ग़ज़ल

शीशमहल हैं शीशे के वो पत्थर के हैं द्वार ,
कैसे - कैसे लोग बसे हैं महानगर में यार

राधा द्वारे राह निहारे, फिर भी मोहन प्यारे-
चकला - चकला घूम रहे ढूंढ रहे हैं प्यार

हाट -हाट नीलाम चढ़ी प्रेमचंद की धनिया-
और उधर ' होरी ' करता है लमही में चित्कार

दूध युरिया, घी में चर्बी , सुर्खी वाली मिर्ची -
गली - मुहल्ले बेची जाती ढोल पीट ,सरकार

दूर - दूर तक कोई किनारा नही दिखाई देता-
बीच भंवर में खींचतान करते मांझी - पतवार

ताल-तलैया घायल पूजा-पोखर अस्त व व्यस्त ,
जब से बन्दा महानगर का आया गाँव - जबार

अस्त हुआ '' प्रभात'' उदय होने से पहले हीं ,
ख़ौफ़जदा हैं लोग हिचकते जाने से बाज़ार

() रवीन्द्र प्रभात

22 comments:

  1. सटीक बात ..आज हर चीज़ में मिलावट है ..कहाँ तक कोई बचेगा

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  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/



    आपका ब्लॉग देर से खुलता है ..

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  3. यह ग़ज़ल सच का आईना है, हम हर रोज हर क्षेत्र में हो रही मिलावट से त्रस्त हैं, बधाईयाँ !

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  4. यह ग़ज़ल सच का आईना है, हम हर रोज हर क्षेत्र में हो रही मिलावट से त्रस्त हैं, बधाईयाँ !

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  5. सचमुच शानदार है यह ग़ज़ल ....एक-एक शेर आकर्षित कराती हुयी !

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  6. वाह ! शानदार गज़ल ... बढ़िया कटाक्ष के साथ ... बधाई

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  7. हमेशा की तरह बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द लिये हुये बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  8. आशावादी होने का कितना भी यत्न करें ...कुछ सच मुंह चिढाते ही हैं ...!

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  9. राधा द्वारे राह निहारे, फिर भी मोहन प्यारे-
    चकला - चकला घूम रहे ढूंढ रहे हैं प्यार......

    बहुत ही सशक्त समसामयिक प्रतुस्ती.....

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  10. अस्त हुआ '' प्रभात'' उदय होने से पहले हीं ,
    ख़ौफ़जदा हैं लोग हिचकते जाने से बाज़ार

    वाह!! .... बहुत खूब
    सुंदर रचना .. बधाई स्वीकारें

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  11. दूध युरिया, घी में चर्बी , सुर्खी वाली मिर्ची -
    गली - मुहल्ले बेची जाती ढोल पीट ,सरकार
    यथार्थ ..
    सुन्दर गज़ल

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  12. सुंदर रचना सशक्त समसामयिक प्रतुस्ती.....

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  13. सच का आईना दिखाती प्रभावी गज़ल...हर शेर कुछ खास कहता है ...

    शुभकामनाएं...

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  14. दूध युरिया, घी में चर्बी , सुर्खी वाली मिर्ची -
    गली - मुहल्ले बेची जाती ढोल पीट ,सरकार ..

    ग़ज़ब का व्यंग है ... सच का आईना ... हर कोई नही देखना चाहता इसे ....

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