लघुकथाएँ कम समय में,कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाती हैं, दिल के कई कोनों को झंकृत कर देती हैं  .... 

रश्मि प्रभा 



भूत-कथा
दिनेशराय द्विवेदी




रात बाथरूम में चप्पल के नीचे दब कर एक कसारी (झिंगूर) का अंत हो गया। चप्पल तो नहाने के क्रम में धुल गयी। लेकिन कसारी के अवशेष पदार्थ बाथरूम के फर्श पर चिपके रह गए। 

अगली सुबह जब मैं बाथरूम गया तो देखा कसारी के अवशेष लगभग गायब थे। केवल अखाद्य टेंटेकल्स वहाँ कल रात की दुर्घटना का पता दे रहे थे। बचे हुए भोजन कणों का सफाया करने में कुछ चींटियाँ अब तक जुटी थीं। 

अगली बार जब मेैं बाथरूम गया तो वह पूरी तरह साफ था। वहाँ न चींटियाँ थीं और न ही कसारी का कोई अवशेष। किसी ने स्नान के पहले उस के फर्श को जरूर धोया होगा। 

कसारी एक जीवित पदार्थ थी, एक दुर्घटना ने उस के जीवन तंत्र को विघटित कर दिया, वह मृत पदार्थ रह गयी। चींटियों ने उसे अपना भोजन बनाया। मृत पदार्थ अनेक जीवनों को धारण करने का आधार बना। बाथरूम धुलने के समय कुछ चींटियाँ वहाँ रही होंगी तो पानी में बह गयी होंगी। जाने वे जीवित होंगी या फिर उन में से कुछ मृत पदार्थ में परिवर्तित हो कर और किसी जीवन का आधार बनी होंगी।

इस बीच काल्पनिक आत्मा और परमात्मा कहीं नहीं थे, अब इस कथा को पढ़ कर वे किसी के चित्त में मूर्त हो भी जाएँ तो उन सब का आधार यह भूत-कथा ही होगी।



लघुकथा - झूठ
ज्योति देहिवाल

आपकी सहेली





सुबह की उस घटना के बाद शिल्पा का मन बहुत उदास था। किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। उसका मन बार-बार आशंकित हो उठता। 'आखिर मेरी परवरिश में ऐसी कौन सी कमी रह गई जो आज मेरे बेटे ने झूठ बोला! झूठ बड़ा या छोटा नहीं होता, झूठ झूठ होता है बस। मैंने मेरे बच्चों को बचपन से ही यही सीख दी है कि चाहे कुछ भी हो जाए झूठ नहीं बोलना चाहिए। फिर आज मेरे बेटे ने झूठ क्यों बोला? आज एक बार झूठ बोला, कल को दुबारा और फ़िर…' शिल्पा बेसब्री से शाम को बेटे का स्कूल से आने का इंतजार करने लगी ताकि उससे पूछ सके! सुबह सबके सामने पूछना उसे उचित नहीं लगा। 

शाम को बेटे के स्कूल से आने पर बेटा स्कूल की बाते बताने लगा। शिल्पा के कोई प्रतिक्रिया न देने पर उसने पूछा 'मम्मी, क्या बात है? आप नाराज हो?' 'आज दादाजी का श्राद्ध है। तू ने दादी माँ से झूठ क्यों बोला कि कौए ने रोटी खा ली? जबकि हमारे बहुत इंतजार करने पर भी, एक भी कौआ छत पर आया ही नहीं था।'

'ओफ हो मम्मी, आप ही कहती है न कि किसी और के भले के लिए झूठ बोला जाए तो वो झूठ नहीं होता। आजकल शहरों में कौओं के दर्शन ही कहां होते है जो वे श्राद्धों में खाना खाने आए? ये बात मैं दादी माँ को नहीं समझा सकता था। हर बार की तरह वे आप ही को दोषी ठहराती! तू ने सर पर पल्लू डालकर खाना नहीं बनाया, दादाजी को दही-बड़े पसंद थे वो तुमने नहीं बनाये, तुमने खाना मनसे नहीं बनाया और भी न जाने क्या क्या!! अब शहरों में कौएं ही नहीं है इसमें आपकी क्या गलती? आपको दादी माँ की बातें सुनना न पड़े इसलिए…'

प्रेमातिरेक में शिल्पा की आंखे भर आई। उसे अपनी परवरिश पर नाज हो उठा।

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर और प्रभावी लघु कथाएं...

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  2. बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी लघु कथा प्रस्तुति हेतु आभार!

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  3. मेरी लघुकथा को यहाँ स्थान देने का शुक्रिया।

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