एक लम्हा खुद के साथ बुद्धत्व है 
पर मिले तो सही 
महाभिनिष्क्रमण सबके लिए संभव नहीं  … 


रश्मि प्रभा 



सिद्धार्थ का महाभिनिष्क्रमण एवं यशोधरा का वियोग 
संध्या तिवारी 

यशोधरा भारतीय इतिहास की वह नारी है जिसके आँसू बहे तो लेकिन व्यर्थ नहीं गए । न तो किसी ने  इन आंसुओं  पोछा  और न ही उसे संजो कर ही रखा । आज भी बुद्ध के अवशेषों के लिए हम खाक छान  रहें हैं  और उसे संजो कर रखने की होड़ लगी है । देश विदेश सभी बुद्ध के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हैं । एक से एक मठ बनाये जा रहे हैं , लेकिन क्या किसी ने ये सोंचा कि बुद्ध को महान बनाने में यशोधरा का क्या योगदान था? क्या वो तड़पी   नहीं होगी जब युवावस्था में ही उनके पति उन्हें  छोड़ वैराग्य की ओर प्रस्थान कर गए ? कौन पत्नी होगी जो अपने पति से दूर रहना चाहेगी ? वो भी तब जब वो पहली बार माँ बनी हो । अपने संतान को उसके पिता के गोद में वो नहीं देखना चाहेगी ? एक नारी के ह्रदय पर क्या बीतती होगी ये तो वही जानती है।

          समाज भी वही  और लोग भी वही , बस काल  विशेष का फर्क । ताने तो यशोधरा को भी सुनने पड़े होंगे । जब तक सिद्धार्थ भगवन बुद्ध नहीं बने तब तक तो यशोधरा ही दोषी मानी जाती  होगी और लोग कहते होंगे कि इसमें अपने पति  को मोहित करने की क्षमता ही नहीं है या फिर सिद्धार्थ उसे पसंद ही न करते हों। जितनी मुंह  बातें होती होंगी और बेबस हो उसे सब सहन करना पड़ता होगा । अपने ही लोगों के बीच  बेगानी हो गयी होगी वो, पर उसमे इतनी हिम्मत तो  जरुर  थी कि वो वर्षों तक सब कुछ सहन कर पायी । आखिर  किसको उलाहना देती वो? खुद को या अपने पति को ? जो पति संसार के कल्याण के लिए उसे  सोयी अवस्था में छोड़ कर चला गया उसे दोष देकर क्या वो समाज के लिए अच्छा करती ?

    दुःख तो बहुत था यशोधरा को और इस बात का  और अधिक था कि क्यों उसे सोते  हुए छोड़ उसके स्वामी चले गए ? एक  बार  जगा तो दिया होता , वो भी उन्हें  जी भर के देख कर तृप्त हो लेती , लेकिन सिद्धार्थ क्या जाने नारी मन की व्यथा , समर्पण और आत्मशक्ति । वो भी नारी के उस कमजोर पक्ष की ओर ही देखे, जहाँ वो ममता और करुणा   की  मूर्ति बन बिछोह बर्दाश्त नहीं कर पायेगी । उन्हें लगा यशोधरा उन्हें मनुहार कर  रोक लेगी, बाधक बन जाएगी उनके मार्ग का , फिर उनका उदेश्य कैसे पूर्ण होगा, यही था शायद उनके मन में ,   परन्तु ऐसा नहीं था । यशोधरा अपने पति के वैराग्य मन को पहले सा जानती थी । यदि उसे रोकना होता तो  वो पहले ही प्रयत्न नहीं करती ? पुत्र जन्म तक सिद्धार्थ भी उनके साथ थे, तो क्या वो पति की बातों से उनके ह्रदय का भाव नहीं जानती थी ? अवश्य जानती  थी और उसे कोई मलाल नहीं था , बस दुःख इस बात का था कि स्वामी का दर्शन वह उस पवित्र बेला में न कर  सकी जिस समय उनका महाभिनिष्क्रमण हो रहा था ।
                       यदि हम यशोधरा को कमजोर नारी मानेगे तो  वो गलत होगा क्योंकि वर्षों  लगे सिद्धार्थ को बुद्ध बनने  में और तब तक वो , सामाजिक  मानसिक प्रताड़ना को सहती  रही । वो कमजोर होती तो कब का अपने प्राण त्याग दी होती । इतिहास यही कहता कि  बुद्ध के गृह त्याग के पश्चात उनकी पत्नी यशोधरा इस विरह वेदना को सहन नहीं कर सकी और प्राण ही त्याग दिए , लेकिन नहीं वो जीवित रही और अपने पुत्र की अच्छी परवरिश की । उन्हें तो इंतजार था अपने पति के बुद्धत्त्व की प्राप्ति का । वह उस सुख का आनंद लेना चाहती थी जिसे सिद्दार्थ पाने के लिए व्याकुल थे और गृहत्याग किया । महाभिनिष्क्रमण को फलीभूत होते देखना चाहती थी वो ।
            बुद्ध  बनने  के बाद पूरी दुनिया उन्हें भगवान्  के रूप में पूजने लगी लेकिन यशोधरा फिर भी अकेली रह गयी उसके त्याग को किसी ने नहीं समझा । उसकी महत्ता को गौण क्यों कर दिया गया ?


सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण..s

गत 20 जनवरी को मेरे बड़े भाई डॉ० सिद्धार्थ Ischemic Heart and Brain Disorders पर शोध करने के लिये 3 साल के लिये दक्षिण कोरिया के लिये रवाना हुए.. परिवार में किसी की पहली विदेश यात्रा है यह.. सबका विचलित होना स्वाभाविक है.. मेरे विचलन का परिणाम है ये कुछ पंक्तियाँ..




भैया,
जा रहे हो तुम ना,
इस वतन से, इस आबो-हवा से दूर
नये लोगों के बीच
नई परिस्थितियों के बीच..

देखो-
तुम्हें विदा करने कौन आया है....!

गाँव के बाहर कच्चे आम के बागीचे/टपकते महुए के बाग
उसके पार धान के खेत/पम्पिंग-सेट के हौदे
कर्बला पर के साँप-बिच्छुओं की अनगिन दंतकथायें
पेड़ की कोटरों में छिपे चिड़ियों के अंडे
वे सारे तोते, जो तुमने पोसे
तुम्हारे खींचे कबड्डी-चीके के पाले/गाड़ी गईं विकेट
तुम्हारी लखनी/दुबरछिया के डंडे/सतगाँवा की गोटियाँ
तुम्हारा पहला बल्ला/सॉरी, मैनें तोड़ दिया था उसे
और तुम्हारी पहली ट्रॉफियाँ- जीते गये अनगिनत कंचे
जो मैनें हारे, सीखने की प्रक्रिया में.....

महिया में डूबा भूजा/अलाव में भुना आलू
नेपाली रबर की गुलेल- बहुत शिकार किये थे तुमने
पाठशाला के मौलवी साहब के डंडे
पोखरे का शिव मंदिर/घाट की सीढ़ियाँ/शिवरात्रि का मेला
नागपंचमी के दिन पुतरी पीटने के ताल-तलैये
दशहरे की रामलीला/ठाकुर जी का झूलन

बाबूजी का अखबार-ऐनक-खड़ाऊँ/अम्माँ का मीसा हुआ भात/चटनी
सोते हुए माँ के हाथों की खिलाईं रोटी/दी गई थपकियाँ
पापा के हाथ/बिना जिनके पकड़े दूध तुम्हारे गले से नीचे नहीं उतरता था
छोटे चाचा/जो रामलीला में तुम्हारे पीछे खड़े होकर तुम्हें
चतुर्भुज विष्णु का रूप देते/जबकि तुम स्टेज पर उँघ रहे होते
बड़े चाचा की लेग-स्पिन होती गेंदे
हर छुट्टी में तुम्हारे-मेरे पीछे पेट की दवा और पानी का गिलास लेकर दौड़ती बहन
जिसका पाणिग्रहण कराके विदा किया है तुमने अभी
टिल्लू, आदित्य, छुटकी, छोटा बाबू/तुम जिनके लिये बाबाभैया हो
और मैं..!

और भी हैं....
लखनऊ यूनिवर्सिटी के लेक्चर हॉल/सिमैप की लैब
क्लासिक की चटनी/बादशाहनगर का प्लेटफॉर्म/गोरखनाथ एक्सप्रेस
रविवार को मौसी के घर का खाना/गंजिंग
रीगल सिनेमा/पालिका बाजार/नाथू के समोसे
कोटला फीरोजशाह के बंद दरीचों के बाशिंदे
बुआ की बनाई घुघनी/दिल्ली की ठंड
और...और...और...

और भी असंख्य चीजे हैं, जो विदा करती हैं तुम्हें
ये और कुछ नहीं, तुम्हारे अस्तित्व के कण हैं/तुम्हारे फंडामेंटल पार्टिकल्स
ये सारे रंग/खुशबुयें/स्वाद/इमेजेस/महसूसियात/श्रुतियां/स्मृतियां
सहेज कर ले जाना अपने साथ
खुद को कभी अकेला नहीं पाओगे/अजनबियों के बीच भी
निस्वार्थ प्रेम रहा है इनका/किसी प्रतिदान की आकांक्षा नहीं

लेकिन मेरी एक आस है.....

सदियों पहले तुम्हारे ही एक  नेमसेक ने घर छोड़ा था
तो दुनिया को मिली थी ज्ञान, सत्य की अद्भुत विरासत
शांति के अनंतिम शिखर..
मैं चाहूँगा-
इस गाँव-गिराँव-समाज-राज्य-राष्ट्र को कुछ मिले तुमसे
सुना तुमने!

मैं चाहूँगा,
यह सिद्धार्थ का दूसरा महाभिनिष्क्रमण सिद्ध हो..!



एक मन और... उपमा ऋचा
प्रस्तुति उपमा श्रीवास्तव 


तुलसी की ताड़ना या बुद्ध का भय. राम की मर्यादा या कृष्ण का रास. धर्म की विवशता या दुर्योधन का अट्टाहास, प्रसाद की श्रद्धा या निराला का श्रम..... कहाँ से शुरू करूँ अपनी यात्रा? पीछे स्मृतियों का एक लम्बा वितान फैला दिखायी देता है तो आगे भी उतना ही वैराट्य है, उतना ही विस्तार....समय के सामानांतर चलती इस यात्रा का कोई अंत, कोई ठौर नहीं.... अनगिनत रूप, अनगिनत नाम, अनगिनत किरदारों को ओढ़ मुझे चलते रहना है, सदियों को लांघते, काल से संवाद करते हुए. अथक. अनवरत. अविराम. क्योंकि मैं सृजक हूँ. मैं पोषक हूँ. मैं स्त्री हूँ.... !!!
बात उन दिनों की है. जब दुनिया में सरहदें नहीं खिचीं थीं. धरती पर हिन्दू-मुस्लमान, यहूदी-पारसी जैसी संज्ञाएँ नहीं मनुष्य रहते थे. यह वो समय था, जब बहस खड़ी करने के लिए भाषाएँ नहीं थीं और न समाजवाद, विकासवाद, अलगाववाद जैसे शब्द थे. तब डर जीवन की अनिवार्य शर्त था और मन बाँटने वाले संस्कार, रोपे जाने की प्रतीक्षा में कहीं दूर खड़े देखा करते थे, पत्थरों पर भावनाओं का उकेरा जाना. उस युग में स्त्री-पुरुष को आदम-हब्बा, एडम-इव या मनु-शतरूपा बनने की जल्दी नहीं थी. उनका साथ सुख या दुःख के लिए नहीं जीवन को बचाए रखने के लिए था. उन्हीं दिनों झुण्ड में खाते, पीते, शिकार खेलते हुए मेरी यात्रा शुरू हुयी. आदिमयुग के पाषण और बर्बर अंधेरों से अपने समूह को बचाए रखने की यात्रा. अंधेरों को कुरेदकर उनसे रोशनी का सुराग खोज निकालने की यात्रा...
मैं यानि ज्ञान को जन्म देने वाली ‘हब्बा’. मैं भय में शांति का विश्वास सौंपती ‘मातृदेवी’. मैं जातियों और कबीलों से पहले परिवार जोड़ने वाली ‘चीरा’. मैं मंत्रदृष्टा घोषा . मैं दीप शिखा-सी ‘भामती’. मैं सिर कटवाने को उद्धृत ‘गार्गी’. मैं महाभिनिष्क्रमण की राह में खड़ी यशोधरा. मैं वनप्रांतर लांघकर बोधि क्षणों को तलाशती ‘सुजाता’. मैं काषाय में लिपटी नगरवधू. मैं भूमिगत होती भूसुता जानकी और मैं लक्ष्य, भिक्षा, दांव, प्रतिशोध व प्रश्नों के प्रहार झेलती पांचाली...रजिया, गुलबदन, नूरजहाँ या जहाँआरा. बेलिंडा, हेलेना, क्लियोपेट्रा या बिएत्रिस.....अनगिनत रूप, अनगिनत नाम, अनगिनत किरदार ओढ़े मैं चल रही हूँ, तुम्हारे पीछे न जाने कब से. नहीं...निसंग रहकर नहीं. पूरी तल्लीनता, पूरे समर्पण और पूरी अंतश्चेतना के साथ. यूँ तुम भी जानते हो कि निसंग रहना, मेरे लिए संभव नहीं. आख़िर मेरे मन की बुनावट तुम्हारे मन से अलग जो है. यह बात मैं नहीं वैज्ञानिक अनुसंधान कह रहे हैं. पिछले दिनों पेंन्सल्वेनिया मेडिकल कॉलेज के रेडियोलॉजी विभाग में कार्यरत रागिनी वर्मा ने लगभग 1000 व्यक्तियों के ब्रेनस्कैन का करके साबित किया कि चूँकि पुरुषों के मष्तिष्क का बायाँ भाग अधिक सक्रिय होता है और स्त्रियों का दाहिना, इसलिए स्त्री मन पुरुष की तुलना में अपने वातावरण के प्रति अधिक संवेदनशील होता है और उसी अनुपात में पुरुष अधिक लॉजिकली सोचते है. खैर....मन: कृतं कृतं लोके, न शरीरं कृतं कृतं... यानी यह संसार मन की गति से गतिमान है, न कि शरीर की गति से. जानती हूँ मनु पुत्र इस मन की गति को बांध पाना संभव नहीं, तथापि....आज मेरा मन पुनः अपने प्रारब्ध को जीना चाहता है. पुनः खोलना चाहता है वो सारी गाँठें, जिनसे बंधी हूँ मैं. मेरा जीवन और मेरा सत्य.....

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