मैं" एक अग्नि 
शारीरिक यज्ञ कुण्ड में 
निरंतर प्रज्ज्वलित  … 
आत्मविश्वास, 
प्रयासों की समिधा से पोषित। 
इससे अपरोक्ष निकलते आग्नेय वाण 
ईर्ष्या,दम्भ,लालच,हिंसा को बेधते हैं 
निशाना तब तक अचूक होता है 
जब तक यज्ञ में 
सोच की विघ्नता न आये !
शुभ समय 
शुभ तिथि 
तीर्थ 
तीर्थ जल 
ऋषि, ईश 
.... सबकुछ इस शरीर में निहित है 
मंथन कितना भी कठिन हो 
अमृत अपने ही हाथ होता है  … 
सागर मंथन में 
दो "मैं" खड़े थे 
एक तरफ दम्भ और विनाश  
एक तरफ विश्वास और कल्याण 
दम्भ क्षणिक 'मैं' है 
विश्वास शाश्वत  … 
'मैं' ही जन्म लेता है 
'मैं' ही दूसरा शरीर धारण करता है 
मृत्यु एक विराम है 
एक दृष्टिगत प्रयोजन 
अगले यज्ञ का 
……………………………………। 
रश्मि प्रभा 

डायरी के पन्नों से



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मेरे प्रभु 
तूने सब कुछ तो संवार दिया है, मेरे प्रभु !
तारों से आकाश
रंगों से प्रकाश
प्राणों से पवन
ऊष्मा से अगन
तूने सब कुछ तो लुटा दिया है, मेरे प्रभु !
रस छलकातीं नदियाँ
पर्वतों की घाटियाँ
सागरों की गहराइयाँ
मदमाती अमराइयाँ
तूने सब कुछ तो सौंप दिया है, मेरे प्रभु !
अकारण स्नेह
महमाता मेह
करुणा का आंचल
विरह का जल
और तू छिप गया हमारे अंतर में !
हम निहारते रहे
सराहते, ढूंढते रहे
कभी धरा कभी गगन
न झाँका तो अपना मन !

शरणागत हो जाओ

शरणागत हो जाओ,
गूंज उठती है जब तब कानों में यह ध्वनि
लक्ष्य हो सम्मुख, पथ भी अजाना नहीं
फिर भी जब कदम न बढ़ें
तो शरण में आ जाओ !
अभयदान देती है वाणी
जब माना कि हममें सामर्थ्य नहीं
तुमने सूत्र दिया
खाली हो जाओ !
मन जो भरा है
खाली कर दो
ध्यान में कुछ करना नहीं
बस हो रहो !
जगत बनेगा क्रीड़ास्थल
घर सहज अंतर्मन निश्छल
जगे जब भीतर देवत्व
मिलेगी सत्य की राह अटल !


हे अव्यक्त ! हे अनंत !


बिन छुए ही
कैसा रोमांच भर जाते हो
रेशे-रेशे में
श्वासों के साथ भीतर आ
प्रेम की अनुभूति कराने
हे परब्रह्म ! हे अनंत
देह, मन ,बुद्धि से परे मिले तुम
देह, मन ,बुद्धि को शोभित करते
स्वर्ण रश्मियाँ फूटें तन से
मन समता का वाहक बनता
बुद्धि स्थिर हो प्रज्ञामयी !
दर्पण में तुम्हारा ही रूप झलकता है
वह अनुपम दृष्टि भीतर तक बींध जाती
प्रेमिल मुस्कान चिर देती हृदय को !
बिना याद किये
तुम हर क्षण आते हो स्मृति में
तुम्हारा घर बन ग्या है अंतर्मन
स्फटिक सा स्वच्छ चमचमाता
छलकता घट जहाँ रस का
बिखरता अमिय प्रेम का !
हे अव्यक्त ! हे अनंत !

() अनीता 
 http://amrita-anita.blogspot.com/

4 comments:

  1. यहां किसी ब्लॉग को प्रकाशित करने से पहले क्या उस पर हिंदी भाषा के नजरिए से विचार नहीं किया जाता है? किसी और को न हो, अपरोक्ष और विघ्नता जैसे शब्दों से अपने को तो उबकाई आती है...माफी चाहूंगा! फिर भी, पहली बार यहां कदम पड़े तो निराशा नहीं हुई। उम्मीद बंधी है कि आगे कुछ वाकई बेहतरीन ब्लॉग्स पढ़ने को मिलेंगे।

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  2. सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक ।साधुवाद।

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  3. सभी रचनाएँ एक से बढ़कर एक ।साधुवाद।

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