दिल से आभार रश्मि जी ।

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  5. समाज, एक नि‍रंतर बदलती प्रक्रि‍या का भी नाम है. मेरे लाख चाहने से भी वही होता है जो मेरे बूते से बाहर है...

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  6. इन सुधिलेखकों के विचार जानकर यह लगा कि यह स्पेस उनसे उनके अपने स्पेस के विषय में अपने निजी विचार रखने का एक मंच प्रस्तुत कर रहा है. पहली बार लग रहा है कि जिन्हें हम ब्लॉग पर उनकी रचनाओ6 के माध्यम से जानते रहे हैं, उन्हें उनके रूप में देख रहे हैं!!

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