श्री पांडे आशुतोष और डा निज़ाम सिद्दीकी के साथ
मैं चाय की चुस्कियों के बीच
वसंतोत्सव में आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं हिन्दी और भोजपुरी के मूर्धन्य कवि पांडे आशुतोष  और अज़हर हाशमी  की एक ग़ज़ल . इस ग़ज़ल में वसंत की भी चर्चा है और आज के परिवेश की भी . पांडे आशुतोष जी मेरे सृजन के प्रारंभिक दौर में मेरे काफी करीब रहें हैं . पहली बार उनसे मेरी मुलाक़ात १९९१ में केशरिया महोत्सव में आयोजित कवि सम्मलेन के दौरान हुयी थी. मंच पर काफी करीब बैठे हुए हम दोनों का पहली बार परिचय हुआ और विचारों के आदान-प्रदान के साथ आत्मीयता बढ़ती चली गयी . उम्र का एक लंबा फासला होने के बावजूद उनका मित्रवत स्नेह मुझे उनसे पूरी भावनाओं के साथ आवद्ध कर गया .आज पांडे आशुतोष जी हमारे बीच नहीं है , किन्तु उनकी रचनाएँ हमें हमेशा उनकी उपस्थिति का एहसास कराती रहती है . आज मैं उनकी वह ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जो उन्होंने मेरे साथ वाल्मीकिनगर की यात्रा के क्रम में कही थी .


आना हो तो जल्दी दिन रहते आ जाना !
यहाँ फिरौती वालों में शामिल अपना थाना !!


कितनी मेरी इज्जत करते हैं वस्ती वाले-
टंगा नहीं सम्मान-पात्र सुन-सुन करके ताना !!


सूखे नल पर बैठा कौवा ख्वाब देखता है-
शायद आज बना होगा मेरे घर में खाना !!


सम्मलेन का मिला निमंत्रण, इसीलिये कहता-
जब भी लौटो भाव बाजरे का पूछे आना !!


जले हुए गावों को मंत्री जी क्या देखेंगे-
पहुँच गए जल का विवाद सुलझाने हरियाणा !!


सारंगी पर गीत सुनाकर देते हैं फेरी-
हम बैरागी मौसम के पहने गेरुआ बाना !!


दरवाजे पर कुवां, शिवालय, पेंड बेल का है-
कैसे-कैसे स्वप्न पालते थे मेरे नाना !!


आग पेट की मुझको बन्दर नाच नचाती है-
ताली सुनकर उसी शेर को पड़ता दुहराना !!
() पांडे आशुतोष

अमीर खुसरो ने अपने संत गुरु ख्वाजा निजामुद्दीन को वसंत महोत्सव के बारे में बताया कि किस तरह मंदिरों में एक मौसम पूजा जाता है। ख्वाजा निजामुद्दीन ने तय किया कि इस्लाम मानने वाले भी वसंत उत्सव को मनाएं, क्योंकि मौसम का कोई मजहब नहीं होता। वह तो अपने फूलों, फलों, रंगों और खुशबू की जुबान में मोहब्बत का पैगाम देता है।अजहर हाशमी कहते हैं कि "मन में न हो खटास तो समझो वसंत है"प्रस्तुत है इस अवसर पर उनकी एक प्यारी सी ग़ज़ल -

रिश्तों में हो मिठास तो समझो वसंत है
मन में न हो खटास तो समझो वसंत है।


आँतों में किसी के भी न हो भूख से ऐंठन
रोटी हो सबके पास तो समझो वसंत है।


दहशत से रहीं मौन जो किलकारियाँ उनके
होंठों पे हो सुहास तो समझो वसंत है।


खुशहाली न सीमित रहे कुछ खास घरों तक
जन-जन का हो विकास तो समझो वसंत है।


सब पेड़-पौधे अस्ल में वन का लिबास हैं
छीनों न ये लिबास तो समझो वसंत है।
()अजहर हाशमी
जारी है वसंतोत्सव , मिलते हैं एक छोटे से विराम के बाद ...!

6 comments:

  1. दोनों गज़लें उत्कृष्ट ही नहीं सर्वोत्कृष्ट है !

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  2. श्री पाँडे आशुतोश और ांजहर हाशमी जी से मुलाकात अच्छी लगी । आज किसी ब्लाग पर हाशमी जी का वेडिओ भी देखा है।दोनो की लाजवाब गज़लों का आनन्द भी लिया बहुत बहुत बहुत धन्यवाद। आपके प्रयास से ैऐसी विभूतियों का परिचय और रचनायें पढने को मिलती हैं ये एक सार्थक प्रयास है। शुभकामनायें

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  3. पांडे आशुतोष और अज़हर हाशमी की ग़ज़ल अच्छी लगी, आभार !

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  4. वसंतोत्सव में एक से बढ़कर उल्लेखनीय प्रविष्टियाँ पढ़ा रहे हैं आप !
    मौजूं लगी ये पंक्तियाँ -
    "सब पेड़-पौधे अस्ल में वन का लिबास हैं
    छीनों न ये लिबास तो समझो वसंत है।"
    आभार ।

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