अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी भारत यात्रा की शुरुआत मुंबई हमलों में मारे जाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दे कर की और मुंबई को भारत की शक्ति का प्रतीक बताया , मगर पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के सवाल को कुटिल मुस्कान बिखेरकर टाल गए । उन्होंने भारत को सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं मे से एक बताया और दोनों देशों की बीच व्यापार बढ़ाए जाने की संभावना पर ज़ोर दिया। साथ ही उन्होंने दस अरब डॉलर की लागत के बीस सौदों का भी ऐलान किया। भारतीय उद्योग जगत ने आमतौर पर ओबामा की पहल का स्वागत किया,लेकिन कुछ विश्लेषकों और विपक्षी दलों को इस बात पर आपत्ति थी कि ओबामा ने मुंबई हमलों के संदर्भ में सीधे-सीधे पाकिस्तान को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया।

आपको क्या लगता है कि क्या बराक ओबामा की भारत-यात्रा की शुरुआत संतोषजनक है? क्या उन्हें इससे अधिक कुछ कहने की ज़रूरत थी? क्या बराक ओबामा आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं?

इसी परिप्रेक्ष्य में अर्पित है चंद पंक्तियाँ ग़ज़ल के माध्यम से -
भूख को रोटी मिलेगी घर हिफाजत के लिए
तो क्यों कोई आयेगा आगे बगाबत के लिए ?

मेहमान मुझको दे गए हैं कूटनीति का जहर-
ले गए हैं रोशनी घर की सजाबट के लिए ।

सच कहूं तो पश्चिमी तहजीब ने उकसा दिया -
बरना हम मशहूर हैं अपनी शराफत के लिए ।

सोचिए इस मुल्क का होगा अरे कैसा भविष्य-
जब पडोसी आयेंगे घर में निजामत के लिए ?

मंदिरों में, मस्जिदों में, बेवजह उलझे हुए क्यों
अपना घर काफी नहीं पूजा-इबादत के लिए ?

सच उगलना पाप है तो पाप हमने कर दिया-
और हम तैयार हैं अपनी शहादत के लिए ।
() रवीन्द्र प्रभात

6 comments:

  1. भाई प्रभात जी, आपने तीन सवाल पूछे हैं… जवाब संक्षिप्त देना तो मुश्किल है फ़िर भी कोशिश करता हूं…

    1) क्या बराक ओबामा की भारत-यात्रा की शुरुआत संतोषजनक है?
    - कुछ हद तक संतोषजनक कही जा सकती है, क्योंकि वह "माँगने" आये थे और हम "देने वाले" थे, हमने दिया…। पूरा संतोष तब होगा जब उस "देने" के बदले हमें क्या "मिला" यह साफ़ होगा… कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने सिर्फ़ "दिया ही दिया", मिला कुछ नहीं… तब तो असंतोषजनक मानी जायेगी…


    2) क्या उन्हें इससे अधिक कुछ कहने की ज़रूरत थी?
    - किसी दूसरे की ज़मीन पर खड़े होकर तीसरे देश को कोसना उचित नहीं होता… ताज में रुककर उन्हें जो संदेश देना था वह दे दिया। ये तो भारत की कमजोरी है कि खुद पाकिस्तान से निपटने की बजाय अमेरिका का मुँह तकता है…

    3) क्या बराक ओबामा आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं?
    - बात अपेक्षाओं की है ही नहीं, अपने भारत के फ़ायदे की है… सवाल यह है कि ओबामा की यात्रा से भारत को क्या फ़ायदा हुआ… यह तो वक्त बतायेगा…

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  2. ओबामा साहब क्या कर गए यह तो समय का चक्र साफ़ करेगा..

    वैसे यह पंक्तियाँ बेहतरीन लगीं:
    "मंदिरों में, मस्जिदों में, बेवजह उलझे हुए क्यों
    अपना घर काफी नहीं पूजा-इबादत के लिए ?"

    आभार..

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  3. ओबामा का तो अभी कुछ कह नही सकते मगर आपकी गज़ल बहुत कुछ कह रही है
    "मंदिरों में, मस्जिदों में, बेवजह उलझे हुए क्यों
    अपना घर काफी नहीं पूजा-इबादत के लिए ?"\

    सच उगलना पाप है तो पाप हमने कर दिया-
    और हम तैयार हैं अपनी शहादत के लिए ।
    लाजवाब गज़ल। बधाई।

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  4. सच उगलना पाप है तो पाप हमने कर दिया-nice......................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................................

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  5. बेबाक कथन!
    --
    इस सुन्दर रचना और पोस्ट की चर्चा
    आज के चर्चा मंच पर भी है!
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/11/337.html

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  6. मंदिरों में, मस्जिदों में, बेवजह उलझे हुए क्यों
    अपना घर काफी नहीं पूजा-इबादत के लिए ?

    बेहद सुंदर.... बस यही तो नहीं समझ रहे हैं हम..... खूब लिखा है आपने.....

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