बीच वहस में.....
परसों इतवार का दिन था, सोचा कि कोई मित्र मिल जाये तो सिनेमा देखने चलें, पर शाम तक कोई मित्र ऐसा नही मिला जिसके साथ जाया जा सके. थक-हार कर शाम विताने के उद्देश्य से चला गया अपने एक करीबी मित्र प्रदुमन तिवारी के यहाँ, यह सोचकर कि कुछ मित्र एक साथ बैठकर जब विचारों का आदान- प्रदान करेंगे तो शाम खुश्ग्बार गुजर जायेगी . मैं प्रदुमन के घर के बाहर लॉबी में कुछ मित्रों के साथ बैठा गप्पे मार रहा था कि अचानक एक ऐसी घटना घटी कि मैं सोचने पर मजबूर हो गया. आप भी सुनेंगे तो नि: संदेह मजबूर हो जायेंगे सोचने पर. हुआ यह कि उसके यहाँ एक कामवाली आयी थी जो एक कोने में बैठकर बीडी पी रही थी और प्रदुमन का सबसे छोटा बेटा जो महज सात साल का है , उससे गपिया रहा था , उसे हिदायतें दे रहा था कि- " ये चाची! अपनी बीडी को जिगर से क्यों नहीं जलाती हो, माचिस के पैसे बचेंगे ?"यह सुनकर वह कामवाली पहले तो शरमाई फिर अपने कथई दातों को निपोरती हुई बोली- " धत्त , कइसन बात करत हौ बबुआ! जिगर से कहीं बीडी जलिहें ?" वह बालक इसप्रकार बातें कर रहा था जैसे आत्म विश्वास से लबरेज हो. उसने मासूमियत भरी निगाह डालते हुए कहा कि- " जलेगी न चाची , कोशिश तो करो !" वहाँ बैठे सभी लोग यह दृश्य देख अपनी हंसी को रोक नही पाए और खिलखिलाकर हंसने लगे, ठहाका लगाने लगे. वह बालक शायद यह सोचकर वहाँ से भागा कि लोग उसका मजाक उडाने लगेंगे. हमारी हंसी की गूँज से वह कामवाली भी शर्मा गयी. लोगों ने उस मासूम की बातें भले ही उस समय गंभीरता से न लिए हों लेकिन यह सच है कि दृश्य - मीडिया जो किसी भी समाज की सु संस्कारिता का आईना होता है, वही जब द्वि अर्थी संवादों के माध्यम से समाज को गंदा करने की कोशिश करे तो अन्य से क्या अपेक्षा की जा सकती है . आज यह हमारे समाज के लिए वेहद विचारणीय विषय है. ऐसे समय में जब फैला हो हमारे इर्द- गिर्द वीभत्स प्रभाव सिनेमा का , हम कैसे एक सुन्दर और खुशहाल सह- अस्तित्व के साथ- साथ सांस्कारिक समाज की परिकल्पना कर पायेंगे?
सारी बातें बहुत देर तक जेहन में उमड़ती रही और अचानक दस्तक देने लगी मन - मस्तिष्क में एक ऐसी कविता जो मैंने उस समय लिखी थी जब मेरा बेटा गोलू अबोध था . खलनायक फिल्म के उस गाने की बड़ी धूम थी उन दिनों " चोली के पीछे क्या है ? " उसी प्रकार जैसे आज धूम है "बीडी जलैले " कीप्रस्तुत है " चोली के पीछे का सच "" चोली के पीछे क्या है माँ ?"बोल पड़ा गोलू अचानक लौटते- लौटते पाठशाला सेझेंप गयी माँ एकवारगी / देखती रही देर तकटकटकी लगाए, अपने अबोध बेटे का चेहरा और सोचती रही कि क्या कक्षा में हुए सिनेमाई वार्तालाप का असर है यह कटु प्रश्न?बोली" पगले नही जानते इतना भी कि-चोली के पीछे है दूध की वह धार, जिसमें डूब-डूबकर नहाए हो तुम,पले-बढ़े हो/ हुआ है तुम्हारे मस्तिस्क का विकासमिली है शक्ति तुम्हे और मुझे वात्सल्य सुखतुम्हे नहलाकार, यक़ीनन......!"कहते हैं सब कि चोली के पीछे दिल है, यह दिल क्या है माँ ?"बिल्कुल सहज हुई वह ,और देने लगी बारी- बारी से बेटे के प्रश्नों के उत्तर-" बेटा! दिल होता है प्रत्येक प्राणी के भीतर ,जो धड़कता है क्षण- प्रतिक्षण / जीवित रहने तक.....!"संतुष्ट न होते हुए उसने पुन: उछाल दिया एक प्रश्न कि -" माँ ! आख़िर क्या है सच, जो कहते हैं वो या -जो कहती हो तुम ?"जानती है माँ, कि -नही समझा पाएगी अपने अबोध गोलू को वहऐसे समय में जब फैला हो वीभत्स प्रभावसिनेमा का हमारे इर्द - गिर्द !कैसे बताए खुलकर कि चोली के पीछे हैममतामयी आँखों का रक्तिंम संसारऔर एक ऐसा कवच, जो छूपा लेता उसे -किसी अदृश्य की आहट पाकर यकायक !निहारते हुए एकटक , देख रही थी बेटे की चपलता और सोच रही थी , कि कैसे सुलझाए वहइन निरर्थक प्रश्नों की गुत्थीकि कैसे बताए चोली के पीछे का सच ?अचानक कुछ गुनती हुईभींच ! आलिंगन में , अपने अबोध बेटे को -" बेटा ! यही है , चोली के पीछे का सच........!"मन ही मन कहा उसने !उपरोक्त कविता प्रशंगवश यहाँ उधरित की गयी है, उल्लेखनीए है कि उपरोक्त कविता कथ्य रूप प्रकाशन इलाहवाद द्वाराप्रकाशित मेरी काव्य पुस्तिका से ली गयी है, ताकि इस वहस को मूर्तरूप दिया जा सके !

6 comments:

  1. यही तो विडंबना है कि इस तरह के गीत क्या असर डाल रहे हैं.

    आपकी कविता पसंद आई.

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  2. बहुत सटीक लिखा है...आज जो गीत लिखा जा रहा है...उस का असर बच्चों व समाज पर क्या पड़ता है...इस पर कोई ध्यान नही दे रहा।

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  3. गीत लिखने-गाने वाले केवल उद्दीपन जानते हैं। नहीं सोचते कि उनके भी बच्चे होंगे!

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  4. यह एक जायज़ चिंता है हम सबकी. आपने इस विषय पर अपनी लेखनी का प्रयोग कर एक अच्छा काम किया है. लेकिन जिनके हाथों मी इन सबकी कमान है वोही कुछ नहीं सोचतें है.

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  5. वैसे मुझे ये तो समझ मे आता है कि जिगर मा बडी आग है पर उससे बीडी कैसे जलाई जा सकती है ये मुझे आज तक समझ नही आया है

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