स्वागत है आप सभी का ब्लॉगोत्सव-२०१४ के  द्वितीय दिवस की प्रथम प्रस्तुति में 






मैंने बारिश की एक बूंद 
अपनी हथेली में छुपा ली है 
रख दूंगी इसे गंगा में 
इस चाह के साथ 
कि किसी दिन यह सागर से मिले 
इसकी विस्तृत पावन लहरें 
शिवालय तक पहुंचे  …    

                  रश्मि प्रभा 



परिकल्पना ने इस बार अपने उत्सवी मंच पर अन्य भाषाओँ को भी आमंत्रण दिया है, यह है उसकी पहली बानगी अंग्रेजी - जो आपस में जोड़ने का काम करती है कई भाषियों को -

~~गुंजन झाझरिया की दो  कविताएं ~~

Poem: I'm a River
You are a fountain,
Who knows,
all the directions,
Eye-catching,
Colurful,
Equally flows,
In all the directions,
Still you dnt knw,
How to be in one,
Though,
I am running
just like a river,
Who knows,
Only one direction,
One passion,
knows waiting,
Desire to meet sea,
disapear in the sea,
Yes,
My fountain,
I love my way,
To be ME.....
Yes,
I love to be,
In one direction...
Yes,
I am unaware with rest,
So what,
Its The nature,
I want to go,
Go with the flow....
Yes,
I am a River...

हिंदी रूपांतरण.......

"मैं एक नदी हूँ।"
तुम फव्वारे हो,
जो जानता है,
सभी दिशायें,
आकर्षक,
रंग-बिरंगा,
चारों ओर बराबर बहने वाला,
फिर भी,
तुम नहीं जानते,
एक दिशा में बने रहना,
हालाँकि,
मैं बहती हूँ,
नदिया के जैसे,
जो जानती है,
केवल एक दिशा,
एक जूनून,
जो जानती है,
केवल इंतज़ार,
सागर में मिलने की इच्छा,
हाँ,
मेरे प्रिय फव्वारे,
मुझे प्यारा है,
अपना तरीका,
मेरा 'स्वयं' बने रहना,
हाँ,
मुझे प्यारा है,
एक दिशा में डटे रहना,
हाँ,
हूँ अनभिज्ञ,
बची दिशाओं से,
तो भी क्या,
यही प्रकृति है,
मैं चाहती हूँ बहना,
धाराप्रवाह बहना,
हाँ ,
मैं एक नदी हूँ।

Poem: we forget
Let's play with
Matchsticks again,
Come nd play game,
Exactly the same,
Try to make a rhyme,
Of every single talk,
Will fit another lines,
For every single song,
Laugh and cry,
Without reasons,
will stop,
Bleeding knee,
With the help of,
sand and dirty clothes,
Will wonder,
How the wind is blowing.
Will be worried,
In this hot summer,
Why ll roadside dogs,
Need to suffer.
....
Yes, I know,
As we grow up,
We learn new things,
But do you know,
We forget,
How to fly in the sky,
With the wings.


हिंदी रूपांतरण...... 

"हम भूल गए"
चलों खेलें,
माचिस की डिब्बियों से,
आओ और खेलो खेल,
बिलकुल वैसे,
हर बात पर,
कोशिश कविता बुनने की,
हरेक गाने में,
नई पक्तियां गढ़ने की,
हँसना और रोना,
बिना किसी कारण के,
रोकेंगे बहते घुटने,
मदद लेकर,
मिटटी और गंदे कपड़ों की,
चकित होंगे,
कैसे बहती हवा है?
चिंतित होंगे,
सड़क के किनारे,
यह भीषण गर्मी,
क्यों सहते हैं कुत्ते?
हाँ जानती हूँ,
जैसे हम बड़े हुए,
नई चीजें सीखी हमने,
पर क्या जानते हो तुम,
हम भूल गए,
आसमान में,
कैसे उड़ा जाता है?
पंखो के सहारे।



गुंजन झाझरिया 

मुझे भी बनाना है,एक सपने को हकीक़त।शनै: शनै: जैसे,सूर्य बनता यथार्थ प्रभात में,या चौथ का चाँद, अचानक सत्य हो उठता है। गुंजन" नाम के गुण रखने वाली एक लेखिका हैं। पिछले 5 साल से हिंदी साहित्य में बतौर लेखिका अपना योगदान दे रही हैं। शिक्षा- नेट, एम.बीए. , बी.एससी। पेशा- व्याख्याता (व्यापारिक प्रबंध)। ब्लॉग: अहसास *****




अब समय है एक छोटे से विराम का, मिलती हूँ एक छोटे से विराम के बाद.......... 


7 comments:

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