खासियत अपनी खासियत के साथ भीड़ में अलग दिखाई देती है और याद दिला जाती है कि -
सिंह समूह में नहीं चलता 
हंस पातों में नहीं उड़ते 
अपनी पहचान वे अलग बनाकर चलते हैं


                
रश्मि प्रभा 


कुछ ऐसे ही ब्लॉग्स आज इस रंगमंच पर हैं -


साथ निभाने की जिम्मेवारी क्या सिर्फ एक पक्ष की है ??

तलाक /डिवोर्स जैसे शब्द लोगों को बहुत असहज कर जाते हैं. ये शब्द सुनते ही मस्तिष्क थोडा सजग, आँखें उत्सुक और कान चौकन्ने हो जाते हैं. जन्म-विवाह-मृत्यु की तरह इसे सामान्य रूप में नहीं लिया जाता. शब्द ही ऐसा है, दो लोग जो एक साथ जीने की तमन्ना  ले जीवन शुरू  करते हैं...सुख दुःख में साथ  निभाने का वायदा करते हैं अब एक दूसरे से अलग रहना चाहते हैं. 

सैकड़ों साल पहले,हमारे समाज में  जब वैवाहिक संस्था का निर्माण हुआ था . आदिम जीवन पद्धति छोड़ कर दो लोगों ने साथ रहने का फैसला किया तब जीवन भर साथ निभाने की जिम्मेवारी दोनों पक्षों की रही होगी  .फिर धीरे धीरे पुरुष इस जिम्मेवारी से खुद को मुक्त करता गया और परिवार बनाए रखने  की जिम्मेवारी स्त्री के कंधे पर डाल दी गयी . शायद इसलिए भी कि स्त्री शारीरिक रूप से कमजोर रही है और आर्थिक रूप से पति पर निर्भर . श्रम वह भी पुरुषों से कम नहीं करती थी/है पर शिकार करके  लाना, खेतों में हल चलाना जैसे शारीरिक श्रम वाले कार्य पुरुष ही करते थे और वे खुद को श्रेष्ठ समझने लगे. एक पत्नी के रहते उन्होंने दूसरी स्त्री से विवाह करना शुरू कर दिया .जबकि ज़िन्दगी भर साथ निभाने का वायदा तो पहली पत्नी के साथ था ,लेकिन उन्होंने  आसानी से वो कसम तोड़ दी जबकि स्त्री ने आजीवन उसे निभाया . 

हम अपनी पौराणिक कथाओं में पढ़ते रहे हैं ,"एक राजा की चार रानियाँ थीं " और इसे सहज रूप से स्वीकार करते रहे हैं. बचपन में पढ़ा, एक रुसी लेखिका का इंटरव्यू याद आ रहा है (जरूर धर्मयुग में ही पढ़ा होगा ) जिसमे उन्होंने कहा था ,"हमने कई हिंदी पौराणिक कथाओं  के रुसी  अनुवाद किये हैं पर हमें अपने बच्चों को ये समझाने में कि एक राजा की दो/तीन/चार रानियाँ थीं  बहुत मुश्किल होती है " तब मैंने पहली बार जाना था कि कुछ समाज ऐसे भी हैं जहां एक समय में एक राजा की एक ही रानी होती है. 

इसके उलट हमने कभी किसी कथा  में ये नहीं पढ़ा कि एक रानी थी, उनके चार राजा थे .या एक स्त्री थी उसके दो पति थे . (द्रौपदी का उदाहरण बिलकुल अलग है और यहाँ भी द्रौपदी की  मर्जी से उसके पांच पति नहीं बने थे ) .

पौराणिक काल से यह प्रथा चलती आ रही है और मैंने भी अपनी आँखों से दो पत्नी वाले कई लोग देखे हैं . दुसरे समाजों /देशों में तलाक/डिवोर्स  की प्रथा क्यूँ आयी कब आयी ,किस कारण से आयी मुझे जानकारी नहीं है पर ये जानकारी जरूर है कि हमारे  यहाँ ऐसी कोई प्रथा नहीं थी कि अगर किसी भी कारण शादी नहीं निभ रही है तो पति-पत्नी अलग हो जाएँ . पति जरूर अलग हो जाता  था (घर अलग न हों पर कमरा तो अलग हो ही जाता था ) और नयी स्त्री के साथ अपना आगामी जीवन व्यतीत  करता था पर स्त्री उसके नाम की माला जपते ही अपना इहलोक और परलोक  संवारती रहती थी. पत्नी अगर उसे संतान (या पुत्र रत्न ) न दे पाए, रोगी हो, या उसमें कोई भी कमी दिखे तो पुरुष को झट दूसरी स्त्री के साथ शादी की अनुमति थी.पर पति शराबी/कामी/दुराचारी जो भी हो पत्नी से यही अपेक्षा की जाती थी  कि हर हाल में वो पति की सेवा करे ,उसका साथ निभाये . तलाक/डिवोर्स जैसा कोई प्रावधान हमारे समाज में नहीं था कि ऐसे पति से मुक्त होकर स्त्री स्वतंत्र रूप से अपना जीवन  बिताए . या फिर पति बिना एक स्त्री से मुक्त हुए दूसरी स्त्री से शादी न कर सके . इसीलिए ऐसा कोई शब्द भी हमारे यहाँ प्रचलित नहीं है. जब ऐसी स्थिति की ही कल्पना नहीं है तो कोई शब्द कैसे निर्मित होता.

जब यह  कानून अस्तित्व में आया  तो शब्द भी गढ़ा गया 'विवाह-विच्छेद ' पर इसे सामाजिक मान्यता मिलने में शायद सौ साल से अधिक ही  लगेंगे . क़ानून यह भी है कि एक पत्नी के रहते ,दूसरी स्त्री से शादी नहीं की जा सकती. पर जिस तरह हमारे देश में हर क़ानून का पालन किया जाता है, वैसा ही हाल इस कानून का भी है . जो लोग सरकारी नौकरी में हैं, उन्हें भी डर नहीं तो दूसरे व्यवसाय वालों के लिए कुछ कहा ही नहीं  जा सकता. मैं जब दस-ग्यारह साल की थी एक साल अपने गाँव में पढ़ाई की थी ..हमारे पडोसी एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे , तीन-चार साल शादी के हो गए थे और उन्हें कोई संतान नहीं थी. बड़े धूमधाम से उनकी दूसरी शादी हुई. पूरा गाँव शरीक हुआ. उनकी पहली पत्नी भी क्यूंकि उनसे वायदे किये गए थे कि 'मालकिन तो तुम ही होगी ,आनेवाली तो तुम्हारी  नौकरानी बन कर रहेगी' . पर उस विवाह का एक दृश्य मुझे याद है , उनकी पहली पत्नी आँगन में बैठी अपने ही पति की शादी में खूब ढोलक बजा कर दूसरी औरतों के साथ गीत गा रही थीं. मैं अपनी दादी के साथ गयी और पता नहीं दादी को देखते क्या हुआ ,वे रोने लगीं. मेरी दादी ने उन्हें छाती से चिपटा लिया  और काफी देर तक वे जोर जोर से रोती रहीं. नयी बहु आ गयी ,और धीरे धीरे पहली पत्नी पर अत्याचार शुरू हो गए. उन्हें रसोई में आने की इजाज़त नहीं, खाना नहीं दिया जाने लगा, कमरे में बंद रखा जाने लगा. वे मिडल पास थीं यानी कि सातवीं तक पढ़ी हुई थीं. उन्हें पढने का शौक था ,खिड़की से मुझसे किताबें  मांगती और कहतीं कि उन्हें खाना नहीं दिया गया. नंदन-पराग और धर्मयुग के बीच छुपा कर  कई बार उन्हें चिवड़ा -गुड और खजूर (आटे से बना ) देने जाती. एक बार अपने रूखे बाल दिखा कहने लगीं,'तेल नहीं है लगाने को ' छोटी शीशी में उन्हें तेल भी छुपा कर दे आयी थी. फिर कुछ दिनों बाद वे मायके चली गयीं .(या  ससुराल से निकाल दिया गया )..वहाँ  भी ठौर नहीं मिला . पास के शहर में छोटी मोटी नौकरी करने लगीं ,कुछ कुछ मानसिक संतुलन भी खो दिया था. सबके मजाक की वस्तु बनी रहतीं और फिर उनकी अल्प आयु में ही मृत्यु हो गयी . एक ज़िन्दगी तो चली गयी. जबकि उनके पति अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ आज भी सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं .

हमारे गाँव में ही एक बूढ़े मास्टर साहब थे .जिन्होंने अपने इकलौते बेटे की शादी एक गाँव की लड़की से कर दी . लड़के ने शादी तो कर ली पर पत्नी को कभी अपने साथ अपनी नौकरी पर नहीं ले  गया .वहां दूसरी शादी कर ली और अपना घर बसा लिया .पहली पत्नी ताउम्र अपने सास-ससुर की सेवा करती रही .

ये तो मेरे बचपन के किस्से हैं . जब मैं कॉलेज में थी . हमारे घर से चार घर छोड़ सरकारी कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर साहब थे ,उनकी पत्नी को कोई बीमारी हो गई थी और वे चलने फिरने से लाचार  हो गयी थीं, व्हील चेयर पर ही चलतीं .उन्हें ,उनके घर को और उनके दो छोटे बेटों को संभालने पत्नी की छोटी बहन साथ रहती थी.  .प्रोफ़ेसर साहब ने दूसरी शादी कर ली अक्सर शाम को दूसरी पत्नी के साथ छत पर टहलते नज़र आते और पत्नी की छोटी बहन घर के सारे काम करती. 

ऎसी तमाम सच्ची घटनाएं हैं  समाज में ,जहाँ सिर्फ और सिर्फ स्त्रियों को ही दुःख झेलने पड़े हैं .शादी होते ही स्त्री के लिए उसके माता-पिता के घर के दरवाजे बंद हो जाते हैं और अगर पति दूसरी शादी कर ले .फिर भी स्त्री को सबकुछ सहकर वहीँ रहना है क्यूंकि उस से तो यही अपेक्षा है कि 'डोली गयी तो अब अर्थी ही उठनी चाहिए " . उसे तो दान कर दिया गया है...और दान की हुई वस्तु कोई वापस नहीं लेता, अब उसका नया मालिक उसके साथ जो चाहे करे. इसी वजह से पति को भी छूट मिली होती है ,उनकी मनमानी चलती  है और स्त्रियाँ समझौते पर समझौते करती चली जाती हैं.

पति चाहे जैसा हो, स्त्री को उसे स्वीकार कर ज़िन्दगी भर निभाना ही पड़ता है. हमारी धार्मिक कथाओं में ,फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है ,पति वेश्यागामी था , अब असाध्य रोग से पीड़ित है, पर पत्नी उसे पीठ पर लादकर छिले घुटनों से पहाड़ी पर बने मंदिर तक चढ़ कर जाती है....निर्जल  व्रत रखती है...पूजा करती है और उसका पति ठीक हो जाता है. अगर प्रेम हो तो ये सब करने में कोई बुराई नहीं. पर यह हमेशा एकतरफा ही क्यूँ होता है ? पति कभी अपनी पत्नी के लिए इतने व्रत-उपवास क्यूँ नहीं करता ?...इतने कष्ट क्यूँ नहीं उठाता ?? क्या साथ  निभाने की जिम्मेवारी सिर्फ एक पक्ष की है, दोनों पक्षों की नहीं है ?? कुछ पति भी अपनी पत्नी का ख्याल रखते हैं . पर उनकी संख्या बहुत ही कम  है और यहाँ बहुसंख्यक  लोगो की स्थिति पर चर्चा हो रही है. 
अब तलाक का प्रावधान  आ गया है..पर समाज में अब भी इसे अच्छी नज़र से नहीं  देखा जाता. तलाकशुदा स्त्रियों को बहुत कुछ झेलना पड़ता है. 

[PC310173+-+Copy.JPG]  पर ये बातें सुनने में लोगों को अच्छी नहीं लगतीं. उन्हें हमारी भारतीय संस्कृति जहाँ 'नारी को देवी का रूप दिया गया है ' उस पर आंच आती दिखती है. .हम भी भारतीय ही हैं. हमें भी अपनी संस्कृति की कुछ बातों पर नाज़ हैं,पर जो कमियाँ हैं , उस पर भी तो बात करनी होगी, उन्हें छुपाते ही रहेंगे तो उन्हें दूर करने के उपाय कैसे ढूंढें जायेंगे .


रश्मि रविजा 
http://rashmiravija.blogspot.in/



चाहतों का बोनसाई

चाहतों का इक नन्हा सा पेड़
कभी उगाया था बगीचे में अपने,

नित सुनाती लोरी उसे स्वप्नों की
मैं नित दे रही थी पानी पसीने का 
डालती थी खाद मैं मुस्कानों की
जब गिरता पवन के झौंको में
तो टेक लगाती अपनी अपेक्षाओं की
चट करने जो आता कीट तो डालती
कीटनाशक अपनी आकांक्षाओं का।

अभी तो उसने ढंग से
जड़ भी न पकड़ी थी
फैलाकर अपनी पत्तों की बाँहें
इक अंगड़ाई भी न ली थी,
मेरी चाहतों के पौधे में
अभी तो न खिले थे फूल, न
फल लगे थे मेरी चाहतों के।

अभी तो उसे यह अनुमान भी
न होने पाया था कि कितनी
फैल सकती शाखाएँ मेरी चाहतों की
कितनी घनी छाँव दे सकती हैं वे
या कितने फूल जड़े जा सकते हैं
मेरी चाहतों के हर रंग में, या
मीठे फल दे सकता था वह
मेरी चाहतों का नन्हा वृक्ष।

इक दिन आ गया राजसी आदेश
जाना होगा तुम्हें देश से विदेश
बाँध लो पोटली में अपना घर,
समेट लो अपना नाता रिश्ता हर
ताला बंद करो जीवन व चाहतें
और समेट लो धरती अपनी
सिकोड़ो, बाँधों अपना आकाश।

चाहतों का जो था नन्हा सा पेड़
उखाड़ा समेटा उसे इक गमले में
सीमाएँ निर्धारित करीं जड़ों टहनियों की
उसके फैलाव, पत्तियों, खाद, पानी की
जब भी बढ़ती टहनियाँ उसकी
आ जाता फिर वही आदेश
समेटो, जाना है यहाँ या वहाँ
काट छाँट कर छोटी कर देती मैं शाखें
जब तब कतर देती मैं जड़ों के जाले को।

अब देता है छोटे फूल, फल
और छोटी सी ही जब छाँव वह
वृक्ष बनना था चाहतों का जिसने
बन गया है वह इक बोनसाई
समेटने का दिया आदेश जिसने
तले छाँव उसकी सुस्ताना चाहते हैं
वे ही पूछते हैं अब मुझसे
क्यों उपजाए अपनी चाहतों के
तुमने इतने छोटे फूल, फल
कैसे सिकुड़ा तुम्हारा आकाश।

घुघूती बासूती
http://ghughutibasuti.blogspot.in/


जीवन में सपने मत देखो

कई बार मन उदास हो जाता है। जीवन में अघटित सा होने लगता है। ऐसे ही क्षणों में कुछ शब्‍द आकर कहते हैं कि जीवन में सपने मत देखो, इनके अन्‍दर सत्‍य, सत्‍य में दर्द छिपा है। ... 
जीवन की परते मत खोलो
इनके अंदर घाव
घावों में दर्द छिपा है।
जीवन में सपने मत देखो
इनके अंदर सत्य
सत्य में दर्द छिपा है।

जीवन का क्या है नाम
संघर्ष, सफलता, खोना, पाना,
महल बनाना दौलत का
या परिवार बनाना अपनों का
सच तो यह है
महलों से ही अपने बनते हैं
अपने कब दिल में रहते हैं?
अपनों की बाते मत सोचो
इनके अंदर प्रश्न
प्रश्नों में मौन छिपा है।

जीवन तो कठपुतली है
परदे के आगे नचती है
किसकी अंगुली किसका धागा
किसने जाना किसने देखा
अंगुली की बाते मत सोचो
इसके अंदर भाग्य
भाग्य में राज छिपा है।

जीवन के तीन हैं खण्ड
सबके सांचें, सबकी परतें
एक दूजे से गुथी हुई पर
फिर भी हैं अनजान
बचपन का सांचा कैसा था
यौवन की परते कहाँ बनी
और अंत समय में 
किस सांचे में ढलने की तैयारी की
जीवन के खण्डों को मत देखो
इनके अंदर आग
आग से जीवन जलता है।

कहाँ स्वतंत्र तू, कहाँ रिहा
तेरा तो हर पल, कण कण
नियति के हाथों बिका हुआ
लगता है जीवन अंधा कुँआ है
बस हाथ मारते बढ़ना है
चारो ओर अंधेरा है
कब कौन वार करेगा पीछे से
इसका भी हर बार अंदेशा है
सम्बल के सपने मत देखो
इनके अंदर द्वेष
द्वेष में घात छिपा है।

बस जीना है तो कुछ भी मत सोचो
ना सपने देखो ना परते खोलो
किस अंगुली पर हम नाच रहे
किस धागे से हम जुड़े हुए
बस कठपुतली बनकर
तुमको तो हंसना है, खुश ही दिखना है
आंखों के आँसू मत देखो
इनके अंदर दर्द
दर्द में मन का भेद छिपा है।




अजीत गुप्ता 
http://ajit09.blogspot.in/


विपत्ति कसौटी जे कसे सोई सांचे मीत .....

जीवन एक संग्राम ही तो है । जिसमे समय समय पर विभिन्न विपत्तियाँ आती हैं । इन विपत्तियों में ही परम मित्र की सत्यता प्रमाणित होती है ।
पंचतंत्र में कहा गया है ...." जो व्यक्ति न्यायलय, शमशान और विपत्ति के समय साथ देता है उसको सच्चा मित्र समझना चाहिए ।"
मित्र का चुनाव बाहरी चमक दमक , चटक मटक या वाक् पटुता देखकर नहीं कर लेना चाहिए। मित्र ना केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाला बल्कि हमारी भावनाओं को समझने वाला सच्चरित्र , परदुखकातर तथा विनम्र होना चाहिए।

मित्रता के लिए समान स्वाभाव अच्छा होता है परन्तु यह नितांत आवश्यक नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में में भी मैत्री संभव है। नीति-निपुण अकबर तथा हास्य -व्यंग्य की साकार प्रतिमा बीरबल, दानवीर कर्ण और लोभी दुर्योधन की मित्रती भी विपरीत ध्रुवो की ही थी ...

सच्ची मित्रता बनाये रखने के लिए जागरूकता आवश्यक है। यह देखना आवश्यक है कि क्या हमारा मित्र हमारा हितैषी है ? हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ? दोषों से हमारी रक्षा करता है? निराशा में उत्साह देता है ? शुभ कार्यों में सहयोग और विपत्ति सहायता करता है या नहीं ?

दूसरी जागरूकता यह होनी चाहिए कि हम अपने मित्र के विश्वासपात्र बने । उसकी निंदा से बचे। उन पलों या घटनाओं को उससे दूर, छिपा कर रखे जो उसे अंतस तक दुःख पह्नुचाते हैं ना कि उसका विश्वासपात्र बनने के लिए उसे खूब प्रचारित करे ।
किसी ने ठीक कहा है ..." सच्चा प्रेम दुर्लभ है , सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ "

श्रीरामचरितमानस के पठन का असर अभी गया नहीं है ...राम की महिमा ही ऐसी है .... मित्र धर्म पर पर कुछ बेहतरीन सूक्तियां देखें ....

जे ना मित्र दुःख होहिं । बिलोकत पातक भारी ॥
निज दुःख गिरी संक राज करी जाना । मित्रक दुःख राज मेरु समाना ॥ 

जोग लोग मित्र के दुःख से दुखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है । अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के सामान तथा मित्र के धूल के समान दुःख को पर्वत के समान जाने ।

जिन्ह के असी मति सहज ना आई। ते सठ कत हठी करत मिताई ॥
कुपथ निवारी सुपंथ चलावा । गुण प्रगटे अव्गुनन्ही दुरावा ॥

जिन्हें स्वाभाव से ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है , वे मूर्ख क्यों हाथ करे किसी से मित्रता करते हैं ? मित्र का धर्म है वह मित्र को बुरे मार्ग से रोक कर अच्छे मार्ग पर चलाये। उसके गुण को प्रकट करे और अवगुणों को छिपाए।

देत लेत मन संक न धरई । बल अनुमान सदा हित कराई ॥
विपत्ति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति का संत मित्र गुण एहा ॥

मित्र अपने बल अनुसार देने लेने में संकोच ना करते हुए सदा हित करे । विपत्ति के समय सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि सच्चे मित्र के यही गुण होते हैं ।

आगे कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई ॥
जाकर चित अहि गति सम भाई । अस कुमित्र परिहरेहीं भलाई ॥

जो सामने तो बना बना कर भले वचन कहता है और पीठ पीछे बुराई करता है , तथा मन में कुटिलता रखता है। जिसका मन सर्प की चाल के सामान टेढ़ा है,उस कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है ।

सेवक सठ , नृप कृपन , कुनारी, कपटी मित्र सुल सम चारी ....
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा , कुलटा स्त्री और कपटी मित्र ये चारों शूल के सामान है ...इनसे बचना चाहिए।

मित्र के बारे में चाणक्य ने भी कुछ लिखा है ....
परोक्षे परोक्षेकर्यहंतारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम
वर्जये तासदृषम मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम 
पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले तथा सामने प्रिय बोलने वाले ऐसे मित्र को मुंह पर दूध रखे विष के घड़े के सामान त्याग देना चाहिए ।


वाणी शर्मा 
http://vanigyan.blogspot.in/

इसी के साथ आज का कार्यक्रम संपन्न, मिलती हूँ कल फिर सुबह 10 बजे परिकल्पना पर,
तब तक के लिए शुभ विदा। 

6 comments:

  1. मेरी कविता को स्थान देने के लिए आभार.
    घुघूतीबासूती

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  2. बहुत बढ़िया रश्मि आंटी । हर रचना लाजवाब ।दो और नए ब्लागर को पढ़ने का मौका मिला ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बहुत शुक्रिया , मेरी पोस्ट शामिल करने के लिए .

    उत्तर देंहटाएं

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