कभी-कभी स्मृतियों में झांकना कितना सुखद और रोमांच से परिपूर्ण होता है , इसका अंदाजा मुझे तब हुआ जब आज अचानक डा0 रोहिताश्व अस्थाना द्वारा संपादित एक ग़ज़ल संकलन के चंद पन्नों को पलटा । वर्ष-१९९६ में प्रकाशित इस संकलन में मुझे अपनी एक रूमानी ग़ज़ल पर नज़र पडी । प्राय: मेरी कविता-कहानी-ग़ज़ल -गीत समसामयिक ही होती है , किन्तु वर्ष-१९९५ में जब रोहिताश्व जी ने मुझसे एक रूमानी ग़ज़ल की मांग की थी तब मैं काफी परेशान हुआ था कि कौन सी ग़ज़ल भेजूं । जब कुछ भी समझ में नहीं आया था, तो मैंने अपनी एक प्रारंभिक ग़ज़ल जो वर्ष -१९९२ में लिखी थी उसे ही भेज दी । आज उस ग़ज़ल को मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ -



ग़ज़ल .....और तुम हो !

सुहाना सा सफ़र है और तुम हो ।
ग़ज़ल तुमको नज़र है और तुम हो ।।

घटायें हर तरफ छायी जुल्फों की-
बहारें बे -असर है और तुम हो ।।

देख ले जब कहीं चाँद शर्माये -
तेरा जल्वा कहर है और तुम हो । ।

मुकम्मल हो ग़ज़ल इसलिए शायद-
जमाने को खबर है और तुम हो । ।

फासले क्यों हमारे दरमियां अब -
मेरा दिल मुन्तजिर है और तुम हो । ।

ख्याले- जुस्तजू में अश्क बहते हैं-
ये दरिया है, लहर है और तुम हो । ।

करे'प्रभात' दूजे की तमन्ना क्यों-
तलाशे-राहबर है और तुम हो । ।
() रवीन्द्र प्रभात

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