पहले दिन उत्सव गीत के अंतर्गत डा. रूप चन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा-
"कल्पना का सूर्य मन पर छा गया है। अलख हमको भी जगाना आ गया है।।
मातृभाषा की सजा कर अल्पना, रंग भरने को चली परिकल्पना,
भारती के गान गाना आ गया है। अलख हमको भी जगाना आ गया है।।"

दूसरे दिन आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने उत्सव गीत के अंतर्गत कहा-
"परिकल्पना साकार हो, परिकल्पना साकार हो...अवध में स्वागत पधारें......गगन से तारे निहारें.....गोमती-सरयू की लहरें--पुलक आशिष दें-गुहारें.....राम-सिय का धाम-अंतरजाल का आगार हो....परिकल्पना साकार हो,परिकल्पना साकार हो...!"

तीसरे दिन ब्लॉग :मेरा भारत महान की माला ने उत्सव गीत के अंतर्गत कहा-
"हम हैं ब्लोगर हिंदी के, आगाज करने आए हैं ! चिट्ठाकारी में नया इतिहास रचने आए हैं !!
सुर, तुलसी और मीरा है यहाँ के कुंजों में, अक्षय है भण्डार यहाँ वाणी का सूफी संतों में,
कवि जायसी,मल्लिक खुसरो,भक्त कवि रसखान सा -हम भी लेखन से सृजन में सांस भरने आए हैं .
हम हैं ब्लोगर हिंदी के, आगाज करने आए हैं ! चिट्ठाकारी में नया इतिहास रचने आए हैं !!"

इसके बाद-
 उत्सवी स्वर के अंतर्गत रश्मि प्रभा ने कहा -
" प्रकृति के सुकुमार कवि की परिकल्पनाओं की धरती पर / हुआ है नीड़ का निर्माण फिर / बच्चन की मधुशाला के शाश्वत अर्थ को /मिला है एक सम्पूर्ण आधार / खोल आकाशीय द्वार / महादेवी की तरह कहा है सबसे / 'जो तुम आ जाते एक बार ' / लोगों की हर आहट पर / बावरा मन देखता है एक सपना / पृष्ठ दर पृष्ठ / अमिट यादों का सैलाब /
इससे अपूर्व समुद्र मंथन और क्या होगा ! कलयुग के चक्र को भी-शब्दों, विचारों , भावनाओं ने घुमा दिया है /
सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग / ठगे से इसका कर रहे हैं अवलोकन / इन्द्रधनुषी छटा बिखरी है सर्वत्र...रचनाकार , गीतकार, संचालक , अतिथि /सब है एकाकार !......नीलम प्रभा के लिखे गीत के ये बोल जीवंत हो उठे हैं
'सब ऋषि मुनि आशीष दे रहे....हनुमंता चंवर डोलावत हैं'
सुप्त अवस्था में पड़ी सरस्वती की वीणा / झंकृत हो उठी है / आडम्बरों से दूर इस अलौकिक उद्यान में /
देवता भी आशीर्वचन लिख रहे हैं / इस आयोजन के हर संचालक को / मुक्त विस्तार दे रहे हैं...अपनी भाषा, अपने देश की हर गरिमा /हर परिवेश को हमने पढ़ा और जाना है /' विश्व बंधुत्व' का शंखनाद किया है / हमारी कल्पना ,परिकल्पना का / है यह अविस्मरनीय उत्सव / चलो मिलकर गायें / नए स्वर नए विश्वास का आगाज़ लिए ..........'मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा ''

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आगे की कथा अगले चरण में , आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल जहां राजेश उत्साही उपस्थित हैं अपनी प्यारी सी कविता के साथ ....यहाँ किलिक करें 
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बने रहिये परिकल्पना के साथ ....मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद

2 comments:

  1. ....बेहतर प्रस्तुति , बधाईयाँ !

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  2. याद आ रहा है सब कुछ ! भर रहे हैं उत्सव के रंग ! आभार ।

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