मेरे देश,
मोहनदास करमचंद गाँधी मेरा नाम है. कभी सत्य और अहिंसा का पर्याय मैं, अब सिर्फ असत्य और हिंसक लोगों की जुबान पर रहता हूँ, या फिर पार्क, चौराहे, मैदानों में बस प्रस्तर मूर्ति बनकर रहता हूँ----जिस पर सिर्फ गन्दगी-ही-गन्दगी रहती है ! आज के युवा (कर्मठ तथा मक्कारी से दूर रहनेवाले) या तो मुझे भूल चुके हैं या फिर मेरे नाम से चिढ़ते हैं.....क्योंकि सारे कपटी और व्यभिचारी मेरा नाम तथा मेरे नाम की टोपी पहनकर इन युवाओं को छलते हैं. उनके मन में नैराश्य या प्रतिहिंसा का भाव भरते हैं. रोज सुनता हूँ "गाँधी आज भी प्रासंगिक हैं"

........................ हाँ, सिर्फ उनके लिए जो मुंह में गाँधी और बगल में देश की बर्बादी लिए घुमते हैं.

मेरे नाम का मोहन अब सिर्फ दास बनकर रह गया है तथा सारे - अकरम (अकर्मण्य) अब गाँधी बन गए हैं . भला हो नाथूराम गोडसे का, वरना मैं न जाने कितनी मौतें मरता !

समय का चक्र चलता है, हर समय पलटता है........अब शायद कुछ सुगबुगाहट होने लगी है. असत्य के नीचे से सत्य की चिंगारी दिखने लगी है. मैं फिर सार्थक होने की तरफ चल पड़ा हूँ !

गाँधी





- नवीन कुमार

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विचारों के इस क्रम को मैं आगे बढ़ाऊंगा कार्यक्रम के अगले चरण में , आईये चलते हैं कार्यक्रम स्थल की ओर जहां रूप सिंह चंदेल उपस्थित हैं क्रान्ति दिवस पर अपने एक आलेख : आजादी की तीसरी लड़ाई को लेकर ......यहाँ किलिक करें
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जारी है उत्सव मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद .

5 comments:

  1. आनन्द आया .......

    हर बार की तरह इस बार भी अच्छा लगा

    धन्यवाद

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  2. गाँधी के दर्द को बखूबी लिखा है..

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  3. विचार सारगर्भीत है , आभार !

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  4. समय का चक्र चलता है, हर समय पलटता है........अब शायद कुछ सुगबुगाहट होने लगी है. असत्य के नीचे से सत्य की चिंगारी दिखने लगी है. मैं फिर सार्थक होने की तरफ चल पड़ा हूँ !

    Sach hai. samay badla hai, samay badlega. Sundar saargrabhit lekhan.

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