मैंने भूत देखा है  … 
धत्त् भूत वूत कुछ नहीं होता  … 
तो फिर आत्मा भी नहीं होती  … 
आत्मा होती है  … 
तो मानना होगा कि आत्मा जब तक शरीर नहीं पा लेती 
तब तक भूत कहो या आहट या छाया 
उस रूप में घूमती है  …  चलो इस बहस में उलझने से बेहतर है भूत की कहानियाँ पढ़ें  … 

  रश्मि प्रभा 


पं. प्रभाकर पांडेय “गोपालपुरिया” के द्वारा प्रस्तुत की गई हैं इस कथन के साथ -

"यहाँ दी गई भूतही कहानियों को केवल मनोरंजन के रूप में देखें। यहाँ दी गई अधिकतर कहानियाँ श्रुति पर आधारित है। मेरा उद्देश्य पाठकों को मनोरंजन प्रदान करना है न कि आधुनिक समाज में भूत-प्रेत के अस्तित्व को बढ़ावा देना। सादर धन्यवाद।"

तो मनोरंजन के लिए, कुछ डरने-डराने के लिए पढ़िए  .... मैं तो चली 

वह भूतनी नहीं, मेरे लिए भगवान थी


रमेसर काका जब यह भूतही कहानी सुनाना शुरू किए तो हम मित्रों को पहले तो थोड़ा डर लगा पर बाद में भूतों से हमदर्दी होने लगी। हमने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक भूतनी भगवान बनकर सामने आ जाएगी और अपनी जान पर खेलकर किसी की जान बचा जाएगी। जी हाँ। यह कहानी एक ऐसी ही भूतनी की है, जो मकरेड़ा से टिकरहिया जाने वाली छोटी लाइन पर घूमते रहती थी और लोगों के साथ ही जानवरों आदि की जान भी बचाया करती थी।

बात बहुत पहले की है। एक बार रमेसर काका अपने बेटे से मिलने लखनऊ गए हुए थे। वे शाम को लगभग 4 बजे लखनऊ से ट्रेन पकड़कर मकरेड़ा के लिए रवाना हुए। मकरेड़ा पहुँचने में रात के करीब 10 बज गए। मकरेड़ा पहुँचने के बाद उन्होंने सोचा कि शायद इस समय टिकरहिया जाने के लिए कोई गाड़ी मिल जाए। टिकरहिया और मकरेड़ा के बीच मात्र 6-7 किमी की दूरी थी और इस रूट पर एक-दो पैसेंजर गाड़ियाँ दौड़ा करती थीं। पर मकरेड़ा से टिकरहिया होकर आगे जाने वाली रातवाली पैसेंजर निकल चुकी थी। अब रमेसर काका क्या करें, पहले तो उन्होंने वह रात स्टेशन पर ही गुजारने की सोची पर फिर पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि अपना झोला-झंटा उठाए और रेल की पटरी पकड़कर मकरेड़ा से टिकरहिया की ओर चल दिए। टिकरहिया में स्टेसन से थोड़ी ही दूर पर उन्होंने एक झोपड़ी डाल रखी थी और उसी में चाय-पकौड़ी आदि बेचा करते थे।

रमेसर काका निडर होकर तेजी से पटरी के किनारे-किनारे आगे बढ़े चले जा रहे थे। उन्हें तो देर-सबेर, पैदल ही पटरियों से होकर इधर-उधर आने-जाने की आदत थी। अस्तु उस काली रात में भी वे तेजी से ऐसे बढ़े चले जा रहे थे जैसे दिन का प्रकाश हो। अभी रमेसर काका लगभग 1 किमी तक बढ़े होंगे तभी उन्हें पटरी के बीच एक बकरी मेंमियाती हुई नजर आई। उन्होंने पास जाकर देखा तो एक बकरी जिसके गले में पगहा बँधा था और वह पगहा पटरी के बीच में फँस गया था। पहले तो रमेसर काका के दिमाग में यह बात आई कि आखिर इतनी रात को यह बकरी यहाँ कैसे आ गई और अगर कोई लेकर आया था तो इसे छोड़कर क्यों चला गया। खैर रमेसर काका ने और अपने दिमाग पर जोर न डालते हुए उस बकरी के फंसे पगहे को निकालनी की कोशिश शुरु कर दी। पर पगहा इस तरह से फँसा हुआ था कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था।

इसी दौरान उस लाइन से होकर एक मालगाड़ी धीरे गति से आगे बढ़ रही थी। रमेसर काका उस बकरी के पगहे को निकालने में इतने मशगूल थे कि उन्हें आती हुई ना मालगाड़ी की सुध थी और ना ही उन्हें उसकी आवाज सुनाई दे रही थी। धीरे-धीरे वह मालगाड़ी रमेसर काका के काफी करीब आ गई। अरे यह क्या अब जाकर रमेसर काका को मालगाड़ी का आभास हुआ और वे कूदकर पटरी पर से हटना चाहे, पर यह क्या वे ज्यों कूदकर भागना चाहे त्योंही उस बकरी ने विकराल रूप पकड़ लिया। ऐसा लगता था कि बकरी के रूप में कोई दैत्य है, अब तो रमेसर काका थोड़ा डर भी गए और उस बकरी ने भागते रमेसर काका की धोती ही मुँह में दबाकर पटरी की ओर खींचने लगी। अब रमेसर काका एकदम से असहाय हो गए थे और पसीने से पूरी तरह भींग भी गए थे। अब वह मालगाड़ी और भी करीब आ गई थी, ऐसा लगता था कि अब उनका जीवन नहीं बचेगा। मौत एकदम से उनके सर पर खड़ी नजर आ रही थी, उनका धैर्य और बल भी जवाब देने लगे थे और वे न चाहते हुए भी पटरी की ओर खींचे चले जा रहे थे।

अचानक कुछ ऐसा घटा जो रमेसर काका की समझ से परे था। अचानक एक 15-16 साल की सुंदर कन्या प्रकट हो गई और देखते ही देखते उसने उस बकरी के मुँह से रमेसर काका की धोती छुड़ाने लगी। अब तो वहाँ का दृश्य बहुत ही भयंकर हो गया था, रमेसर काका पूरी तरह से डरे-सहमे थे पर इस किशोरी के आने से उन्हें थोड़ी राहत मिली थी। अब मालगाड़ी लगभग 10 मीटर की दूरी पर आ गई थी। अब तो उस बकरी और उस किशोरी की लड़ाई और भी भयंकर हो गई थी, अचानक उस किशोरी ने बकरी के मुँह से धोती को छुड़ाने में सफल हुई और तेजी से रमेसर काका को धक्का दे दी। अब रमेसर काका पटरी से थोड़ी दूर जाकर गिर गए थे। वे गिरे-गिरे अपने पास से मालगाड़ी को गुजरते हुए देख रहे थे और साथ ही यह भी कि पटरी पर अभी भी उस बकरी और किशोरी में भयंकर लड़ाई चल ही रही है। रमेसर काका अचानक एकदम से डर गए, उनके डरने का कारण यह था कि अभी तक तो वे केवल उन दोनों की लड़ाई और गुजरती हुई मालगाड़ी को देख रहे थे पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि वह बकरी और किशोरी उसी पटरी पर लड़ रहे हैं जिसपर से मालगाड़ी गुजर रही है पर इन दोनों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था और ना ही वे दोनों मालगाड़ी के पहियों के नीचे आ रहे थे। और कभी-कभी नीचे भी आते तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। अब तो रमेसर काका एकदम से पीले पड़ गए पर उन्हें इस बहादुर भूतनी लड़की के बारे में पता था। उन्होंने कई लोगों से इस बहादुर भूतनी के किस्से सुन चुके थे जो रेलवे लाइन के आस-पास मुसीबत में पड़े लोगों, जानवरों आदि की जान बचाती रहती थी।

अब मालगाड़ी गुजर चुकी थी पर उन दोनों की लड़ाई अभी भी जारी थी। अचानक लड़की ने कसकर उस बकरी के पगहे को उसके गले में लपेटकर खिंचना शुरु किया। ऐसा लगा कि उस बकरी का गला पूरी तरह से दब गया और वह एक भयंकर आवाज में मेंमियाई। लड़की को पता नहीं क्या सूझा कि उसने उसका पगहा छोड़ दिया। पगहा छोड़ते ही वह बकरी मेंमियाते हुए पता नहीं कहाँ गायब हो गई। अब वह लड़की धीरे-धीरे रमेसर काका की ओर बढ़ने लगी। रमेसर काका थुक सटक लिए, उन्हें डर भी लग रहा था पर उन्हें यह भी पता था कि यह भूतनी उनका बुरा नहीं करेगी।

भूतनी धीरे-धीरे रमेसर काका के पास पहुँची। रमेसर काका अब उठकर बैठ गए थे। लड़की ने हाथ देकर रमेसर काका को उठाया और दूर पड़े उनके झोले को लाकर दे दी। अब रमेसर काका थोड़ा सहज हो गए थे। लड़की ने उन्हें अपने साथ-साथ चलने के लिए कहा. अब रमेसर काका उस लड़की के साथ तेज कदमों से पटरियों पर बढ़े चले जा रहे थे। कुछ दूर चलने के बाद अचानक रमेसर काका उस लड़की का हाथ छोड़ते हुए थोड़ा हकलाकर बोले, “बेटी! तूं कौन है? और इतनी रात को इस सूनसान जगह पर क्यों घूम रही थी।” लड़की पहले तो थोड़ा सिसकी पर फिर संभलकर बोली, “काका, 5-7 साल पहले मैं अपने माता-पिता के साथ इसी पटरी के किनारे एक मड़ई में रहती थी। मेरे माता-पिता छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते थे। मैं बकरियों को चराने का काम करती थी। अचानक एकदिन मेरे इसी बकरी (जो मुझसे लड़ रही थी) का पैर पटरी में फँस गया, तभी एक ट्रेन भी आ गई। मैंने उसे बचाने की बहुत कोशिश की और इस कोशिश में इस बकरी के साथ मैं भी भगवान को प्यारी हो गई।” इतना कहने के बाद वह किसोरी फूट-फूटकर रोने लगी। अब रमेसर काका की हिम्मत थोड़ी बढ़ी और उन्होंने प्रेम से उस किशोरी के सर पर अपना हाथ रख दिया। किशोरी थोड़ी शांत हो गई।

कुछ देर चुप्पी छाई रही, फिर रमेसर काका ने पूछा कि बेटी पर वह बकरी मुझे मारना क्यों चाहती थी? इस पर उस किशोरी ने कहा कि दरअसल उस बकरी को लगता है कि उसकी जान ड्राइवर ने ले ली थी और उसके बाद से वह हमेशा इंसान को मारने की कोशिश करती है जबकि मैं उसे बार-बार समझाने की कोशिश करती हूँ कि उसकी और मेरी मौत उस ड्राइवर के वजह से नहीं अपितु उसकी (बकरी की) गलती से हुई थी पर वह किसी भी कीमत पर यह मानने को तैयार नहीं है।

बातों ही बातों में रमेसर काका उस किशोरी के साथ टिकरहिया स्टेशन के पास पहुँच गए। लड़की ने कहा कि काका अब आप चले जाइए। मैं इसके आगे नहीं आ सकती। पर रमेसर काका ने उससे कहा कि बेटी, तूँ बहुत ही अच्छी है और मैं चाहता हूँ कि तूँ भी मेरे घर चले, मेरी बेटी जैसी रहे। काका की इन बातों को सुनकर वह किशोरी थोड़ी भावुक हुई पर ऐसा नहीं हो सकता कहकर जाने लगी।

रमेसर काका की मानें त वह किशोरी बराबर रमेसर काका को दिख जाती थी और कभी-कभी उन दोनों में बातें भी होती थी। एकदिन रमेसर काका ने उसकी आत्मा की शांति के एक छोटा सा अनुष्ठान कराया और उसके बाद कहते हैं कि वह किशोरी कभी नहीं दिखी। सायद उसकी आत्मा को मुक्ति मिल चुकी थी। कैसी लगी यह भूतही काल्पनिक कहानी? जय बजरंग बली।


चुड़ैल की दुखभरी कहानी, आ गया मेरे आँखों में भी पानी???

।।मैं ही हूँ।। 
रमेसर बाबू अपने कार्यालय में अपनी सीट पर बैठकर फाइलों को उलट-पलट रहे थे। उनका कार्यालय ग्रामीण क्षेत्र में था जहाँ जाने के लिए कच्ची सड़कों से होकर जाना पड़ता था। अरे इतना ही नहीं, कार्यालय के आस-पास में जंगली पौधों की अधिकता थी, कहीं कहीं तो ये जंगली पौधे इतने सघन थे कि एक घने जंगल के रूप में दिखते थे। कार्यालय के मुख्य दरवाजे को छोड़ दें तो बाकी हिस्से पूरी तरह से घाँस-फूँस आदि से ढंके लगते थे। कार्यालय के कमरों की खिड़कियों आदि पर लंबे-लंबे घास-फूँसों का साम्राज्य था। दिन में भी कार्यालय में एक हल्का अंधकार पसरा रहता था, जिससे ऐसा लगता था कि यह कार्यालय हरी-भरी वादियों में शांत मन से बैठा हुआ किसी गहरे चिंतन में डूबा हुआ हो। क्योंकि इस कार्यालय में कुल कर्मचारियों की संख्या मात्र 5 ही थी जिसमें से एक रामखेलावन थे, जो चपरासी के रूप में यहाँ अपनी सेवा दे रहे थे। रामखेलावन ही वह व्यक्ति थे जिनके कार्य-व्यवहार से यह शांत कार्यालय कभी-कभी मुखर हो उठता था और कर्मचारियों की हँसी-ठिठोली से जाग उठता था।

रामखेलावन जी, पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना कार्यालय के बाकी 4 कर्मचारियों को सुनाया करते थे। वे विशेषकर जब भी कार्यालय में प्रवेश करते तो सबसे पहले रमेसर बाबू के कमरे में जाते और राम-राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि बाबू कल तो गाँव में गजब हो गया था। रमदेइया को जंगल में चुडैल ने पकड़ लिया था तो मनोहर का सामना एक भयानक भूत से हो गया था। जबतक रामखेलावन जी सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत-प्रेत, गाँव-गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें कल (चैन) नहीं पड़ता था। कोई कर्मचारी रामखेलावन की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ-हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता। पर रामखेलावन की बातों को रमेसर बाबू बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच-बीच में हाँ-हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते।

एक दिन की बात है, रामखेलावन जी कार्यालय थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे रमेसर बाबू के कमरे में घुस गए। पर उस समय रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर नहीं थे, शायद वे अभी कार्यालय पहुँचे ही नहीं थे। रामखेलावन थोड़ा डरे-सहमे लग रहे थे और बार-बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे। वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही कार्यालय के प्रांगण में उन्होंने रमेसर बाबू को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा। वे दौड़कर रमेसर बाबू के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले, “बाबू, बाबू! कल रात को तो गजब हो गया। मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ?” रमेसर बाबू ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे-आगे तेज कदमों से अपने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किए। फिर एक कुर्सी पर रामखेलावन जी को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर एक गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ-ओथ धोए। उसके बाद कमरे में लगे हनुमानजी की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए रामखेलावनजी से बोले, “रामखेलावनजी, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए।” उनकी अनुमति मिलते ही रामखेलावनजी कहना शुरू किए, “बाबू, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे चुड़ैल ने धर लिया था। वह इधर-उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय-बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी। वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए। फिर गाँव के ही सोखा बाबा ने झाँड़-फूँक की उसके बाद उस चुड़ैंल से छुटकारा मिला। पर आज सुबह फिर से उस पर चुड़ैल हावी हो गई है, सुबह से ही सोखा बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं?”

रामखेलावन की बातों को सुनकर रमेसर बाबू थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे। रमेसर बाबू की यह हालत देखकर रामखेलावनजी तो और भी हक्के-बक्के हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत-प्रेत का साया नहीं पड़ गया? अभी रामखेलावनजी यही सब सोच रहे थे तभी रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले रामखेलावन को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए। कमरे से बाहर निकल कर रमेसर बाबू पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर रामखेलावन को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें। मैं कार्यालय में कुछ जरूरी काम-काज निपटाकर अभी 1-2 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ।

रामखेलावनजी बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें। रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि रमेसर बाबू को यहाँ आए 3 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत-प्रेतों को उतारना भी जानते हैं। कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ-मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए? पर रमेसर बाबू ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय-समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं। ना-ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते। यही सब सोचते-सोचते रामखेलावनजी घर पर पहुँच गए। घर के बाहर 10-15 गाँव-घर के ही लोग बैठे नजर आए। एक खटिया पर सोखा बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात-चीत कर रहे थे। रामखेलावनजी को देखते ही सोखा बाबा बोल पड़े, “रामखेलावन, यह चुड़ैल तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई। 2-3 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है, अभी भी आंगन में नाच-कूद रही है। मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी। इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरा जितना पावर था, वह सब अजमा लिया।”

रामखेलावनजी सोखा बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली। फिर रामखेलावनजी ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो। अगर ना-नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ। इसके बाद रामखेलावन की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई। अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही रामखेलावन जी की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई। अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था। उसका कूदना-नाचना बंद हो गया। रामखेलावनजी की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और रामखेलावनजी की ओर देखकर बोली, “बाबू, बाबू! भउजी को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं।”

बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए। आखिर जो चुड़ैल इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो-चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है? आखिर वे कैसे पत्ते थे? क्या किसी धर्म-स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे? वहाँ बैठे लोगों में से एक ने रामखेलावनजी की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही रामखेलावनजी ने उन पत्तों के बारे में बता दिया। सभी लोग बिन देखे उस रमेसर बाबू के प्रति नतमस्तक हो गए। सोखा बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके रमेसर बाबू तो बहुत पहुँचे निकले। जिस चुड़ैल को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे हथकंडे अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो-चार पत्तों ने बस में कर लिया। फिर तो रामखेलावनजी थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे रमेसर बाबू का गुणगान करने। अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेसर बाबू की साइकिल वहाँ रूकी।

रमेसर बाबू को देखते ही रामखेलावनजी दौड़कर रमेसर बाबू के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, रमेसर बाबू, आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया। अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है। रमेसर बाबू के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए और रमेसर बाबू की जयरम्मी करने लगे। रमेसर बाबू सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए। फिर रमेसर बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को घर में बाहर बुलवाया। वह काफी शांत थी पर रमेसर बाबू को लगा कि अभी भी वह चुड़ैल यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी। रमेसर बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे। अरे यह क्या, रामखेलावनजी की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी। मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए। उस चुड़ैल को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर रामखेलावनजी की काफी हिम्मत बढ़ गई। वे बोल पड़े, रमेसर बाबू, इसे छोड़िएगा मत। इसे जला कर भस्म कर दीजिए। पर वह चुड़ैल रामखेलावनजी की ओर ध्यान न देते हुए, रमेसर बाबू की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही।

रमेसर बाबू काफी गंभीर लग रहे थे। वे रामखेलावनजी की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं? इस पर वह चुड़ैल गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ। मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था। शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की। मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई। तब तक रात भी होने लगी थी। जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था। मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी। अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया। मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं। कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ। इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई। मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी। पर वह रात शायद मेरे जीवन की समाप्ति के लिए ही आई थी। मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था। आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक-ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा। उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो। अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं। मुझे देखते ही वह जोरदार ढंग से अट्टहास किया और मुझे कोई प्रेतनी ही समझ कर बोला कि तुम्हें पता नहीं कि यह मेरा निवास है। मैं कुछ जरूरी काम से जंगल से बाहर क्या गया, तूने मेरे बसेरे पर कब्जा कर लिया। मैं तूझे छोड़ूँगा नहीं, इतना कहकर वह मेरे तरफ झपटा, अत्यधिक डर से तो मेरी चींख निकल गई। मैं बहुत तेज चिल्लाई की मैं कोई प्रेतनी नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ इंसान। मेरी बातों को सुनकर तो वह और जोर से अट्टहास करने लगा और बोला कि मुझे एक संगिनी चाहिए। तुझे अगर सही-सलामत रहना है तो मुझसे विवाह करना होगा। मरता क्या न करता। मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा। मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी।

इतना कहने के बाद रामखेलावन की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट-फूटकर रोने लगी। रमेसर बाबू थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए। दो-चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया। मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो। एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो। कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं। कम से कम सैकड़ों भूत-प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ था। कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद-फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था। अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था। शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा। अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई। पूरा शरीर पीला पड़ गया। कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी। वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस प्रेतनी ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी इहलीला समाप्त हो गई थी। इतने कहने के साथ ही वह चुड़ैल फिर से रोने लगी थी।

इसके बाद रमेसर बाबू ने उस चुड़ैल को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी। चुड़ैल ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है। पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ। इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक-भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं। आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे। उस चुड़ैल की इस बात को सुनते हुए रमेसर बाबू हल्की मुस्कान में बोले। तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत-प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़। इसके बाद रमेसर बाबू ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस चुड़ैल से तीन बार कबूल करवाई तथा साथ ही उसे थूककर चाटने के बाद ही जाने दिया।

तो पाठकगण, रमेसर बाबू ने उस चुड़ैल से तो गाँव वालों को छुटकारा दिला दिया पर क्या वे दूसरे भूत-प्रेतों से उन गाँव वालों की रक्षा कर पाए??? राज को राज ही रहने दिया जाए। खैर आप लोग बताएँ कि यह भूतही काल्पनिक कहानी आप लोगों को कैसी लगी??? जय बजरंग बली।

http://sokhababa.blogspot.in/

अब समय है एक विराम का, मिलती हूँ एक छोटे से विराम के बाद.....

4 comments:

  1. मेरे पापा भी भूत के कहानी सुनाते थे और अभी ड्राइवर से सुन रही हूँ उनके अनुभव भूत के
    मुझे कभी पाला पड़े तो यकीन करूँ ना
    :) =))

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  2. सादर आभार। इन ब्लाग-रचना को यहाँ जगह देने के लिए।

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