परिकल्पना की विशेष परिचर्चा के आठवें दिन आईये श्री विनोद कुमार पाण्डेय जी से पूछते हैं: क्या है उनके लिए आज़ादी के मायने ?



भारत देश को आज़ाद हुए ६३ साल हो गयेगत् ६३ सालों की समीक्षा करें तो हम पाएँगे की निश्चित रूप से हमने बहुत उन्नति कर ली,भले इन उन्नतियों का आकलन करना हमारे बस में ना होदरअसल विकास के साथ साथ भारतीय जनसंख्या वृद्धि और जनता के ज़रूरतों का निरंतर बढ़ाव हमें भारत विकास की असली सूरत दिखलाता है जो यह सोचने को मजबूर करती है कि भारत की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाने वाले राष्ट्रहितकरों ने भारत की जो तस्वीर सोची होगी क्या वह बन पायी?

वास्तविकता तो यह है कि आज भी भारत की आधी जनता को आज़ादी के सही मायने का पता ही नही और दुख तो तब होता है जब भारतीय नागरिक की अग्रिम जमात में बैठे लोग भी भारतमाता की उम्मीदों पर खरे नही उतरतें ।

आज का हमारा देश दो नये वर्ग समुदाय अमीर और ग़रीब में बँटता चला जा रहा है,आज़ादी के नाम पर बस महानगरों की दूषित हवा रह गई है और हम अँग्रेज़ों को देश से बाहर खदेड़ देने को ही अपनी आज़ादी समझते है यह भारत की बहुत बड़ी विडंबना हैभारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने में हमारे देश के महापुरुष ने जी-जान लगा दी थीहमारी आज़ादी उनके लाशों से गुज़री है और अब यह प्रश्न बन गये है कि आज़ाद भारत के नागरिक उनके बलिदान को कितना सार्थक सिद्ध कर रहे हैं ।

१५ अगस्त के दिन अपने घर,गली,चौराहों पर तिरंगे को हाथ में लेकर स्वतंत्र होने का ढोल पीटना या फिर सामुदायिक स्थलों पर लच्छेदार भाषण देकर खुद को भारत का एक विशेष शुभचिंतक सिद्ध करवाना ही भारत के आज़ाद होने की पहचान नही हैं ।

बल्कि हमें उन-उन पहलुओं पर भी गौर करना होगा जो भारत के एक विशेष वर्ग की ज़रूरत है,आज़ादी से उपर भी बहुत सी बातें है जो आज़ादी से इतने जुड़े हुए है कि उनके बिना स्वतंत्र भारत की परिकल्पना ही अधूरी है

यह आज़ाद भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा जहाँ दिन-दिन बढ़ रहे करोड़पतियों के देश में एक तिहाई जनता पेट भरने के लिए जूझ रही है या यूँ कहें दासता की जीवन गुज़ार रही हैउनके लिए खाने की आज़ादी तो है पर खाने के नाम पर कुछ नही,पीने की आज़ादी के नाम पर बस दूषित जल,रहने की आज़ादी के नाम पर भगवान की रहमत से टिका घास-फूंस और छप्परो का बना मकान रोटी के लिए जिनके बच्चे बड़े मालिकों के लात-जूते खा रहे हैं ज़रा उनके नज़र से देखें तो हमारे समझ में आए कि हाँ वास्तव में हम कितने हद तक स्वाधीन हैं ।

हम सब भारतीय है स्वालंबित राष्ट्र की बात करें तो गर्व होता है की इतनी बड़ी लोकतंत्र अपने सामाजिक,आर्थिक,और सांस्कृतिक विकास की डंका पूरे विश्व में पीट रही है पर जैसे ही अपने देश के आंतरिक संरचना की बात करें तो शर्म से सर झुक जाता है अखंड राष्ट्र के नाम पर जहाँ एक तरफ हम वाहवाही लूट रहे हैं वहीं दूसरी ओर राज्य,भाषा,धर्म,जाति के नाम पर राजनीति की गंदी खेल रहें है सुभाष,गाँधी और नेहरू का अखंड भारत आज राजनीति का खिलौना बना जा रहा है और हम उसके टुकड़े टुकड़े के लिए लड़ रहें है राष्ट्रभाषा हिन्दी को जहाँ सिर्फ़ कागजों पर ही राष्ट्रभाषा होने की मान्यता मिली हो और अपने ही देश के कुछ नागरिक देश को भाषागत विभाजन देने पर तुले हो तो स्वतंत्रता का क्या पैमाना हो?

दिन-दिन बढ़ती जा रही मँहगाई ग़रीबों के सारे सुख चैन छीन लेती है और सरकार साथ पर हाथ धरे बैठे हैं,कोई किसी की बात सुनने को तैयार नही और लोग कहते है की अपनी बात रखने की आज़ादी है.

यह भी एक विडंबना की बात है १५ अगस्त जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ आज ऐसा दिन बन गया है जिस दिन भारत का नागरिक खुद को सबसे ज़्यादा असुरक्षित महसूस करता है,भारत की एक चौथाई जनता घर से बाहर निकलना मुनासिब नही समझती क्या, कब, कहाँ बम फूट जाएआज़ादी के बदले हमें बटवारें कि एक ऐसी त्रासदी मिली जो आज भी भारत के लिए नासूर बना पड़ा है ।


भारत की आज़ादी देखने और परखने के लिए हमें भावना रूपी चश्मा उतार फेंकना होगा क्योंकि सच्चाई इतनी कड़वी है की हम भावनाओं की आड़ में बचने का प्रयास करते है और आज के स्वतंत्र भारत के असलियत से रूबरू होना हमें रास नही आता ।

सच्ची आज़ादी को समझने के लिए हमें आम आदमी की तरह सोचना होगा और एक तुलनात्मक अध्ययन भी ज़रूरी है,जी. डी. पी. रेट का बढ़ जाना ही विकास की निशानी नही हैं,एक आम आदमी अपने ही देश में कितना सुरक्षित है इसे समझना भी आवश्यक है,क्या स्वावलंबित देश का हर नागरिक स्वावलंबित है? उसकी आम ज़रूरत पूरी हो पा रही है? ऐसे कुछ प्रश्न है जिनके सटीक उत्तर ही आज़ादी की यथार्थता को व्यक्त कर सकते हैं. अन्यथा जिस देश के जंगलों में जानवर तक स्वतंत्र नही घूम सकते उस देश में गाँधी जी के रामराज्य की कल्पना करना ही बेमानी होगा ।
विनोद कुमार पांडेय
(हिंदी के प्रमुख चिट्ठाकार )
http://voice-vinod.blogspot.com/
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जारी है परिचर्चा, मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद........

4 comments:

  1. यह आज़ाद भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा जहाँ दिन-दिन बढ़ रहे करोड़पतियों के देश में एक तिहाई जनता पेट भरने के लिए जूझ रही है या यूँ कहें दासता की जीवन गुज़ार रही हैउनके लिए खाने की आज़ादी तो है पर खाने के नाम पर कुछ नही,पीने की आज़ादी के नाम पर बस दूषित जल,रहने की आज़ादी के नाम पर भगवान की रहमत से टिका घास-फूंस और छप्परो का बना मकान रोटी के लिए जिनके बच्चे बड़े मालिकों के लात-जूते खा रहे हैं ज़रा उनके नज़र से देखें तो हमारे समझ में आए कि हाँ वास्तव में हम कितने हद तक स्वाधीन हैं ।




    बहुत ही सुन्दर ! प्रभावी रचना !

    माओवादी ममता पर तीखा बखान ज़रूर पढ़ें:
    http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति

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