स्वागत है आप सभी का ब्लॉगोत्सव-२०१४ के द्वितीय दिवस के अंतिम कार्यक्रम में





उर्दू भाषा भारतीय आर्य भाषा है, जो भारतीय संघ की 22 राष्ट्रीय भाषाओं में से एक व पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा है। हालाँकि यह फ़ारसी और अरबी से प्रभावित है, लेकिन यह हिन्दी के निकट है और इसकी उत्पत्ति और विकास भारतीय उपमहाद्वीप में ही हुआ। दोनों भाषाएँ एक ही भारतीय आधार से उत्पन्न हुई हैं। स्वर वैज्ञानक और व्याकरण के स्तर पर इनमें काफ़ी समानता है और ये एक ही भाषा प्रतीत होती हैं।

आज परिकल्पना मंच पर हम उर्दू भाषा में लिखित रचना लेकर उपस्थित हैं, आपकी सुविधा के लिए हिंदी अनुवाद सहित -



احساس - اے - تنہائی

كهرے سے گھری سرد راتوں میں اکثر
یوں بھی گھر سے نکلتا ہوں یہ سوچ کر
کہ میری ہی طرح چاند کو بھی
احساس - اے - تنہائی ستاتی ہوگی ،

ٹھٹرتی ہوئی ان گلیوں میں
آوارہ چاندنی تاخیر ہوگی ،
گرم دشالے میں لپٹی وہ کہیں
الاؤ سے ہاتھوں کو سےكتي
میری یاد میں تڑپتی ہوگی ،

اهساسو کی گرم تپش کے سہارے
سانسوں کے گرم اجلے دھوئیں کی روشنی میں ،
دوبد کو چیرتا میں چلا جاتا ہوں
ایک صرف تیری ہی تلاش میں ،

دور کہیں کچھ سائے سے لہراتے ہیں
دامن کا تیرے احساس کراتے ہے ،
کہیں کوئی دیپ جھلملاتا ہے
ملن کی ایک آس جگاتا ہے ،

کہیں کچھ نظر نہیں آتا
اپنے ہی قدموں کہ آوازیں ہیں ،
اس سرے سے اس سرے تک صرف
سفید دھند کہ پرواذے ہیں ،

میری ہی طرح یہ چاند بھی جلتا ہے
کیسا میرا اور اس کا رشتہ ہے ،
رجاييو میں دبک جب سوتا ہے جہاں
عاشق پیا ملن کو ترستا ہے ،

كهرے سے گھری سرد راتوں میں اکثر
یوں بھی گھر سے نکلتا ہوں یہ سوچ کر
کہ میری ہی طرح چاند کو بھی
احساس - اے - تنہائی ستاتی ہوگی ،
© عمران انصاری

(हिंदी रूपांतरण)

 अहसास-ए- तन्हाई  
कुहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर
कि मेरी ही तरह चाँद को भी
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

ठिठुरती हुई इन गलियों में
आवारा चाँदनी भटकती होगी,
गर्म दुशाले में लिपटी वो कहीं
अलाव से हाथों को सेकती
मेरी याद में तड़पती होगी,



अहसासों की गर्म तपिश के सहारे
साँसों के गर्म उजले धुएँ की रौशनी में,
धुंध को चीरता मैं चला जाता हूँ
एक सिर्फ तेरी ही तलाश में,

दूर कहीं कुछ साये से लहराते हैं 
दामन का तेरे अहसास कराते है,
कहीं कोई दीप झिलमिलाता है
मिलन की एक आस जगाता है,

कहीं कुछ नज़र नहीं आता
अपने ही क़दमों कि आवाज़ें हैं,
इस सिरे से उस सिरे तक सिर्फ
सफ़ेद कोहरे कि परवाज़ें हैं,

मेरी ही तरह ये चाँद भी जलता है
कैसा मेरा और इसका रिश्ता है,
रजाईयों में दुबक जब सोता है जहाँ
आशिक़ पिया मिलन को तरसता है,

कुहरे से घिरी सर्द रातों में अक्सर
यूँ भी घर से निकलता हूँ ये सोचकर
कि मेरी ही तरह चाँद को भी
अहसास-ए-तन्हाई सताती होगी,

© इमरान अंसारी






इसी के साथ आज का कार्यक्रम संपन्न, 
मिलती हूँ कल फिर सुबह 10 बजे परिकल्पना पर, तबतक के लिए शुभ विदा !

8 comments:

  1. बहुत खूबसूरत एहसास...अनुवाद !!!

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  2. इमरान भाई की हर रचना काबिले तारीफ होती हैं
    (h) (h)

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  3. Rashmi Ji kin lafzon me shukriya ada karoon....abhibhut hoon shukriya sabhi ka jinhen rachna pasand aai |

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  4. imran ji ki ek aur khoobsurat kriti se ru-b-ru karvaane ke liye shukriya rashmi ji !

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  5. वाह ... बेहतरीन रचना
    बधाई सहित शुभकामनाएं

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