ब्लॉगोत्सव में जितना अर्थ ब्लॉग का है
उतना ही सार्थक अर्थ है टिप्पणीकार का 
एक बेहतरीन टिप्पणी लिखनेवाले का हौसला बढ़ाती है 
साथ ही उस टिप्पणी से रचनाकार के लेखन का सम्मान होता है 
और रचना की एक सारगर्भित व्याख्या होती है  … आज उन विशेष टिप्पणियों को हम मंच पर लाते हैं  … 

रश्मि प्रभा 


ज़िंदगी और मौतदोनों एक साथ… | Mhare Anubhav  पर यह टिप्पणी -


KAILASH SHARMA
जीवन और मृत्यु एक ऐसी अनबूझ पहेली है जिसका हल सदैव रहस्यमय है. शायद इसी में इसका आकर्षण है…एक सिक्के के दो पहलू जो साथ रह कर भी अलग हैं…बहुत गहन चिंतन…


Digamber Naswa
मैं का अस्तित्व मिटाना भी क्यों ...? अपने होने का एहसास भी तो यही मैं ही है ..
भावपूर्ण रचना ...


चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…http://chalaabihari.blogspot.in/
मुनव्वर साहब फरमाते हैं कि 
मैंने लफ़्ज़ों को बरतने में लहू थूक दिया,
आप तो सिर्फ ये देखेंगे गज़ल कैसी है!इसलिए सिर्फ ऐसा नहीं कि लफ़्ज़ों की चाशनी में शब्द लपेटकर पेश करने से कविता बनती है.. कल ही एक अज़ीम शायर इंतकाल फरमा गए.. जनाब अदम गोंडवी.. उनका मजमुआ पढकर मुंह कसैला हो जाता है... और कमाल ये कि हम ये भी नहीं सोचते कि उस शायर ने यह सब जिया था!!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…http://devendra-bechainaatma.blogspot.in/
कविता में आये भाव से असहमत। 

कितना कठिन है एक प्यारा गीत लिखना
कितना सरल है उसे हंसते हुए गुनगुना देना।

कवि कवि में फर्क होता है..अदम गोंडवी को ही लें..उन्होने जीया है जिंदगी को..जो आक्रोश उनकी गज़लों में है वो फकत शब्दों की जादुगरी नहीं है। यह हो सकता है कि हम आप सुविधानुसार शब्दों से खेलते हों मगर कुछ हैं जो जीते भी हैं। चलिए मान लिया शब्दों की बाजीगरी है फिर भी उस बाजीगरी को रचते वक्त कवि ह्रदय में एक भाव जगे जो समाज को दिशा दे सकते हैं..भले ही वो खुद ना चल पाये उस पर। यह भी कम नहीं है। भाव भी सच्चे ना हों तो कवि क्या खाक कविता लिखेगा। फकत उपदेश गर्त में मिल जाते हैं..कोई नहीं पढ़ता..कोई प्रभावित नहीं होता।
आपकी गज़लों को..कविताओं को पढ़कर मुझे सुख मिलता है..मैं यह मान ही नहीं सकता कि वे सिर्फ शब्दों की बाजीगरी हैं....इस कविता में भी कुछ तो है जो मैं इतना लिख गया..इसमें आये भाव से असहमत होते हुए भी।

Anurag Sharma
@ कैसे सिकुड़ा तुम्हारा आकाश ... 

- ओह। प्रिय सकुशल हो, नज़रों के सामने, यह भी बड़ी नियामत है। छोटी सी ज़िंदगी में भी बड़े समझौते है। जिनके लिए हैं, उन्हें दिखें यह ज़रूरी भी नहीं। :(

ताऊ रामपुरिया
वे ही पूछते हैं अब मुझसे
क्यों उपजाए अपनी चाहतों के
तुमने इतने छोटे फूल, फल
कैसे सिकुड़ा तुम्हारा आकाश।

बोनसाई के बिंब से मानव मन की पूरी व्यथा कथा उंडॆल दी आपने, बहुत शुभकामनाएं.

arvind mishra
हम यह क्यों न समझे कि यह बोनसाई उस विराट की ही प्रतिकृति है !

प्रवीण पाण्डेय
नियन्त्रण कर सकने की चाह में हम अपनी चाहतों को बोन्साई बनाये रखते हैं।


देवांशु निगम
लास्ट इयर की ही बात है, ये फिनिक्स में देखा था | आधी रात के आसपास अचानक से हेलोकोप्टर की आवाज़ आने लगी, बाहर जाकर देखा तो पुलिस सर्चलाईट डाल रही थी और सरेंडर करने के लिए अनाउन्स्मेंट कर रही थी | आखिर में पकड़ कर ही माने थे |

सड़कों पर भी कार चलाते हुए डर बना रहता था कि कहीं कोप छुप के ना बैठा हो पकड़ने के लिए , अगर ओवरस्पीडिंग की तो | एक बार एक लाईट पर एक कार ने बहुत जोर से ओवरटेक किया था , दो लाईट बाद ही पुलिस वालों ने कार को रोक रखा था | ट्रैफिक अपने आप कंट्रोल में रहता है |

पकड़े जाने का डर भी है और जो फाइन लगता है वो लोगो कि कमर तोड़ देता है | दिल्ली कांड जिस बस में हुआ वो कुछ महीने पहले ही अवैध लाइसेंस के लिए पकड़ी गयी थी, और मात्र २२०० रुपये के हर्जाने पर छूट गयी थी |

वाणी गीत
आपसे सहमत हूँ शिखा की दूसरों की संस्कृति के बारे में हम बहुत बात कर लेते हैं , मगर अपनी और से आँखें मूंदें है कि हमने अपने देश का क्या हाल कर दिया !!

smt. Ajit Gupta
मैं जब अमेरिका गयी थी, तब वहां से लौटने के बाद यही कहा था और आज तक कहती हूं कि वहाँ प्रशासन का डर मन में बसा है और हमारे यहाँ डर ही नहीं है। वहां राष्‍ट्र निर्माण में जनता की भागीदारी है, वे अपना टेक्‍स देते हैं और इसके बाद अपनी सुरक्षा की गारण्‍टी चाहते हैं। भारत में हम टेक्‍स देना नहीं चाहते इसलिए सुरक्षा की बात भी जोर देकर नहीं कह पाते। अब नयी पीढ़ी निकलकर बाहर आ रही है, यह शुभ संकेत है।

कौशलेन्द्र
अनुशासन के लिये प्रशासन और प्रशासन के लिये विवेकसम्मत दण्डविधान ....समाज की सुव्यवस्था के लिये आवश्यक है यह। थोड़ा विषयांतर करना चाहूँगा आर्यपुत्री! भारत का ब्रिटिशकालीन इतिहास उनकी अन्यायमूलक न्यायव्यवस्था और दमन की घटनाओं से परिपूर्ण है। उनके उत्तरवर्ती शासकों(मैं शासक ही कहूँगा, लोकतंत्र कहकर लोकतंत्र का परिहास करने की धूर्तता नहीं करूँगा)ने ब्रिटिशर्स से उनकी सारी बुराइयाँ लेकर बड़े गर्व से ग्रहण कीं। और न केवल ग्रहण कीं अपितु उन बुराइयों को ही चरम तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया। समझने की बात यह है कि वे विदेशी थे हुकूमत के लिये आये थे ...व्यापार और लूट के लिये आये थे। उन्होंने लूटधर्म का पालन किया। भारतीय हुक्मरान तो व्यवस्था बनाने और स्वशासन देने के लिये आये थे, क्या दिया? एक शर्मनाक अव्यवस्था की परम्परा.... जिसकी जड़ें इतनी मज़बूत हो गयी हैं कि अब कोई बड़ी क्रांति ही इनका उन्मूलन कर सकेगी। यह क्रांति भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की क्रांति से भी बड़ी और दुष्कर होगी। आज़ादी के बाद लोग बदले व्यवस्था और तरीके नहीं। पुलिस का तौर-तरीका वही रहा ...दमनात्मक। अधिकारी स्वयं को किसी हुक्मरान से कम नहीं समझते, हर व्यक्ति के अंतर्मन में एक स्वछन्द राजा बैठा हुआ है जो अपनी पूरी क्षमता और शक्ति से समाज में दमनचक्र चला रहा है। निहत्थों पर लाठीचार्ज ...यहाँ तक कि गोलीकाण्ड तक स्वतंत्र भारत में किया जाना व्यवस्था का स्वीकृत भाग बन चुका है। हम हर बार क्रांति की आशा करते हैं किंतु चुनाव के परिणाम हमें निराश करते हैं। वे ही चेहरे हर बार नया मेक अप करके आ जाते हैं। आम आदमी के अन्दर अभी तक आग नहीं लग पायी है। कोऊ नृप होहि हमैं का हानी ...को अपनी बुज़ादिली की ढाल बना लिया है लोगों ने।


अपूर्व
साहिर साहब का एक शे’र जो भूत बन कर सर पर चढ़ा बैठा है , याद आता रहता है हरदम अटके रिकार्ड की तरह
चंद कलियाँ निशात की चुन कर, 
मुद्दतों मह्बेयास रहता हूँ
तुमसे मिलना खुशी की बात सही, 
तुमसे मिल कर उदास रहता हूँ

क्यों..क्यों परेशान करता है यह शेर इतना..शायद आपकी रचना इसका जवाब दे...मगर कोई जरूरी भी नही है हर चीज का जवाब!!!
आगे कब लिखोगे..और क्या?

सागर
आदतन मुझे भी आपका यही रूप रंग सबसे ज्यादा भाता है. पहला और चौथा बेजोड़ है ... बेशक इसका कोई जोड़ है ना तोड़ ... दिल की बात, एकदम मौलिक... बिना मिलावट... खरा... 
लिखने की कोशिश में उभरने वाले /बाधा डालने वाले बिम्ब कमाल के हैं. रुकावटें तो पढ़ी थी पर अब तक इस तरह के बिम्ब के दर्शन नहीं हुए थे... शायद में बहुत कम पढता हूँ यह भी एक वजेह रही हो... ब्लॉग का नया कलेवर भी बहुत उम्दा है. लिखना /जीना, परिचय सबसे मिला तो यह फ्लेवर भी.

Priya
पूजा, मूड अच्छा है मेरा ....और तुम्हारी पोस्ट ने तो और अच्छा बना दिया....तो फिर तारीफ करूँ क्या तुम्हारी ? इन लहरों से वापस जाने का मन ही नहीं करता....जी चाहता है की पूरी तरह भीग जाऊं और फिर छींकती हुई वापस जाऊं.......ये जों ड्रॉपर और पेन वाला किस्सा है ना बहुत अपना सा है .....कुल मिलाकर खुद का एक हिस्सा छोड़ कर जा रहे हैं यहाँ.....High five for writer :-)


गिरिजा कुलश्रेष्ठ
भावनाओं की बहुत गहरी परतें खुल जातीं हैं अचानक । यह सही है कि संवेदनशील लोग चाहे महिला हो या पुरुष बहुत जल्दी भावात्मक रूप से जुड जाते हैं । मुश्किल तब होती है जब दूसरा पक्ष इसका गलत अर्थ निकाल कर भावनाओं का दुरुपयोग करता है और जिन्दगी बिखर जाती है । खडगसिंह एकदम विलुप्त तो नही हुए हाँ बहुत कम रह गए हैं । खैर..
आपका मुझे उस तरह तलाशना , बडी बहिन का सम्मान देना और मेरी रचनाओं को एक स्थान देना एक उपलब्धि जैसा है । और क्या कहूँ ।

Satish Saxena
ब्लॉग जगत में आप जैसे लोग भी दुर्लभ हैं , अगर भाषा का आनंद लेना है तो जो आनंद मुझे आपके ऊबड़ खाबड़ माधुर्य पूर्ण लेखन में मिलता है वह कहीं संभव नहीं हुआ ! आपकी विद्वता और अनूठी शैली के संगम को, हो सकता है लोग समझने में अभी बरसों लें, मगर आपका यह प्रवाह , हिन्दी को नयी दिशा और सोंच देने में समर्थ हुआ है ! अगर मुझे अपना मनचाहा गुरु बनाने को कहा जाए तो वह निस्संदेह 
सलिल वर्मा ही होंगे !

संजय @ मो सम कौन...
विश्वास और अविश्वास दोनों का अस्तित्व हमेशा से रहा है और रहेगा, न सब बाबा भारती हो सकते हैं और न ही सब खडगसिंह। सिक्स्थ सेंस सक्रिय हो तो प्राय: निराश होने का अवसर न ही आये।
जिन एक दो घटनाओं का जिक्र आपने किया, बिना इजाजत किसी का नंबर दूसरे को न देना गलत नहीं। स्वाभाविक है आपने भी इसे गलत नहीं ही समझा होगा तभी तो उनसे आपके संबंध ओइसहिं बने रहे :) साल भर बाद उन्हीं का फ़ोन आपके पास आना आपकी छवि की जीत ही है।
विश्वास तोड़ना नमकहरामी से कम नहीं, इस बारे में गुरुग्रंथ साहब को लिपिबद्ध करने वाले भाई गुरदास जी की एक कथा है, कभी सात्विक मोड में होऊंगा तो आपसे शेयर करूंगा :)
फ़िलहाल तो सबका मंगल हो कल्याण हो, यही कामना करता हूँ।


टिप्पणियों का यह सिलसिला जारी है, मिलती हूँ एक छोटे से विराम के बाद........

6 comments:

  1. वाह । बिल्कुल वैसा ही जैसा मेरी सोच में था । आभार ।

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  2. ब्लागोत्सव ने पुराने लोगों से नाता तोड़ लिया लगता है। एक समय वह भी था जब मुझसे चैट पर ब्लागोत्सव के लिए रचनाएँ मांगी जाती थी। चलो ठीक है, मेरी शुभकामनाएँ है ब्लॉगोत्सव के साथ।

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