नमस्कार!
सबसे पहले स्वतन्त्रता दिवस की अनंत मंगल कामनाएं आप सभी को !
जैसा कि आप सभी को विदित है कि
आज ही के दिन अपना यह मधुमय देश आज़ाद हुआ था, जिसका जश्न हम विगत छ: दशकों से मनाते आ रहे हैं, किन्तु प्रश्न यह उठाता है कि क्या हम सचमुच आज़ाद हैं ?
यानी हमारे लिए आज़ादी के क्या मायने है ?
इस विषय पर आज से हम एक परिचर्चा आयोजित कर रहे हैं जिसके अंतर्गत हिंदी के प्रमुख चिट्ठाकारो से हम पूछेंगे कि उनके लिए आज़ादी के क्या मायने है ?


परिकल्पना की विशेष परिचर्चा में
आपपका स्वागत है !

स्वतंत्रता यानी प्रतिष्ठा और समानता का दर्जा, आदर और पहचान का वातावरण, विकास और उपलब्धि की उंचाईयों में उन्मुक्तता का माहौल, न कोई कृत्रिम बाधा और न निरंकुशता का कोई अवरोध।
स्वतंत्रता प्रत्येक प्राणी की भावना, शक्ति एवं उत्साह को सदैव जागृत रखती है, जबकि परतंत्रता में सभी शक्तियां निर्बल एवं प्रभावहीन हो जाती है। स्वतंत्रता में व्यक्तित्व का विकास होता है, प्रतिभायें सही दिशा में अपना आकार लेने में समर्थ होती है, जबकि परतंत्रता में प्रतिभायें कुन्द पड़ जाती हैं। स्वतंत्रता वरदान है, परतंत्रता अभिशाप।
उत्थान अथवा अभ्युदय को स्थायी वास्तविकता का आवरण प्रदान करती है स्वतंत्रता, जबकि परतंत्रता में व्यक्ति जीवन के वास्तविक सुख से ही वंचित रह जाता है। परतंत्रता में मनुष्य की सहज शक्तियों का विकास अवरूद्ध हो जाता है, मनुष्य सुख का एहसास नही कर पाता और कदापि चिंता मुक्त भी नही।

स्वतंत्रता जहां सभी प्रकार की प्रगतियों, व्यवहारिक सुखों का आधार है, वहीं परतंत्रता अनायास ही सुखों के द्वार बंद कर देती है और विकास रोक देती है। स्वतंत्रता कल्पवृक्ष की वह छाया है, जिसके तले व्यक्ति शांति, सुख:, संतुष्टि व समृद्धि का अनुभव करता है, अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख रहता है और अपने कर्तव्यों के बल पर जीवन के स्वर्णिम क्षणों की अनुभूति करता है।
मनुष्य का स्वाभिमान उसकी स्वतंत्रता में है। कहा गया है कि स्वाभिमान खत्म हो जाने के बाद जीवन जीने का कोई अभिप्राय नही रह जाता। इसलिये यह जरूरी है कि हर व्यक्ति को यह स्वतंत्रता हो कि वह जैसा चाहे वैसा सोच सके। अपने व्यक्तिगत ढंग से अपनी खुशी का अनुसरण कर सके। जीवन के वास्तविक आनन्द का सुख अनुभव कर सके, किन्तु कहीं-कहीं स्वतंत्रता को अनुशासन का कवच प्रदान करना भी श्रेयष्कर होता है, ताकि स्वतंत्रता निरंकुशता में न परिवर्तित हो सके।

अतएव जहां तक मेरी व्यक्तिगत मान्यता है, कि कर्तव्यपथ पर स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलते हैं। पूर्ण स्वतंत्रता वांछनीय नही है। स्वतंत्रता और दायित्व में तालमेल होना चाहिये। स्वतंत्रता के मायने तब और ज्यादा प्रबल हो जाते हैं जब व्यक्ति सम्पूर्ण ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी और दुनियादारी का बोध करते हुये स्वतंत्रता का सही इस्तेमाल करता है। स्वतंत्रता के साथ-साथ जरूरी है अपने भीतर स्व-अनुशासन का भाव लाया जाये, ताकि सत्य के दायरे में सिमट कर उत्तरदायित्व का समग्र निर्वहन हो सके। स्वतंत्रता का क्षितिज व्यापक होना चाहिये और इसकी परिधि विस्तृत एवं उदार होनी चाहिये, तभी स्वतंत्रता का अभिप्राय सिद्ध होगा।

यही सब कुछ ऐसे विषय हैं जिसपर हम बातें करेंगे अगले चरण में उड़न तश्तरी यानी समीर लाल 'समीर' जी से एक अल्प विराम के बाद ...!

5 comments:

  1. अंग्रेजों से प्राप्त मुक्ति-पर्व ..मुबारक हो!

    समय हो तो एक नज़र यहाँ भी:

    आज शहीदों ने तुमको अहले वतन ललकारा : अज़ीमउल्लाह ख़ान जिन्होंने पहला झंडा गीत लिखा http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html

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  2. स्‍वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।

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  3. स्वतन्त्रता दिवस की मंगल कामनाएं

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  4. स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं.............

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  5. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति

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