पिछले दिनों ठहाका में एक व्यंग्य प्रकाशित हुआ सांवली । मैंने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा था कि - भाई बसंत, किसी ने ठीक ही कहा है, कि - ज़िस्म की सुंदरता उस मृगमारिचिका की तरह है, जो छल, कपट और भ्रम का भान कराती हैज़वकि मन की सुंदरता वह पवित्र गंगाजल है जो अमृत का रसपान कराती है. मैं यदि बासु की जगह होता तो यही कहता, कि चंपा - ख्वाबों की ताबीर तुम्हारी आँखों में है, शोख जवां कश्मीर तुम्हारी आँखों मे है. तुझमे है तासीर मोहब्बत की भीतर तक- शायर ग़ालिब- मीर तुम्हारी आँखों मे है.आपकी कहानी बार- बार पढ़ने योग्य है, साथ ही व्यंग्य की मिलावट कहानी के भीतर की सुंदरता काएहसास करा रही है. प्रतिक्रिया में महज चार शेर कहने के बाद मैं पूरी ग़ज़ल लिखने के लिए प्रेरित हुआ । कृतज्ञ हूँ भाई बसंत आर्य का , जिनके व्यंग्य ने मुझे ग़ज़ल के लिए प्रेरित किया । प्रस्तुत है पूरी ग़ज़ल -
ख्वाबों की ताबीर तुम्हारी आंखों में है,
शोख ज़वां कश्मीर तुम्हारी आंखों में है ।
तुझमें है ताबीर मोहब्बत की भीतर तक,
शायर गालीब- मीर तुम्हारी आंखों में है।
सुबहे काशी का मंजर ओ शाम अवध का,
क्या सुन्दर तस्वीर तुम्हारी आंखों में है।
छल्काये अंगूरी नेह लुटाये हौले से,
रांझा की ओ हीर तुम्हारी आंखों में है।
ताजमहल का अक्श नक्श एलोरा का,
प्यार की हर जागीर तुम्हारी आंखों में है।
भरी उमस में पिघल-पिघल के वरसे जो,
हिमांचल की पीर तुम्हारी आंखों में है।
बूँद- बूँद को तरस उठे जो देखे बरबस,
राजस्थानी नीर तुम्हारी आंखों में है।
गोरी गुजरती गुडिया शर्मीली सी,
सागर सी गम्भीर तुम्हारी आंखों में है।
चांद सलोना देख-देख के सागर झूमें,
गोया की तासीर तुम्हारी आंखों में है।
कान्हा नाचे रस रचाये छल्काये ,
रोड़ी- रंग- अवीर तुम्हारी आंखों में है।
तीरुपती की पावन मूरत सूरत सी,
दक्षिण की प्राचीर तुम्हारी आंखों में है।
तामील की खुशबू कन्नड़- तेलगू की चेरी,
झाँक रही तदबीर तुम्हारी आंखों में।
खजुराहो की मूरत जैसी रची- वासी हो,
छवी सुन्दर - गम्भीर तुम्हारी आंखों में।
गीत बिहारी गए , बजे संगीत रवीन्द्र,
भारत की तकदीर तुम्हारी आंखों में है।
......रवीन्द्र प्रभात

5 comments:

  1. "छवी सुन्दर - गम्भीर तुम्हारी आंखों में।
    गीत बिहारी गए , बजे संगीत रवीन्द्र,
    भारत की तकदीर तुम्हारी आंखों में है। "

    बहुत प्रभावशाली पंक्तियां. पूरी रचना ही प्रभावशाली है, लेकिन इन पंक्तियों ने विशेष प्रभावित किया -- शास्त्री जे सी फिलिप

    मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
    2020 में एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार !!

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  2. जबरदस्त के सिवाय कुछ भी कहना इस रचना को कमतर आंकना होगा....वाह!!!

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  3. मेरे तरफ से आपको जन्माष्टमी के शुभकामनाएँ
    दीपक भारतदीप

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  4. रवीन्द्र जी,
    रोज रोज निखरते जा रहे हो, क्या खूब संवरते जा रहे हो. बिल्कुल काबिले तारीफ़. बधाई हो. आपकी गजल पढ कर मुझे भी किसी शायर की ये दो पन्क्तियां याद हो आयी. मुलाहिजा फ़रमाईए
    सावन के बादलो‍ की तरह से भरे हुए
    ये वो नैन है जिनसे कि जंगल हरे हुए.
    आपका ही
    बसन्त आर्य

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  5. आपकी ग़ज़ल पढ़ने के बाद वाक़ई मैं आँखों ही आँखों में पूरा हिंदुस्तान घूम गया. सारे शेर नपे -तुले , कहीं भी कोई सकता नहीं. हिंदी और उर्दू अल्फ़ाज़ का बेजोड़ संगम. ग़ज़ल के चँद असआर पढ़ते ही मुझे नूवर साहब का एक शेर याद आ गया, अर्ज़ किया है -
    जबी को दर पे झूकाना वन्दगी तो नहीं,
    ये देख मेरी मोहब्बत में कोई कमी तो नहीं. आपकी इस ग़ज़ल को यदि जनाब ग़ुलाम अली साहब की आवाज़ मिल जाए तो मेरा दाबा है कि झूम उठेगा सारा हिंदुस्तान
    बेहद उम्दा ग़ज़ल के लिए दिल से शुक्रिया.

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