"तुम्हारा देव" हृषीकेश वैद्य जी के द्वारा लिखित खतों का एक अंतहीन सिलसिला है  … 
जी हाँ, अंतहीन सिलसिला प्रेम का, अनकही बातों को कहने का, अनकहे ख्यालों को गढ़ने का, अनदेखे चेहरे को साकार करने का - रूह को रूह में जीने का  .... 

रश्मि प्रभा 




कुछ खतों की बानगी आपकी नज़र -


क्या ऐसा हो सकता है....
हृषीकेश वैद्य

क्या पता … कौन है ये देव !!! बस इतना जानता हूँ कि वाद और सिद्धांत से परे , ये एक ऐसा शख़्स है ; जो जान गया है कि जीवन की सार्थकता प्रेम में है। प्रेम … जो चलता रहता है , जैसे कि चलती है हर साँस !!! प्रेम … जो हर दिन फलता - फूलता है , और-और !!! तमाम रंजिशों , साजिशों , नाक़ामियाबियों , ज़िल्लतों और तिजोरीभर अफ़सोस के बाद भी ताउम्र बना रहता है … संजीवनी सा प्रेम ! ये दास्ताँ सिर्फ देव की नहीं … तुम्हारी भी तो है। तुम , जो इसे पढ़ रहे हो ! और हाँ अपनी प्रेमिका का अहसास संजोये रखना हमेशा, अपने दिल में। नहीं तो ' देव ' खो जाएगा कहीं …

अक्सर कहती हो ना .... तुम मुझसे !
“देव,
ख़यालों से बाहर भी एक दुनिया है।
कभी उसमें भी घूम आया करो !
क्यूँ हरदम खोये-खोये से रहते हो?
मेरा देव दीवाना हो पर इतना भी नहीं !!!”

सुनो सखी....
मैं तो वही हूँ, जो मैं हूँ।
जाने कब से....!
ख़यालों की दुनिया में उतना नहीं रहता,
जितना मैं अपने साथ रहता हूँ !
अपने अकेलेपन से प्यार है मुझे।
कुछ पल इतने शांत और निर्दोष होते हैं
कि उनमें प्रवेश करते ही हम पूरी तरह खाली हो जाते हैं।
इतने खाली, कि पूर्णता से भर उठते हैं।

तुम ही कहो...
क्यूँ पालूँ फिर मैं व्यर्थ के झंझट !
और इन दिनों की तो बात ही निराली है।
ये नवंबर,दिसंबर,जनवरी की दुपहरें मुझे इतना रीता कर देती हैं
कि मैं एक विलक्षण आल्हाद से भर उठता हूँ।
चंपा के पेड़ तले छन-छन कर आती हुयी गुनगुनी धूप।
साँस भर उमंगें, मुट्ठी भर कसक।
सरकती हुयी धूप के साथ-साथ दरी सरका कर तकिये को बार–बार एडजस्ट करना।
दो लाइनें पढ़ कर किताब सीने पर रख लेना।
और धूप में आँखें मिचमिचाते हुये देर तक सोचना !!!
इससे हसीन भी कुछ हो सकता है ?
बोलो....!!

सन १९९८ की बात है,
ऐसे ही दिन थे।
मैं आँगन में लेटा हुआ ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ रहा था,
और छिप-छिप कर अपने आँसू पोंछे जा रहा था।
मगर फिर ऐसा तल्लीन हुआ
कि आँसू रलकते रहे और मैं पढ़ता रहा।
इसी बीच जाने कब एक आगंतुक आकर मेरे सिरहाने खड़े हो गए।

जैसे ही मेरी नज़र उन पर गयी,
मैं हड़बड़ा कर धूप को दोष देते हुये अपनी आँखें मिचमिचाने लगा।  
कमाल है न ....
लोग जी भर रोने भी नहीं देते !
और हम !
हम असहज हो जाया करते हैं....
यूँ ही बे-बात पर।

क्या ऐसा हो सकता है
कि इस बार,
इन शांत लमहों में तुम चली आओ
दबे पाँव .....
इस गुनगुनी धूप-छांव के बीच !
मैं यूँ ही खोया हुआ सा कोई किताब पढ़ता रहूँ
‘Buddy’ भी सोया रहे आलस की चादर ताने, अपनी पूँछ हिलाता हुआ।
तुम चुपचाप आकर इस झूले पर बैठ जाओ
और फिर हौले से मुझे पुकारो....
“देव,
क्या खोये हुये हो खुद में
आओ ज़रा झूला दे दो।”
मैं हतप्रभ होकर कुछ देर तुम्हें देखूँ
और फिर मुस्कुरा कर अपनी पलकें मूँद लूँ
जागती आँखों का कोई ख्वाब समझ कर !
ऐसा होगा ना .....

तुम्हारा

देव


सपनों की कोई एज-लिमिट नहीं होती... प्रेमी कभी ओवर-एज नहीं हुआ करते !!!


तुम्हें जागती आँखों के ख़्वाब अच्छे लगते हैं न  ?
अब मुझे भी लगने लगे हैं ...
ऐसा नहीं कि पहले देखता नहीं था , देखता पहले भी था।
... बस झिझक जाता था !

एक ख़ास किस्म की झिझक !!
जो मुझ जैसे लोगों में बड़ी आम होती है ।
हर बार संकोच की अदृश्य दीवार मुझे घेर लिया करती थी ।
लगता था कि ये एक दुर्गुण है ।
कुछ-कुछ शेखचिल्ली के सपनों जैसा ।
और मैं अपने इस अविश्वास पर उतना ही विश्वास करता था,
जितना कि सूरज और चंदा पर !!!

“ तुम डे ड्रीमिंग करते हो ? “
याद है तुमने पूछा था !
सच कहूँ तो मैं सकपका गया था ।
लगा था कि नजूमी हो कोई या जादूगरनी...
जो पहली ही मुलाक़ात में नब्ज़ पकड़ ली !!!

वैसे अजीब सा सुख मिलता था मुझे जागती आँखों से कोई ख़्वाब बुनने में ।
अक्सर बिल-काउंटर की लंबी कतारों में, सफ़र के दौरान या अजनबी जिस्मों के झुंड में घिरा हुआ ... मैं आत्म-सम्मोहित सा सपनों की दुनिया में खो जाया करता था ।
लेकिन मैंने कभी इस सब पर विश्वास नहीं किया ।
हमेशा इसे हेय दृष्टि से देखता रहा ।

यक़ीन मानो मैं आज भी इसे मेरे जीवन का सबसे नाकारा पहलू मानता ...
यदि मुझे तुम्हारा प्यार न मिला होता !!
“ लेखक कोई मामूली इंसान नहीं , वो तो रचयिता होता है । “
... यही कहा था ना तुमने .....

और फिर जब मैंने तुम्हारी आँखों में देखा तो लगा, जैसे मैं ब्रह्मांड की सैर पर निकला हूँ और सितारे मेरा पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं ।
उसके बाद जीवन में वैसा ही होता गया जैसा कि मैंने चाहा और सोचा ।

एक बात बताऊँ ...
कल मैंने बरसों पुराने एक अधूरे ख्वाब को फिर से बुनना शुरू किया है !
मुझे पूरा यक़ीन है कि वो ख़्वाब हक़ीक़त बनेगा !
भले ही अब वो उम्र ना रही तो क्या , ख़्वाब तो मेरा ही है ना ?

मैं फिर से स्कूल जाना चाहता हूँ ...
तुम्हारे साथ ...
तुम्हारा सहपाठी बनकर ...
बारहवीं कक्षा का !!!
लकड़ी की टेबल पर लोहे की पत्ती लेकर या काले मार्कर-पेन से उकेरना चाहता हूँ ....

“ Dev loves you… “

नहीं जानता कि क्यों , पर ये मेरा सबसे हसीन सपना है ।
शायद इसलिए भी कि ये सपना देखा तो था पर अब तक पूरा नहीं हुआ ।

कह दो न मुझसे ,
कि ये सपना ज़रूर पूरा होगा !
क्योंकि सपनों की कोई एज-लिमिट नहीं होती
और प्रेमी कभी ओवर-एज नहीं हुआ करते !!!

तुम्हारा

देव  



मुखपृष्ठ से उपजे सवाल !!!

जो पत्र आज प्रेषित करना था वो तो मेज पर ही रखा रह गया।
और अब तुम्हे जल्दी - जल्दी नया पत्र लिख रहा हूँ।
आज सुबह हॉकर ये पत्रिका दे गया।
नीचे देखो .... " नया ज्ञानोदय " !

भले ही पूरी ना पढूँ पर कुछ मासिक हिंदी पत्रिकाएँ हर महीने बुलवा लिया करता हूँ।
उन पर हाथ फेरना, उन्हें बीच में ही कहीं से खोल कर पढ़ने लगना या फिर उनके नए-नकोर प्रिंटेड कागज़ के बिलकुल क़रीब अपना चेहरा ले जा कर शब्दों को सूँघना .... ये बचपन से मेरा शग़ल है।
….... तासीर है या मनोविकार ? ये भी एक प्रश्न ही है , क्योंकि ये सब शायद मेरी घुट्टी में है।
इस पत्रिका के मुखपृष्ठ को ध्यान से देखो ....
दीवार पर लगी हुयी हाथों की ये छाप देख रही हो?
ये छाप होली के रंग की है।
होली के सात दिन बाद शीतला-सप्तमी पर होने वाली पूजा में भी हाथों की ऐसी ही छाप लगायी जाती है।
उसमें रंग नहीं होता। चावल को गला कर पीसते हैं , फिर हल्दी मिला कर एक लेप तैयार करते हैं और उसकी छाप लगाते हैं।
पर मैं इस पर कोई बात नहीं करना चाहता …

मैं तो उस बच्चे को देख कर चमत्कृत हूँ , जिसके पैर ज़मीन पर नहीं हैं !
उड़ रहा है वो। गली के इस तनहा छोर से, रंगों की ओर …
और वो देखो , उधर एक छोटी सी खिड़की .... जिसके भीतर से चार जोड़ी हसरत भरी निगाहें बाहर तक रही होंगी।
जीवन …जीवन … जीवन …!
कौन कहता है कि जीवन एक पहेली है
तुम्हारे शब्दों में कहूँ तो " बस यही क्षण " !
" The very moment and that's it !!! "

पर इस एक पल के लिए भी कितना तरसना पड़ता है अब !!!
अँधेरी गलियाँ , बदरंग रस्ते , खिड़कियों की लुप्त होती परंपरा और खुद से दूर करती बाज़ार की चमक !!!
बाज़ार जो हर क़दम पर असहज करते हैं
बाज़ार जो बौनेपन का एहसास थोपते हैं
बाज़ार जो प्रकृति से दूर ले जाते हैं
तुम समझ रही हो ना ?
शायद तुम कहीं ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकोगी।
क्योंकि बाज़ार तुम पर तब भी हावी नहीं हुए जब तुम " घोर पूंजीपतियों " के बीच थी।
प्रकृति तब भी तुम्हारी सहचरी बनी रही, जब तुम हिंदुस्तान से बहुत दूर विदेश में थीं।
खैर ....
कहना ये चाहता हूँ कि
" मेरा बचपन तो वैसा ही उन्मुक्त गुज़रा , जैसा कि ये भागता हुआ बच्चा ....
पर मैं अपने बेटे के लिए अब ऐसा बचपन कहाँ से लाऊँ ? "
बोलो न सखी …
संक्षिप्त ही सही ,
उम्मीद है उत्तर अवश्य लिखोगी

तुम्हारा
देव

2 comments:

  1. इतने ज़हीन प्रेम पत्र पढ़कर कौन होश में रहेगा .......... ऋषिकेश वैद्य के ये पत्र एक दिन देखिएगा अपनी एक अलग पहचान बनायेंगे

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