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Thursday, July 2, 2009
बक्त आएंगे जिसके वो मर जायेंगे
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Friday, June 26, 2009
आह! जिंदगी ......वाह! जिंदगी .....!
" फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए -
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है !"
कभी-कभी फिसलने का भी अपना एक अलग मजा है , क्योंकि इससे जिंदगी को करीब से देखने में मदद मिलती है . वह जिंदगी जिंदगी ही क्या जिसमें अस्त व्यस्तताएं न हो -
"आह - सी धुल उड़ रही है आज, चाह-सा काफिला खडा है कहीं -
और सामान सारा बेतरतीब, दर्द- सा बिन - बंधे पडा है कहीं !"
इसी को कहते है - आह! जिन्दगी ....वाह! जिंदगी .
एक-डेढ़ माह के अंतराल के बाद आज फिर से लौटा हूँ परिकल्पना पर इस आशय के साथ , कि -
" फिर उगेंगे चाँद-तारे , फिर उगेगा दिन -
फिर फसल देंगे समय को ,यही बंजर खेत !"
" खुदा नहीं , न सही, आदमी का ख्वाब सही -
कोई हसीन नजारा तो है नजर के लिए !"
इसके साथ ही दो महत्वपूर्ण बातें और करनी है आज आपसे - पहली बात तो यह,कि मेरे मन में बहुत दिनों से ये विचार आ रहे हैं कि लखनऊ में एक वृहद् एक दिवसीय सम्मलेन का आयोजन हो और दो चरणों में हो . पहले चरण में साहित्य-संस्कृति-समाज- तकनीकी -यात्रा-चिंतन-विज्ञान-कला- कृषि और अध्यात्म से जुड़े वर्ष के सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकारों को सम्मानित किया जाए और दूसरे चरण में कवि सम्मलेन हो और वही कवि शामिल किये जाएँ जो ब्लोगर हों और देश के चर्चित कविओं में उनका शुमार होता हो .......!
दूसरी बात
यह है कि मैं एक नया ब्लॉग और लेकर आने पर विचार कर रहा हूँ जिसमें हिंदी के दुर्लभ-विस्मयकारी और महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्याएं हों, शब्दों की उत्पति तथा उन शब्दों से जुडी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी हो.....यानि अनमोल शब्दों की प्रासंगिकता सहित प्रस्तुति .......इस सन्दर्भ में आपकी टिपण्णी मेरा मार्गदर्शन कर सकती है ....!
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Thursday, April 30, 2009
जब बीमार होता है कोई मजदूर
जब बीमार होता कोई सेठ
जरूरत महसूस नही होती ओझा- गुणी की
नीम-हकीम से भी ठीक नही होते सेठ
दुआएं नही भाती उसे अपने मजदूरों की
दिए जाते कोरामीन / पहुंचाया जाता कोमा में
किसी अमीर शहर के अमीर अस्पताल में
मंत्रियों की सिफारिशों पर
बुलाए जाते चिकित्सकों के दल गैर मुल्कों से
हिदायत दी जाती सेठ को
अय्याशी न करने की
ठीक हो जाने तक ....!
मगर जब बीमार होता कोई मजदूर
सब कुछ सहज होता
वैसे हीं
जैसे सहज होती पृथ्वी
सहज होती चिडिया
सहज होता कुम्हार
चलती हुई चाक पर बर्तन गढ़ते हुए ....!
नही बदल जाता शहर का मिजाज अचानक
नही होती मन्त्रियों के कानोंमें सुनगुनाहट
ठीक हो जाती बीमारी
एक खुराक वाली पुडिये से
और अगले हीं दिन
निकल जाता वह काम पर
पहले की तरह इत्मीनान से ।
किंतु , कट ही जाती
उसकी एक दिन की दिहाडी
बहाना बनाने के जुर्म में ....!
अर्थ-व्यवस्था की नींब होते हैं मजदूर , किंतु फ़िर भी -
चिंतित नही होते सेठ , जबकि-
दोनों बीमार पड़ते हैं
एक काम करते हुए तो दूसरा काम न करने के एवज में .....!
() रवीन्द्र प्रभात
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Wednesday, April 22, 2009
पाश्चात्य चश्में से भारतीय गरीबी को नंगा दिखाने का यह कैसा षडयंत्र है ?
आजकल ऐसी चर्चा है , कि ऑस्कर विजेता फिल्म 'स्लमडॉग मिलिनेअर' में लतिका के बचपन का किरदार निभाने वाली नौ साल की रुबीना अली को उनके पिता रफीक कुरैशी ने करीब डेढ़ करोड़ रुपए में बेचने की कोशिश की। ब्रिटने के अखबार 'न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड' ने एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए इसका खुलासा किया है । न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड की वेबसाइट के मुताबिक उनके रिपोर्टर दुबई के शेख बनकर रुबीना के पिता से मिले और रुबीना को गोद लेने की बात की।
ऑपरेशन के जरिए रिपोर्टर ने रुबीना के पिता को रंगे हाथों कैमरे में कैद किया है। बेबसाइट का दावा है कि रुबीना के पिता रफीक ने 2 लाख पाउंड यानी करीब डेढ़ करोड़ रुपये की मांग की। रुबीना के पिता के साथ उसके चाचा भी इस डील में हिस्सा ले रहे थे। हालांकि रुबीना के परिवार वालों ने ब्रिटिश अखबार के दावे को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि सारी बातें विज्ञापन के लिए हुई थीं। रुबीना की चचेरी बहन ने कहा कि कोई पिता अपनी बेटी को बेचने की बात सोच भी नहीं सकता।
मैं नही जानता कि क्या सच है और क्या झूठ , मगर क्या स्टिंग ऑपरेशन के लिए उन्हें क्या हमारी ही गरीबी दिखी ? पाश्चात्य देशों में हो रही भारतीय गरीबी की इस नुमाईश की अनुभूति मात्र से मन में एक अजीव पीडा का भाव आता है । इससे यह साबित होता है कि वैश्वीकरण के बावजूद संस्कृतियाँ एक-दूसरे को समझने में काफी हद तक नाकाम रही है । उन्हें भारत का अच्छा पहलू दिखाने में क्या दिक्कत है ?आखिर वे यही दिखाना चाहते हैं न कि हम बेटियाँ बेचते हैं .....!
मेरा मानना है कि यूरोप में एक ऐसा वर्ग विकसित हुआ है जो भारत को विश्वपटल पर दरिद्र व् भ्रष्ट देश दिखाना चाहता है । यह और कुछ नहीं,पाश्चात्य देशों के द्वारा भारतीय गरीबी को नंगा दिखाने का सबसे बड़ा षड़यंत्र है । अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इसका विरोध किया जाना चाहिए , ताकि उन्हें हमारी शक्ति का अंदाजा हो सके । इस सन्दर्भ में आपका क्या ख़याल है ?
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Thursday, April 16, 2009
गरीबों की सुनो मगर गरीबी महसूस न करो ......!
आज चुनावी महासमर का पहला पड़ाव पूरा हुआ , सारे राजनीतिज्ञ दूसरे पड़ाव की ओर कूच कर गए ...... और धरी की धरी रह गयी गरीबी ...अब पाँच साल के बाद ही उन क्षेत्रों में होंगे प्रभु के दर्शन .....यही है भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा आकर्षण । किसी ने ठीक ही कहा है, कि यदि भारत में गरीबी नही होती तो नेताओं का वजूद नही होता और जब तक गरीबी रहेगी नेताओं का वजूद रहेगा ......कमबख्त गरीबी बड़े काम की चीज है । अब भला आप ही बताईये कि काम की चीजों का भी कोई त्याग कर सकता है ? नही न ? तो फ़िर नेता क्यों करे ?
इस चुनाव में बहुत ही अजीब बात जो देखने को मिली वह यह कि छोटा हो बड़ा कोई भी दल हो , उसे केवल दो ही चीजों से प्रेम रहा एक- प्रधान मंत्री की कुर्सी से और दूसरी गरीबी से ....प्रत्येक दल के नेता ख़ुद को प्रधान मंत्री के रूप में महिमामंडित करते हुए मिले या फिर गरीबों के मसीहा घोषित करते हुए ......अब भाई जब चुनावी गठजोड़ का युग है तो प्रधान मंत्री से नीचे का पद क्यों लिया जाए ? भला बताईये हूजूर ! गंगा नहाने में किसको आनंद नही आता ? जब प्रधान मंत्री पद की लूट है तो लूटने में क्या हर्ज़ ?
हमारे गाँव के धरीछन मिसिर भी सांसद बनने के लिए इस बार अपनी नई कुर्सी पकड़ पार्टी बनायी है और कहते हैं कि यदि इस बार जीत गया तो हो सकता है मैं भी प्रधान मंत्री बन जाऊं ....लोगों ने पूछा कैसे ? तो उन्होंने कहा देखो बिना गठ्बंदन के सरकार बनेगी नही ....हो सकता है है कमजोर प्रधानमन्त्री के नाम पर सहमति बन जाए और मैं भी .......बन जाऊं ! जब सब के सब अपने मुंह मियाँ मिट्ठू हैं तो मैं क्यों नही ? इस बात से अगर सबसे ज्यादा आपत्ति किसी को है तो वह है अकलू बैठा ... ! अकलू बैठा धरीछन मिसिर के अपोजिट में खड़े हुए हैं ,कहते हैं धरीछन सपना देख रहे हैं प्रधान मंत्री तो मैं ही बनूंगा ......जब कमजोर प्रधान मंत्री ही बनने की बात होगी तो मुझसे ज्यादा कमजोर कौन है इस देश में .....कई दफाओं में वांछित होने के कारण मुझे तो सबके तलवे चाटने है .....यानी जो सबका चहेता होगा वही प्रधान मंत्री बनेगा ।
हमारे यहाँ की एक और प्रत्याशी है राम प्यारी , कहती है अगर प्रधान मंत्री पद किसी महिला को मिला तो निश्चित रूप से मुझे ही मिलेगी ! अभी-अभी मैं विदेश भ्रमण कर के आई हूँ और यदि मुझे बना दिया गया प्रधान मंत्री तो मैं भी विदेशी चश्में से भारतीय गरीबी को देखने का प्रयास करूंगी ! लोगों ने पूछा मेमसाहब ! आपकी पास तो पासपोर्ट है हीं नहीं फिर विदेश घूम कर कब आ गयीं ? हमारी राम प्यारी यह सुनकर बड़े अनोखे अंदाज़ में कहती है - " अरे नेपाल विदेश नहीं है तो का है ? धरिछन और अकलूआ तो वहां भी नहीं घूमा होगा ......!"
हम तो इस वार संसद में यह प्रस्ताव रखने वाले हैं कि यदि गठबंधन में २८ दल हैं तो २८ प्रधान मंत्री बनाओ ! हर राज्य से एक और यदि एक राज्य से दो उम्मीदवार हो जाए तो लौटरी निकाल दो यानी हेड-टेल कर लो . क्या फर्क पङता है ? अरे भैया चूं-चूं का मुरब्बा है , मिल बाँट कर खाओ , मतभेद रहेगा ही नहीं ..../
जहाँ तक भारतीय गरीबी का प्रश्न है तो यह अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है , यह ऐसी गाडी है जिसका कभी पेट्रोल ही नही ख़त्म होता । भाई मेरे , अपना तो एक ही सिद्धांत है - गरीबों की सुनो मगर गरीबी महसूस न करो । वादा करो मगर उसे पूरा न करो । जब तक गरीबों का वजूद है , हमारे पीछे ध्वज लेकर चलने वाला समूह है .....यानी कि अगर मिटानी ही है तो गरीबी नही बच्चा , गरीबों को मिटाओ ......इतना कहकर हमारे नेता जी ने एक शेर उडेल कर आगे चल दिए .......पता नही अब कब आयेंगे हमारे दरवाजे ....एक साल -दो साल या पाँच साल पता नही ......पता नही ....अरे हां , आप भी सुन लीजिये वह शेर जिसे महिमामंडित करते हैं हमारे नेता जी -
"इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो ।
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुंआ । । "
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Wednesday, April 1, 2009
आदमी और नेता में क्या अंतर है ?
पहला अंतर-
आदमी थोड़े प्रयास के बाद नेता बन सकता है , मगर नेता लाख कोशिश कर ले आदमी नहीं बन सकता ....!
दूसरा अंतर-
आदमी की आँखों में पानी होता है , किन्तु नेता की आँखों में पानी नहीं होता ....!
तीसरा अंतर-
आदमी लात खाने के डर से गलत बातों को हवा नहीं देता , किन्तु नेता का हवा लात से गहरा रिश्ता होता है ....!
चौथा अंतर-
आदमी जिसे चाट लेता है उसे कभी नहीं काटता , लेकिन नेता जिसको चाटता है उसीको काटता भी है ......!
पांचवां अंतर -
आदमी गलती करने के बाद झुक जाता है , किन्तु नेता ऊपर उठता चला जाता है ....!
छठा अंतर-
आदमी को कुछ-कुछ होता है , मगर नेता को कुछ भी नहीं होता .......!
सातवाँ अंतर-
आदमी साल में एकबार अप्रैल फूल मनाता है, किन्तु नेताओं के लिए प्रत्येक दिन अप्रैल फूल होता है ....!
आठवा अंतर-
आदमी जागने के वक़्त जाग जाता है, किन्तु नेता कुछ भी हो जाए पांच साल के बाद ही जगता है....!
नौवा अंतर-
आदमी के लिए स्व से उंचा चरित्र होता है,किन्तु नेता के चरित्र के ऊपर मैं हावी होता है ....!
दसवां अंतर -
आदमी रिश्तों में सराबोर होता है , नेताओं में केवल गठजोड़ होता है ...!
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Thursday, March 26, 2009
निर्वाचन के घाट पे भई नेतन की भीड़
निर्वाचन के घाट पे , भई नेतन की भीड़ !
जनता बन गयी द्रौपदी , खींच रहे हैं चीर !!
गदहा गाये भैरवी , तनिक न लागै लाज !
शाकाहारी बन गए , गिद्ध -गोमायु -बाज !!
पक्ष और प्रतिपक्ष में, ढूंढ रहे सब खोंच !
पांच बरस तक चोंचले, खूब लड़ाए चोंच !!
हरियाली की बात करे , सूख गए जब पात !
जनता भोली देखती , नेता का उत्पात !!
कृष्ण-दु:शासन साथ हैं , अर्जुन बेपरवाह !
कोई मसीहा आये, दिखलाये अब राह !!
() रवीन्द्र प्रभात
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