(ग़ज़ल )

बड़ा ज़िद्दी बड़ा निडर बड़ा खुद्दार है वह
इसलिए शायद अलग-थलग इसपार है वह ।

रात को दिन और दिन को रात कैसे कहे-
यार जब राजनेता नहीं फनकार है वह ।

उसे इन मील के पत्थरों से क्या मतलब-
सफ़र के लिए हर बक्त जब तैयार है वह ।

क्यूँ डराते हो जंग से बार -बार उसको -
खुद जब अपने साये से बेजार है वह ।

कोई रिश्ता नहीं उससे मेरा "प्रभात"
पर लगता मैं बारिश और बयार है वह ।


() रवीन्द्र प्रभात

11 comments:

  1. कोई रिश्ता नहीं उससे मेरा "प्रभात"
    पर लगता मैं बारिश और बयार है वह ।

    सचमुच बेहतरीन ग़ज़ल
    dabirnews.blogspot.com

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  2. बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  3. क्यूँ डराते हो जंग से बार -बार उसको -
    खुद जब अपने साये से बेजार है वह ।

    सबसे सुन्दर पंक्तियाँ... वाकई बड़ा जिद्दी है वो...

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  4. रात को दिन और दिन को रात कैसे कहे-
    यार जब राजनेता नहीं फनकार है वह ।

    उसे इन मील के पत्थरों से क्या मतलब-
    सफ़र के लिए हर बक्त जब तैयार है वह ।

    सुन्दर पंक्तियाँ...बेहतरीन ग़ज़ल !

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  5. उसे इन मील के पत्थरों से क्या मतलब-
    सफ़र के लिए हर बक्त जब तैयार है वह ।
    बिलकुल सही कहा कर्म करने वाला तो हमेशा कर्म ही करता है।
    कोई रिश्ता नहीं उससे मेरा "प्रभात"
    पर लगता मैं बारिश और बयार है वह ।
    वाह बहुत खूब। बधाई इस गज़ल के लिये।

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  6. सचमुच सफ़र के लिए हर बक्त जब तैयार है वह,उसे इन मील के पत्थरों से क्या मतलब ?
    वाह बहुत खूब।

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  7. रात को दिन और दिन को रात कैसे कहे-
    यार जब राजनेता नहीं फनकार है वह ।
    bahut sunder rachana.

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