जब कविता में
इन्द्रधनुषी रंग घुलने लगें,
एक स्पंदित चित्र उभरने लगे,
तो संशय न करना ---

जो व्यक्ति काव्य में,
जीवित है,
वो "इमरोज़" ही है---

जब चित्रों के मौन में,
शब्द गूँजने लगें,
प्रेम घोलने लगें,
आसक्ति से विद्रोह कर,
अनुरक्ति बोलने लगे,
समझो कि-----

चित्रों में रंग नहीं,
"अमृता" बसी है----





ज्योत्स्ना पाण्डेय
http://jyotsnapandey.blogspot.com/


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लोग आरती उतारते हैं
मैंने इक नज़्म उतारी है
आवाज़ थरथरा रही है
आँख भी कुछ भारी है
बस नज़्म उतारी है
अब तुम कहो पूजा के बाद
क्या प्रसाद होगा
तुम को हवन का
हर इक सलीका तो याद होगा ?
चरणामृत तुम्ही दो
पूजा भी तुम्हारी है
बस इक नज़्म उतारी है
लोग तो आरती उतारते हैं


अनिल 'मासूम शायर '
 
 
 
 
 
 
 
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इस  परिचर्चा को हम आगे बढ़ाएंगे एक अल्प विराम के बाद , किन्तु उससे पहले आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल जहां उपस्थित हैं सुश्री पारुल पुखराज अपनी तीन नज्मों के साथ .....यहाँ किलिक करें 
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद  

5 comments:

  1. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  2. इमरोज़ का प्यार और उस प्यार के भक्त हर प्यार करनेवाले

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  3. परिकल्पना के मंच पर इस परिचर्चा को प्रदर्शित करने के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.

    प्रकाशित रचनाओं में एक जगह एक त्रुटि प्रतीत हो रही है ,एक रचना जो कि ज्योत्सना पाण्डेय जी के चित्र के साथ प्रदर्शित है ,किन्तु शीर्षक श्री अनिल "मासूम " जी की कविता का प्रतीत होता है, यदि संभव हो और मेरा कथन ठीक लगे तो संशोधन करने की कृपा करें.
    सधन्यवाद .
    ndp1966@gmail.com

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  4. परिचर्चा में दो रचनाकार शामिल हैं , शीर्षक एक से संवंधित है , मेरे समझ से कोई त्रुटी नहीं है !

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  5. waah Indradhanushi rango se pyaar ka chintran aur nazmo se pyaar ki aarti.. bahut hi sundar anibhooti ...!

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