अभी ब्रेक के पहले हम खुशदीप सहगल जी के विचारों से रूबरू हो रहे थे, उनके तेवर कुछ ज्यादा ही कड़े दिखे ! अब मैं जिस चिट्ठाकार के विचारों से आपको रूबरू कराने जा रहा हूँ उनके भी विचार कमोवेश वैसे ही है ! नाम है अशोक मेहता-
भारत का ६३ वा स्वतंत्रता दिवस इस बार हम मना रहे हैं . आज के दिन भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिली थी. आज़ादी के इतने सालों बाद भी क्या हम इस आजादी से खुश हैं ? आज़ाद भारत में रहते हुए, आज़ाद भारत में सांस लेते हुए भी क्या आप खुद को आज़ाद महसूस करते हैं ? अगर हम गौर करें तो ये पायेंगे कि हमने अपने देश को तो अंग्रेजों से आज़ाद करवा लिया, मगर यहाँ के लोग और उनकी सोच को हम अंग्रेजीपन से आजाद नहीं करवा पाए. आज भी हम उसी अंग्रेजीपन के गुलाम हैं. अपने स्कूल, ऑफिस, या सोसाइटी में तिरंगा फेहरा के हम अगर ये समझते हैं कि हमने आज़ादी हासिल कर ली है तो ये गलत है.

देश के आज़ाद होने के बाद भी हम यहाँ कि प्रशासनिक प्रणाली और शिक्षा प्रणाली में उनके बनाये हुए नियमों को ही मानते आ रहे हैं. इस आज़ाद भारत कि हर चीज़ में आपको उस अंग्रेजीपन कि झलक दिखाई देगी. यहाँ के लोग, उनकी सोच, उनका रहन सहन सभी उस अंग्रेजीपन के गुलाम हैं. हमें क्यों विदेशी चीजों से इतना लगाव है ? हम विदेशी चीजों से इतने आकर्षित क्यों होते हैं. क्यों हमें हर विदेशी चीज़ कि कामना रहती है जैसे विदेशी कपडे, विदेशी ब्रांड, टीवी, विदेशी खान पान इत्यादि. हमारी नौजवान पीढी का तो सपना ही है विदेश जा कर बस जाना. फिर भले ही वहां जा कर कोई भी छोटे से छोटा काम क्यों न करना पड़े. वहां हमारी कोई इज्ज़त हो न हो. अब आज का ही उदहारण ले लीजिये. आज शाहरुख़ खान को अमेरिका में पकड़ कर काफी देर तक पूछ ताछ की गयी. कुछ दिनों पहले एक अमेरिकन एयरलाइन्स में सवार होने से पहले हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को जूते और मोजे उतरवा कर चेक किया गया. इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है ?? जब इन हस्तियों तक को इन अंग्रेजों ने नहीं बख्शा तो हम और आप कौन से खेत की मूली हैं. फिर भी विदेश जाने के सपने देखना लोग नहीं छोड़ते. विदेशी चकाचौंध में अंधे हुए लोग अपनी गुलामी को समझ नहीं पा रहे हैं. खुद को आजाद बता कर हम आज भी उस अंग्रेजी सभ्यता की गुलामी कर रहे हैं. इस सर्व व्यापक गुलामी का मुख्या कारण है हमारा मीडिया जो कि हर बात में उन अंग्रेजों कि नक़ल करता है. हम खुद को, अपने इतिहास को, अपने राष्ट्र को भुला कर हर चीज़ में उनकी नक़ल कर रहे हैं. हम एक ऐसी अंधी दौड़ में भागे जा रहे हैं जिसका कोई अंत नहीं है. यहाँ टीवी मैं दिखाए जाने वाले समाचार हों या फिर रियलिटी शोस सब के सब सिर्फ विदेशों की नक़ल हैं. आज आप समाचार देखें तो कुछ चैनल टी आर पि रतिंग्स बटोरने के लिए छोटी से छोटी खबर को सनसनीखेज़ बना के पेश करने की कोशिश करते हैं. फिर ये मायने नहीं रखता की उस छोटी सी खबर में कितने मसाले लगाये गए हैं, और ये खबर लोगों पर कैसा प्रभाव दाल रही है. मैं अपने दोस्त से मिलने उसके घर गया हुआ था. हम दोनों उसकी छत पर खड़े हो कर बातें कर रहे थे. वहां उसकी माँ घबराई हुई आई और कहने लगी तुम लोगों को पता है की ये दुनिया ख़तम होने वाली है. हमने पुछा, ये आपसे किसने कहा. वो कहने लगी की मैंने न्यूज़ चैनल में देखा है. वोह कह रहे थे सावधान हो जाओ, दुनिया नहीं बचेगी, पृथ्वी नहीं बचेगी, सारे लोग मारे जायेंगे, चारो तरफ हाहाकार मचेगा.हमने उनसे कहा की इन बातों पर ध्यान न दें. बड़ी मुश्किल से हम उन्हें समझा पाए की ये सब बेकार की बातें हैं.

बड़े शर्म की बात है, कि अपने चैनल की लोकप्रियता बढ़ने के लिए किसी भी बकवास खबर को सनसनी खेज और डरावना बना कर प्रर्दशित किया जाता है. ये समझने की कोशिश कभी नहीं की जाती की ये नकारात्मक खबरें लोगों के मन और मस्तिष्क पर क्या प्रभाव दाल रही हैं. हमारा मीडिया इतना नकारात्मक क्यों है, हमारा मीडिया भारत की शक्तीयों और उपलब्धियों को क्यों नहीं प्रर्दशित करता है. हमारा भारत एक महान देश है, हमारा देश सफलताओं और उपलब्धियों की कहानियों से भरा पड़ा है, फिर भी ऐसी खबरें जिनसे लोगों का आत्मविश्वास और मनोबल बढे, वो प्रर्दशित नहीं की जाती. हमारा देश दूध उत्पादन मैं पहले स्थान पर है, हमारा देश दूरसंवेदी उपग्रहों में पहले स्थान पर है. हम चावल और गेहूं के उत्पादन में पूरी दुनिया में दुसरे स्थान पर आते हैं. हमारा देश हजारों ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ डॉ. सुदर्शन जैसे लोगों ने अपने गांवों को स्वयं चालित एवं आत्मनिर्भर बना दिया है. ऐसे उपलब्धियों के लाखों उदहारण मौजूद हैं लेकिन हमारी मीडिया बुरी खबर, विफलताओं और आपदाओं को दिखाने में ही तत्पर है. भारत में हम भारतीय सिर्फ़ मृत्यु, बीमारी, आतंकवाद, अपराध के बारे में पढ़ते या सुनते हैं.

एक बार की बात है की हमास ने इस्राइल पर हमला किया था. वोह दिन इस्राइल के लिए बहुत ख़राब दिन था जब उस पर कई हमले और बम्बरियाँ हुईं, उस दिन इस्राइल में काफी मौतें हुईं, मगर वहां के समाचार पत्र के पहले पन्ने पर ऐसी कोई खबर नहीं थी. बजाये ऐसी नकारात्मक ख़बरों के उनके पहले पन्ने पर एक यहूदी सज्जन की तस्वीर के साथ उसकी प्रोत्साहित करने वाली कहानी थी. कहानी में यह वर्णन किया गया था, की उस महापुरुष ने किस तरह पाच वर्षों में एक रेगिस्तान एक आर्किड और एक अन्न भंडार में परिवर्तित कर दिया था. हत्याएं, बमबारी, मौतों का विवरण, अखबार के भीतरी पन्नो में दफन था. इस्राइल की इतनी बुरी हालत होने के बावजूद वहां की मीडिया लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए और उनमे आत्मविश्वास जगाने के लिए, ऐसी सकारात्मक ख़बरों को अपने पहले पन्ने पर छापता है. अगर हमारी मीडिया को नहल ही करनी है, तो वो कुछ इस तरह की नक़ल करे जिससे की यहाँ के लोगों का आत्मविश्वास बढे, और वो अंग्रजी सभ्यता की गुलामी छोड़ कर इस भारत को पूर्णतया आजाद भारत बनायें.
() अशोक मेहता

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परिचर्चा अभी जारी है, मिलते हैं कल सुबह ६ बजे पुन: परिकल्पना पर एक और कुछ और चिट्ठाकारों के विचारों के साथ, तबतक शुभ विदा !

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