पापनाशिनी गंगा की मानिंद 
तुमने जीवन को जीया 
औरों के किये को 
आत्मसात किया 
साथ ही हमारी ज़िन्दगी के कचरे भी 
अपने भीतर जब्त करती गई 
बहती रही 
अपने स्नेहिल लहरों संग। 

रश्मि प्रभा 
 मुन्नवर राना

माँ |

लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती
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इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
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मैंने रोते हुए पोछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुप्पट्टा अपना
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ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया,
माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया
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किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में मां आई
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मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
मां से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
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अभी ज़िंदा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा,
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
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जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
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ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता,
मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ  सज़दे में रहती है।
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'मुनव्वर' माँ के आगे यूँ कभी खुलकर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती


लेकिन माँ नहीं
मिथिलेश दुबे 
मेरा फोटो


वो इबादत इबादत नहीं जिसमे माँ का नाम नहीं
वो घर घर नहीं अबस है 
जिसमे माँ को जगह नहीं ।

आज सबकुछ तो है मेरे पास 
धन दौलत और शोहरत 
नहीं है तो ख़ुश होने वाली माँ नहीं ।

देर रात को आता हूं
खाली पेट ही सो जाता हूँ
आँखों में नींद तो है, माँ की डांट का डर नहीं ।

सुबह देर तक सोता हूँ
अब तो हर रोज ही
अलार्म की घंटी तो है पर माँ की प्यारी आवाज़ नहीं ।

दिन -दिन भर रहता हूँ घर से बाहर
उन्मुक्तता है , आजादी है
लेकिन माँ की फटकार नहीं ।

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