पुन: आपका स्वागत है
परिकल्पना पर

अभी पिछले चरण में रश्मि रविजा जी ने
बड़े ही सार्थक और नपे-तुले शब्दों में
मॉल संस्कृति के बिभिन्न पहलूओं पर
डाला .......

परिचर्चा के बाद
आईये निखिल आनंद गिरि की एक कविता पर नज़र डालते है जो मॉल संस्कृति पर केन्द्रित है -


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मॉल है या कि अजायबघर है..

शहर से दूर जहां कोई कॉलोनी भी नहीं..
सिवाय दौड़ती कारों के रौशनी भी नहीं..
सुना है एक नया मॉल बन गया है वहां,
सुना है लोग वहां पांव से नहीं जाते,
रोज़ परफ़्यूम छिड़ककर किसी अजीज़ के साथ,
लोग पहुंचते हैं उस बियाबां में....
एक से एक अजूबे हैं वहां,
मॉल है या कि अजायबघर है..
आदमीनुमा एक रोबोट-सा शख्स,
हर किसी को सलाम करता है,
एक सीढ़ी है जो कि ख़ुद-ब-ख़ुद,
पांव धरते ही चला करती है....
लोग आपस में बात करते हैं,
हंस के,लेकिन इसी खयाल के साथ,
आ न जाये लबों पे उनके कहीं,
घर-गली की कोई देसी बोली...
और सुना है कि उसी जन्नत में,
मूवी टिकटें भी मिला करती हैं...
नीम अंधेरे में या इंटरवल में,
लोग चबाते हैं मकई के दाने..
तीन घंटे की सख़्त मोहलत में,
अंधेरे होते हैं रौशन दम तक..
हॉल की आखिरी "रो" में दो दिल,
एक पॉपकॉर्न की गवाही में,
उरूजे-इश्क तक पहुंचते हैं...
शहर से दूर उस बियाबां में,
जो लोग पांव से नहीं चलते,
उड़ के आते है इस दुकान तलक,
और लुटाते हां दम तलक मोती,
चार पल के सुकून की खातिर...
सुना है जिस जगह है मॉल खड़ा,
वहां शमशान हुआ करता था,
सोचता हूं कि कुछ नहीं बदला,
एक शमशान की छत के ऊपर,
अब भी कई किस्से दफ़न होते हैं,
कभी तो मूवी के बहाने से,
मकई के चंद महंगे दाने से.....



निखिल आनंद गिरि
http://bura-bhala.blogspot.com/





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आईये अब  मैं आपको शमा जी के बचपन से  जुड़े उनके एक संस्मरण
की ओर आपको ले चल रही हूँ -
 
 
 
यह मेरे बचपन का घर...इन्हीं सीढ़ियों से जुडा एक संस्मरण लिखने जा रही हूँ..जो कभी भूली ही नही..जो आज भी मेरा दिल ग्लानी से भर देता है..
 
यह मकान हमारे खेत पे बना हुआ है..जहाँ मेरा बचपन बीता..बात उस वक़्त की, जब मेरी उम्र कुछ चार साल की रही होगी..शायद यह हैरत की बात लगे,कि,इतने बचपन की ऐसी स्पष्ट स्मृती कैसे किसी को हो सकती है..असलियत यह है,कि, मुझे चंद बातेँ तब की भी याद हैं,जब मै केवल तीन सालकी थी..या उससे भी कम..खैर !

हमारे घर के करीब,मेरे दादा ने खेत पर काम करने वाले मज़दूरों के लिए मकान बनवा रखे थे. उन्हीँ के बच्चों के साथ खेल कूद के मेरा बचपन बीता. हमारी टोली में चार पांच साल की उम्र से लेके ग्यारह बारह साल तक के लड़के लडकियाँ शामिल थी. उन्हीँ में एक लड़का था, जो मुझ से चार या पांच साल बड़ा था..पता नही,अन्य बच्चे उसके साथ हिक़ारत का बर्ताव क्यों करते थे? जब उसके बारे में सोचती हूँ,तो मुझे वो बतख और हँस वाली कहानी याद आ जाती है...हँस को बतख के बच्चे विद्रूप समझते थे..उसे पास नही आने देते थे..

इस बच्चे का नाम था रायभान. उसके अन्य भाई बहन भी हमारे संग ही खेला करते..उस शाम बच्चे इन्हीं सीढीयों पे जमा हो ,पता नही क्या खेल रहे थे..मुझे निचली सीढ़ी से ऊपर चढ़ना था..बीछ वाली सीढ़ी पे रायभान बैठा था..मैंने चढ़ते,चढ़ते उसे एक लात जमा दी...बेचारा,हटता,हटता हूँ,कहते हुए बाज़ू पे हट गया..बरामदे में खड़ी माँ ने यह देख लिया..सीढ़ी के पास आके उन्हों ने रायभान के अलावा बाकी बच्चों को अपने घर जाने के लिए कहती दिया..रायभान और मुझे कमरे में बुलाया..मेरी ओर सख्ती से निहारते हुए बोलीं:" तुम अपने कान पकड़ो और रायभान की माफ़ी मांगो...कहो मेरे पीछे..रायभान मैंने गलती की...मुझे माफ़ कर दो..मै फिर से ऐसा कभी नही करूँगी.."
इनकार का सवाल ही नही उठता था..मै ख़ूब समझ गयी..मेरी भूल भी मेरी समझ में आ गयी..जैसा माँ ने कहा,मैंने किया..बेचारा रायभान बेहद शरमा गया...' अम्माजी जाने दो..रहने दो", कहने लगा..माँ ने उसके गाल थपथपाए और मुझ से मुखातिब होके बोलीं: " कान पकडे रहो और दस बार रायभान के आगे उठक बैठक करो.."

मै उठक बैठक करने लगी तो बेचारा फिर बहुत सकुचाया..माँ ने अब उसे भी अपने घर भेज दिया...
मुझे अपने पास लेते हुए बोलीं:" तुम्हें उसे लात मारके अच्छा लगा? क्या तुमने सिर्फ इसलिए ऐसा बर्ताव किया, क्यों की दुसरे बच्चे भी उसके साथ ऐसा बर्ताव करते हैं? " मैंने हाँ में गर्दन हिला दी..

वो आगे बोलीं:" हमेशा याद रखना...हम जो भी करते हैं, खुदा देखता है..जो भी बोलते हैं,वो सुनता है..सब बच्चे उसी ने बनाये हैं..कोई बड़ा छोटा नही..तुम आइन्दा किसी के भी साथ ऐसा बेहूदा बर्ताव नही करोगी,जैसा के अब किया..आज तुम्हें खाना नही मिलेगा...तब तुम्हें अपनी गलती हमेशा याद रहेगी.."
मैंने कोई प्रतिकार नही किया..उन्हों ने मेरे मूह हाथ धो,कपडे बदल सुला दिया..

सुबह जब मै उठी तो मैंने मेरी माँ और पिता को घर से नदारत पाया..मेरी आह्ट सुन मेरी दादीमाँ मेरे पास आयीं और बोली:" आओ, आज मै तुम्हें तैयार कर देती हूँ..पहले दाँत साफ़ कर लो..चलो गुसलखाने में.."
मै:" अम्मा बाबा कहाँ गए हैं?"
दादी:" वो दोनों किसी काम से बाहर गए हैं.."
मै:" कौनसे काम से? कहाँ गए हैं"
दादी:" पहले मै तुम्हारा नाश्ता लगाती हूँ..फिर बता दूँगी.."
मै:" आप क्यों नाश्ता लगा रही हो? वनु मासी क्यों नही लगाएगी?" वनु मासी रायभान की माँ थी,जो हमारे घर रसोई बनाती थी.
दादी:" आज वनु मासी नही आयी है...उसकी तबियत ठीक नही है.." मुझे पता नही क्यों ऐसे लगा,जैसे दादीमाँ को रोना आ रहा है..पर मैंने उन्हें कभी रोते देखा नही था..
दिन में किसी वक़्त अम्मा बाबा आ गए...पर दोनों फिर से चले गए....शाम हुई तो मैंने दादीमाँ से कहा:" दादीमाँ ! आज मेरे साथ खेलने क्यों कोई नही आया..? आप बच्चों को बुला दो ना!"

दादीमाँ:" नही..आज नही...आज मै तुम्हारे साथ बैठ,तुम्हें कहानियाँ सुनाती हूँ.."
शाम ढल गयी...रात खाना खिला के दादीमाँ ने मुझे सुला दिया..

दूसरे दिन फिर वही..माँ घर से जा चुकी थीं..वनु मासी नही आयी थी..शाम होते,होते,मैंने फिर बस्ती के बच्चों को बुलाने की ज़िद पकड़ी..दादीमाँ से कहा:" मै जाऊं बस्ती पे? "
दादीमाँ ने फिर टोक दिया..वो रात भी बीत गयी...

दूसरे रोज़ भी अम्मा पूरा दिन घर पे नही थीं..शाम को लौटी और तुरंत बस्ती पे चली गईं..मुझे वहाँ से रोने धोने की आवाज़ सुनायी दी..बस्ती पर के मर्द औरतों को मारते पीटते थे यह मुझे पता था..लेकिन जब अम्मा वहाँ जाती तब तो रुक जाते थे..आज क्यों औरतें रोये चली जा रही हैं? आज क्या वहाँ के मर्द उनकी बात नही सुन रहे?

मैंने दादीमाँ से कहा:" दादीमाँ ! सिर्फ रायभान को बुला दो ना ! वह जो गाना गाता है न..डम डम डिगा डिगा..मुझे वो गाना सुनना है..!"

अब तो दादीमाँ होंट भी काँप रहे थे...उनके गालों परसे आँसूं झर रहे थे..

वो बोलीं:" अब रायभान यहाँ कभी नही आएगा.."
मै:" क्यों? मैंने उसे लात मारी इसलिए? मैंने तो माफ़ी माँगी थी....फिर भी नही आयेगा?"मै भी अब रुआंसी हो रही थी..
दादीमाँ:" बेटा..परसों रायभान और उसकी बहन छबु, उनके घर चूल्हे पे रखे, खौलते पानी से जल गए थे..छबु ठीक हो रही है...रायभान खुदा के घर चला गया...!"

मुझे इतना पता था,कि, खुदा के घर गए हुए लोग फिर से नही आते.....मुझे याद है..सुनतेही पहले तो मेरा जी मिचलाने लगा..और फिर मैंने ज़ोर से रोना शुरू कर दिया...दादा जी दौड़ के मेरे पास आ गए...दादीमाँ ने रोते,रोते मुझे गले से लगाया...

अपनी अम्मा की शुक्र गुज़ार हूँ कि उन्हों ने मुझ से रायभान की माफ़ी मंगवाई...माफ़ी के बावजूद मेरा दिल इस क़दर ग्लानी से भर आता है..गर न मांगती तो..? किसी और को माफ़ करने से ज़्यादा खुद को माफ़ कर पाना मुश्किल होता है शायद!


शमा
aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com/

परिचय:
गृह सज्जा, बगीचे, परिधान, और अन्य कुछ चीज़ों की डिज़ायनिंग करती हूँ..पाक कला के वर्ग लिया करती थी..पति  सरकारी मुलाजिम रहे,इसलिए तब्दों वाली, बंजारों की-सी ज़िंदगी रही हमारी..जिस जगह जो काम मिला,वही करती रही..हिदी,मराठी तथा अंग्रेज़ी में थोडा बहुत लेखन करती हूँ..चंद किताबें प्रकाशित हैं...और तो कुछ नही..एक अदना-सी इंसान हूँ!
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आज का कार्यक्रम संपन्नता की ओर अग्रसर है .......कार्यक्रम को संपन्न किया जाए उससे पहले मैं आपको ले चल रही हूँ मुम्बई के श्री बसंत आर्य के पास जो सुप्रसिद्ध गीत-गज़लकार और काव्य गोष्ठियों के चर्चित संचालक श्री देवमणि पाण्डेय जी से ब्लोगोत्सव हेतु सीधी बात करने जा रहे हैं .....यहाँ किलिक करें
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और अब कार्यक्रम के आखिर में पढ़िए और सुनिए श्री राजेन्द्र स्वर्णकार के द्वारा रचित और स्वरबद्ध रचना : मन है बहुत उदास रे जोगी ..........यहाँ किलिक करें
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इसी के साथ आज के कार्यक्रम के समापन की घोषणा करती हूँ ,

 रश्मि प्रभा को अनुमति दीजिये .......कल ब्लोगोत्सव में अवकाश है , इसलिए परसों यानी दिनांक २६.०५.२०१० को हम सब पुन: इकत्रित होंगे प्रात: ११ बजे इसी परिकल्पना पर .....
............तबतक के लिए शुभ विदा !

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5 comments:

  1. कमाल की अभिव्यक्ति दी है निखिल भाई ने.. और शमा(क्षमा) जी का संस्मार्तन पढ़ कर भी अच्छा लगा.. बधाई.. और आपका आभार मम्मी जी

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  2. भावपूर्ण और सार्थक सन्दर्भों से युक्त प्रस्तुति।

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  3. मैं तो गलती से इस ब्लॉग पर पहुंच गया...शुक्रिया मेर कविता यहां डालने के लिए....

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  4. मैं तो गलती से इस ब्लॉग पर पहुंच गया...शुक्रिया मेर कविता यहां डालने के लिए....

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