समय  .... यह समय जो हमेशा हमारे साथ होता है
इसी ने बनाया था परिकल्पना का मंच 
साक्षी बन बहुत कुछ कहता गया 
 हिंदी - हिंदी ब्लॉग्स की पहचान को उभारता गया 
इसकी नींव के पत्थर रवीन्द्र प्रभात ने जोड़े थे 
    आज उस समय की अब तक की कुछ ख़ास झलकियाँ - 



मैं समय हूँ , मैंने देखा है वेद व्यास को महाभारत की रचना करते हुए , आदि कवि वाल्मीकि ने मेरे ही समक्ष मर्यादा पुरुषोत्तम की मर्यादा को अक्षरों में उतारा...सुर-तुलसी-मीरा ने प्रेम-सौंदर्य और भक्ति के छंद गुनगुनाये, भारतेंदु ने किया शंखनाद हिंदी की समृद्धि का. निराला ने नयी क्रान्ति की प्रस्तावना की, दिनकर ने द्वन्द गीत सुनाये और प्रसाद ने कामायनी को शाश्वत प्रेम का आवरण दिया .....!

मैं समय हूँ, मैंने कबीर की सच्ची वाणी सुनी है और नजरूल की अग्निविना के स्वर. सुर-सरस्वती और संस्कृति की त्रिवेणी प्रवाहित करने वाली महादेवी को भी सुना है और ओज को अभिव्यक्त करने वाली सुभाद्रा कुमारी चौहान को भी, मेरे सामने आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री की राधा कृष्णमय हो गयी और मेरे ही आँगन में बेनीपुरी की अम्बपाली ने पायल झनका कर रुनझुन गीत सुनाये ....!


मैं समय हूँ, मेरे ही सामने पन्त ने कविता को छायावाद का नया बिंब दिया, अज्ञेय और नागार्जुन ने मेरी पाठशाला में बैठकर कविता का ककहारा सिखा, मुक्तिबोध और धूमिल ने गढ़ा नया मुहावरा हिंदी का, केदारनाथ सिंह ने किये नयी कविता के माध्यम से हिंदी का श्रृंगार और नामवर ने दिए नए मिथक, नए बिंब हिंदी को. मेरे ही सामने नीरज ने गाये प्रणय के गीत और अमृता ने रची प्रणय की कथा ....!

मैं समय हूँ आज देख रहा हूँ ब्लॉग पर उत्सव होते हुए, अहोभाग्य मेरा कि प्रणय की कथा रचनेवाली अमृता प्रीतम के प्रेमपथ के सहयात्री इमरोज भी पधारे हैं इस उत्सव में. उनको अपने साथ लेकर आयीं हैं पुणे महाराष्ट्र से कवयित्री रश्मि प्रभा...



निरंतर घूमता रहता हूँ . 
 परिकल्पना ब्लॉगोत्सव  प्रथम का मैं साक्षी रहा हूँ..... मुझे थामकर रवीन्द्र प्रभात जी यहाँ लाए थे , न भी लाए होते तो मैं होता . उस उत्सव में क्या नहीं था और मुझे - साक्षी बनना था .,मैंने देखा प्रणय की कथा रचनेवाली अमृता प्रीतम के प्रेमपथ के सहयात्री इमरोज भी पधारे थे ब्लॉगोत्सव प्रथम में. दुष्यंत के बाद चर्चित गज़लकार अदम साहब ने भी बढाई थी शोभा उस उत्सव की, पन्त की मानस पुत्री श्रीमती सरस्वती प्रसाद ने भी दिए थे नए आयाम उस उत्सव को, कृष्ण बिहारी मिश्र, प्रेम जनमेजय, दिविक रमेश आदि शख्शियतों के साथ शामिल हुए हर क्षेत्र - हर वर्ग के सृजन शिल्पी और चहूँ ओर मैंने सुनी थी उस बक्त बस परिकल्पना,परिकल्पना,परिकल्पना की अद्भुत गूँज ...निर्बाध रूप से दो महीने तक ! 

सरस्वती के आशीष से परिपूर्ण दिग्गजों की टोली थी, अरे मैं हतप्रभ था तो मैं समझ सकता हूँ कि मेरी नायाब पकड़ रवीन्द्र जी को कितनी परेशानी हुई होगी !

पर साहित्य की इस महायज्ञ में शामिल होना ही गौरवपूर्ण था, है और रहेगा तो तर्क कैसा? शिकायत कैसी ?
मैं समय हूँ, मुझे कोई शिकायत नहीं.

मैंने सतयुग देखा, द्वापरयुग देखा, रामायण के रचयिता से मिला, महाभारत का संजय बना, और हर काल में मेरी आलोचना हुई है.

इन आलोचनाओं का सबसे बड़ा शिकार तोह मैं ही रहा न.. कोई भी अनहोनी हो, मुझे कोसते हैं सब.. फिर भी मैं निरंतर चलता हूँ..

यदि मैं रुक गया तब तो न कोई युग होगा न उत्सव न ख़ुशी न दुःख...

एक चक्रव्यूह बनाया था दिग्गजों ने.
अभिमन्यु मारा गया, अर्जुन ने मैदान जीता पर अभीमन्यु को नहीं लौटा सका...

एक कुरुक्षेत्र का मैदान होता है अपने ही अन्दर जहाँ १८ दिन का महायुद्ध नहीं होता, पूरी ज़िन्दगी का हिसाब किताब होता है.
मन खुद चक्रव्यूह बनता है खुद के लिए, खुद से युद्ध होता है.

एक अभिमन्यु की कौन कहे, जाने कितने अभिमन्यु मारे जाते हैं और कृष्ण भी स्तब्ध होते हैं...

तो इस व्यूह से निकलो..
काल को समझो निर्वाण का अर्थ जानो.........



बहुत करीब से जाकर मिलो
तो हर शख्स खुद से जुदा लगता है....
टकराता मैं सबसे हूँ , बढ़ भी जाता हूँ
पर कहीं कहीं रुकना ज़रूरी होता है ! ......... क्या लगता है तुम्हें कि समय यूँ हीं निरंतर चलता जाता है . नहीं नहीं - ऐसा कैसे समझ सकते हो तुम सब ! तुम अपनी रफ़्तार में भले भूल जाओ पर जानते तो ही मैं ही मंथन करता हूँ, मैं ही सुनामी लाता हूँ , मैं ही प्रयोजन बनाता हूँ, रास्ते खोलता हूँ, बन्द करता हूँ ........ मैं सहस्त्र दृष्टियों से अहर्निश भाव से तुम सबको देखता हूँ , विधि का विधान मैं , निर्माण मैं ......



इक फौजी के दिल के एहसास और उनकी ख्वाहिशें हमसे अलग नहीं होतीं , वह फौलादी दिल लिए मुस्कुराता तो है ,'रंग दे बसंती चोला ' गाता तो है , सरफरोशी की तमन्ना लिए सीमा पर खड़ा रहता तो है ..... पर बासंती हवाएँ उनको भी सहलाती हैं , सोहणी उनको भी बुलाती हैं ..... कुछ इस तरह


गुनगुनाता है चनाब
सोहणी के पाजेब बजते है
हवाओं में सरगर्मी है किसी के आने की ...

मैंने कहा है इन हवाओं से - आहिस्ता चलो
हम फौजी हैं --- सधे क़दमों से ही पहचान अपनी होती है...

पुरवा की शोख अदाएं झटक के बातों को
हमारे दिल में भी चुपके से सुगबुगाती है

शाम ये ख़ास है कुछ ख़ास से एहसास हैं
चलो हवाओं संग कुछ हम भी बहक जाते हैं

वक़्त करता है इशारे कि हमें जाना है
फिर मिलेंगे कभी पर हाँ अभी तो जाना है

पास कहने को हमारे , तो जाने कितनी बातें हैं
आँखों में शोखियों की बोलती इबारतें है

पर अगर चलना ही है तो आओ इतना हम कर लें
तेरे आगे तेरी इबादत में ,मिलने की तारीखें फिर तय कर लें (समय यानि रश्मि )

जो दिखाई देता है .... बंधु उसके पार बहुत कुछ होता है . चश्मा मत लगाओ , बस थोड़ा मन को आजमाओ


आशीर्वचनों से बढ़कर कुछ नहीं .... इनको सहेजना ही जीवन को कल्पवृक्ष बनाते हैं ... और परिकल्पना को देते हैं पंख,

ॐ 
हे प्रभावती ' रश्मिप्रभा '
' परिकल्पना ' ने मुझे कल्पना के पंख लगा कर
एक ऐसे दीव्याकाश में ला खड़ा कर दिया है कि
मैं आश्चर्य चकित सी अपना नाम इन तमाम रचनाकारों के संग देख
हतप्रभ हूँ ..
ख़ास तौर से आदरणीया सुभद्रा कुमारी चौहान 
एवं पूज्य भगवती चरण वर्मा चाचाजी के बीच 
मेरी छवि देखकर असमंजस में हूँ ...अब और क्या लिखूं ?
यह आपका स्नेह पूर्ण अपनापन जीवन के अंतिम क्षण तक याद रहेगा 
और अपनी स्वयं की कविता न देकर 
शिष्ट सौम्यता का जो अनोखा रंग अछूता रखा है 
उस पर बलिहारी जाऊं :-)
अभी इतना ही बहुत सारा स्नेह
व् आशिष सहित 

- लावण्या दी 


चाहने में इच्छाशक्ति प्रबल हो तो असंभव भी संभव है ... रुकावटें,भय,अस्तित्व का प्रश्न सबके सामने होता है . मझदार,व्यूह,जमीं के नीचे से खिसकती धरती सबके हिस्से आती है,समय अलग अलग है ! संस्कार अपने होते हैं, आनेवाली हवाओं में कौन सा तिनका आँखों में पड़ेगा - यह तय नहीं होता . व्यूह अपना अपना होता है - कोई अभिमन्यु होता है,कोई कृष्ण, कोई पितामह,कोई अर्जुन तो कोई कर्ण ...........आलोचना से न अभिमन्यु जीवित होगा,न पितामह विरोधी स्वर लिए अर्जुन के साथ होंगे .... पर चाह लो तो अमरत्व है इच्छाशक्ति का . होनी का वरदान कृष्ण को कृष्ण बना गया,यशोदा को कृष्ण के मुख में ब्रह्माण्ड दिखा गया ........ असंभव को संभव करने में ही तो कृष्ण भगवान् हुए, अवतार कहलाये,उद्धारक हुए . 

सोच लो तो मरकर भी रास्ते ख़त्म नहीं होते ....

इसी के साथ परिकल्पना ब्लॉगोत्सव-२०१४  के समापन की मैं घोषणा करती हूँ, अब मुझे अनुमति दें, मैं रश्मि प्रभा अगले वर्ष फिर लेकर आऊँगी एक नया ब्लॉग उत्सव का  प्रारूप .... तब तक के लिए शुभ विदा। 

4 comments:

  1. यह एक बिल्कुल ही नई दुनिया है मेरे लिए ! यूँ समझिए, बस अभी ही आई हूँ और पूरी तरह जान ही न सकी..पर इसके वृहद रूप का अनुमान अवश्य हो गया है. मेरा योगदान तो इसमें शून्य-सा ही है. पर सीखने को बहुत कुछ मिलेगा ! अगले अंक का मुझे बेहद बेसब्री से इंतज़ार रहेगा ! शुभकामनाएँ दी ! :)

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  2. ब्लॉगोत्सव-२०१४ समापन की बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..

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