अभी तक आप सभी इस परिचर्चा (आपके लिए आज़ादी के क्या मायने है?) के अंतर्गत श्री समीर लाल जी, रश्मि प्रभा जी और दिगंबर नासवा जी के विचारों से रूबरू हुए हैं ! इसी क्रम में आईये अब वर्ष के श्रेष्ठ परिचर्चा लेखक दीपक मशाल से पूछते हैं कि उनके लिए क्या है आज़ादी के मायने ?

आजादी के मायने लोगों के साथ-साथ बदल जाते हैं, कभी धर्म के साथ-साथ तो कभी जाति के साथ, कभी अमीरी-गरीबी के तो कभी ज्ञान और अज्ञान के साथ-साथ भी. इस साथ-साथ के साथ-साथ बदलने के बावजूद आजादी का मौलिक रूप कभी नहीं बदलता, उसकी आत्मा कभी नहीं बदलती.. ये दीगर बात है कि उसका ढांचा बदल जाता है.
आज यदि वैचारिक, सैद्धांतिक और प्रायोगिक रूप से देखा जाए तो मेरे हिसाब से सच्ची आज़ादी तभी होगी जब हम औरों से ईमानदारी की उम्मीद लगाने के बजाए खुद ईमानदारी से अपने कर्म को करते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने देश, अपनी पृथ्वी पर प्राप्त होने वाले संसाधनों को बेहतरीन और अनुशासित ढंग से उपयोग कर सकें. हर व्यक्ति को उसके किये श्रम का उचित मूल्य मिले. ना सिर्फ मानसिक बल्कि शारीरिक श्रम का भी महत्व समझा जाए जैसा कि पश्चिमी देशों में होता है. देश/दुनिया के जिस भी खण्ड में हम पैदा हुए उसे विकसित करने में अपना यथासंभव योगदान दें. किसान को उसके श्रम की कीमत मिले और एक क्लर्क, डॉक्टर या प्रोफ़ेसर को उसके श्रम का. अमीर-गरीब में फर्क ना हो, पूंजीवाद को बढ़ावा ना मिले. अपनी आजादी और हित को लेकर हम इतना स्वकेंद्रित ना हो जाएँ कि हमें पता ही ना चले कि हमारे बगल में खड़े व्यक्ति के पैर पर हम अपना जूता रख के खड़े हैं.. कोई इतना मजबूर ना हो जाए कि बन्दूक उठा के डाकू या नक्सली बन जाए..
जिस राह पर हम चल पड़े हैं, हमारा देश चल पड़ा है वो हमें कभी एक विकसित राष्ट्र नहीं बना सकती क्योंकि ऐसी किसी मंजिल की तरफ ये रास्ता जाता ही नहीं है. क्या ये आजादी है कि हम जितना चाहें कमायें, जिस तरह चाहें कमायें? क्या आप मेरी इस बात से सहमत नहीं कि हमारे यहाँ मिलावट एक बुराई ना होके एक व्यापार बन चुका है? दुःख तो ये है कि व्यापारी इसे भी अपनी आजादी से जोड़ कर चलते हैं..
छोटे स्तर से ही लें तो आप सुनेंगे कि दूधवाले भाई कहते हैं ''पानी मिलाना उनकी मजबूरी है.. महंगाई बहुत है.'' लेकिन वो ये नहीं जानते कि दूध में पानी मिला जिसे वो अपनी आजादी समझ रहे हैं उससे औरों की आजादी के अधिकार का हनन हो रहा है.
खैर ये तो काफी छोटे स्तर का अपराध है, जरा सोचिये वो क्या करते होंगे जो बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज के मालिक बन बैठे हैं.. और बहाना बनाते हैं कि वो सिर्फ हिस्सेदार हैं मालिक नहीं... मालिक तो जनता है. पश्चिमी देशों को हम कितनी ही गालियाँ दे लें पर उनकी इस बात की मुक्त कंठ से सराहना करनी ही होगी कि उन्होंने कभी अमीर और गरीब के बीच की खाई को बढ़ने नहीं दिया उसे बराबर पाटते रहे.. किसी ना किसी तरीके से..
और सबसे बड़ा योगदान रहा श्रमविभाजन के साथ उसके मूल्य के उचित निर्धारण का.. यहाँ यू.के. में एक मजदूर भी काफी चैन का जीवन बिता सकता है, अरे टैक्स स्लैब ही इस तरह के बना रखे हैं कि अमीर बहुत जल्दी बहुत अमीर नहीं बन सकता और गरीब भूखों नहीं मर सकता. क्या ये सब हमारी आजादी की परिभाषा में शामिल नहीं, क्या अमन-चैन के साथ जीवनयापन करना आजादी का हिस्सा नहीं? क्या 'जियो और जीने दो' से बेह्तर कोई आजादी की परिभाषा बन पड़ती है?
आज छोटे कस्बों और गाँवों को अँधेरे में रख के दिन-रात्रि के क्रिकेट मैच खेले जा रहे हैं, हरे-भरे मैदानों को रौशनी से जगमगाया जा रहा है. क्या ये खेल दिन में नहीं हो सकते? क्यों एक गाँव को एक साल तक जगमगाने वाली बिजली सिर्फ एक मैच के लिए स्टेडियम को जगमगाने की खातिर एक दिन में लुटा दी जाती है?
बड़ी प्राइवेट कंपनियों को बिजली मुहैया कराइ जा रही है और देश के भविष्य घासलेट वाली लालटेन में पढ़ रहे हैं. जब सवाल किया जाता है कि ये भेदभाव क्यों? तो कमाल के जवाब आते हैं कि ''वो उसकी कीमत भी तो दे रहे हैं..'' क्या कीमत भाई? कैसी कीमत? आप प्राकृतिक संसाधनों की कीमत कैसे निश्चित कर सकते हैं जिनपर कि सबका बराबर का हक है. यदि पैसों का इतना ही गरूर है तो पैसों से खुद ही बिजली क्यों नहीं पैदा कर लेते? ये भी एक प्रकार से नागरिकों की आजादी में सेंध लगाना है.
इस तरह देखा जाए तो आजादी के कई मायने निकल आते हैं लेकिन सबसे बेहतर अर्थ वही है जो मैंने अभी ऊपर कहा कि 'जियो और जीने दो'.
जय हिन्द
दीपक 'मशाल'

(वर्ष-२०१० के श्रेष्ठ परिचर्चा लेखक )

http://swarnimpal.blogspot.com/

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जारी है परिचर्चा मिलते हैं पुन: क़ल ११ बजे परिकल्पना पर फिर एक नए चिट्ठाकार के विचारों के साथ ...तबतक शुभ विदा !

5 comments:

  1. परिचर्चा के आगाज़ अच्छे हों तो आयाम को बल मिलेगा

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  2. वो कहते हैं न कि हमें अपने हाथ फ़ैलाने की आजादी वहीँ खत्म हो जाती है जहाँ से किसी और का कंधा शुरू होता है ..
    बस इतना लोग समझ लें
    बढ़िया लेख.

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  3. विचारणीय बिन्दु उठाये गये हैं इस आलेख में।

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  4. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति

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