विचार हमारी इच्छाओं की जन्मभूमि है। विचार से ही मन की साधना प्रबल होती है। व्यक्ति अपने बारें में, धारणाओं और सिद्धान्तों के बारे में, समाज और परम्पराओं के बारें में अथवा अपने जीवन के बारे में जब-जब विचार करता है, उसे नई दृष्टि मिलती है। नया मार्ग मिलता है।

विचार है तो इच्छा है। इच्छा है तो गतिविधि है। गतिविधि है तो लक्ष्य है। लक्ष्य है तो क्रियाकलाप है और क्रियाकलाप है तो जीवन है। जीवन में हमारी विभिन्न भूमिकाओं का आधार विचार ही है। विचार विकास का पोषण करता है और विस्तार भी।

 ब्लोगिंग के विस्तार में भी विचार की ही पराकाष्ठा है !आप लिखें और उसके शाया होने की चिंता आपको न करनी पड़े और लोग आपके लिखे पर प्रतिक्रया भी आसानी से दे सके इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है ? यही तो ब्लोगिंग की महिमा है जो बुद्धिजीवियों को अपनी और आकर्षित करती है !

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज ब्लॉग पर बाज़ार की नज़र है, भारत के लगभग ४५ करोड़ युवाओं की आवाज़ को संगठित करते हुए यदि ब्लॉगजगत से जोड़ने हेतु जबरदस्त मुहीम चलाई जाए तो निश्चित  रूप से हम हिंदी ब्लोगिंग के माध्यम से एक नयी क्रान्ति की प्रस्तावना कर सकते हैं  और इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है सामूहिक ब्लॉग !

सामूहिक ब्लॉग के माध्यम से हम उनकी आवाज़ को समाज की प्रतिनिधि आवाज़ के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं,बसर्ते कि सामूहिक ब्लॉग के मॉडरेटर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परित्याग करे !

27 comments:

  1. सामूहिक ब्लॉग के माध्यम से हम उनकी आवाज़ को समाज की प्रतिनिधि आवाज़ के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं,बसर्ते कि सामूहिक ब्लॉग के मॉडरेटर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परित्याग करे

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  2. बेहद सार्थक, साफ़ और सीधा सन्देश ...

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  3. सार्थक विचार.
    किन्तु बहुसंख्यक युवा वर्ग को उन सामूहिक ब्लाग पर लिखने के लिये प्रेरित करने का मार्ग भी तो तलाशना होगा ।

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  4. युवाओं को सार्थक ब्लोगिंग के लिए प्रेरित करना होगा वरिष्ठ ब्लोगरों को, तभी यह संभव हो सकेगा !

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  5. जिस कारणवश अमन का पैग़ाम आप तक कभी नहीं पहुँच सका रविन्द्र जी

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  6. बेहद सीधी और सटीक बात की आपने।

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  7. सही बात है.... सार्थक मार्गदशन के साथ युवाओं को ब्लॉग्गिंग से जोड़ा जाये तो परिणाम बहुत सुखद हो सकते हैं..... विचारणीय पोस्ट

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  8. रविन्द्र जी,
    सामुहिक ब्लागों का होना अच्छी बात है, लेकिन मेरा एक सुझाव है कि हर सामुहिक ब्लाग की एक प्रकाशन नीति होनी चाहिए। इस प्रकाशन नीति पर बीच-बीच में ब्लाग सदस्य विचार कर सकते हैं। इस के साथ ही ब्लाग पर पोस्ट को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति की होनी चाहिए जिसे ब्लाग संपादक कहा जा सकता है। यह इस लिए आवश्यक है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि ब्लाग पर जो भी पोस्ट जाए वह उस की निगाह से हो कर गुजरे और इस बात का ध्यान रखा जाए कि वह उस ब्लाग की नीति के अनुरूप हो।
    यदि ऐसा होता है तो सामुहिक ब्लाग कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं साथ ही एक नई दिशा समाज को भी प्रदान कर सकते हैं।

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  9. "सामूहिक ब्लॉग के मॉडरेटर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परित्याग करे!"

    यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ही तो हिन्दी ब्लोग और आम पाठक के बीच सबसे बड़ा रोड़ा है, किन्तु दुःख की बात यह है कि इस महत्वाकांक्षा का त्याग करना किसी भी ब्लोगर, चाहे वह निजी ब्लोग का स्वामी हो या फिर सामूहिक ब्लोग का मॉडरेटर, के लिए बहुत ही कठिन साबित हो रहा है।

    ब्लोगर्स आम पाठकों की रुचि का ध्यान रख कर पोस्ट लिखते ही नहीं हैं क्योंकि आम पाठक साधारणतः टिप्पणी नहीं करता। हमारे ब्लोगर्स तो अन्य ब्लोगर्स को ही ध्यान में रखकर लिखते हैं क्योंकि उनसे उन्हें टिप्पणियाँ मिलती हैं।

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  10. अभी बहुत से लोगों को पता ही नहीं है कि इंटरनेट पर अब आप भारतीय भाषाओं को प्रयोग बिना कुछ अतिरिक्त ख़र्च किए कर सकते हैं.

    हमारे एक वरिष्ठ हिन्दी—लेखक मित्र हैं, एक बार उनको मैंने ​अनजाने में ही नववर्ष की शुभकामनाएं इ—मेल से हिन्दी में लिख भेजीं. उनका जवाब आया कि भई हमें भी तो बताओ कि आपने इ—मेल में यह हिन्दी कैसी लिखी. वर्ना हम तो यूं ही रोमन शब्दों में हिन्दी इ—मेल लिखते हैं.

    तब से मैंने नियम बना लिया कि भले ही किसी को भी इ—मेल अंग्रेज़ी में ही क्यों न लिखूं, एक आध शब्द या वाक्य हिन्दी में ज़रूर घुसेड़ देता हूं. (पर राष्ट्रभाषा हिन्दी की झंडाबरदारी को लेकर कोई नारेबाज़ी नहीं) इसी का प्रताप है कि अधिकांश जानकार लौटती डाक से जानना चाहते हैं इंटरनेट पर हिन्दी के बारे में.

    बहुत प्रसन्नता होती है, जब अगली इ—मेल उनसे हिन्दी में मिलती है.

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  11. मासूम भाई,आपने कैसे महसूस कर लिया की मैं अमन का पैगाम से दूर हूँ ,मैं तो आपके दिल में बसता हूँ कभी महसूस करके तो देखिये ! मोनिका जी आपने बिलकुल सही कहा कि सार्थक मार्गदशन के साथ युवाओं को ब्लॉग्गिंग से जोड़ा जाये तो परिणाम बहुत सुखद हो सकते हैं.दिनेश जी के वक्तव्य से सौ फीसदी सहमत हूँ कि हर सामुहिक ब्लाग की एक प्रकाशन नीति होनी चाहिए। इस प्रकाशन नीति पर बीच-बीच में ब्लाग सदस्य विचार कर सकते हैं। इस के साथ ही ब्लाग पर पोस्ट को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति की होनी चाहिए जिसे ब्लाग संपादक कहा जा सकता है। यह इस लिए आवश्यक है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि ब्लाग पर जो भी पोस्ट जाए वह उस की निगाह से हो कर गुजरे और इस बात का ध्यान रखा जाए कि वह उस ब्लाग की नीति के अनुरूप हो।यदि ऐसा होता है तो सामुहिक ब्लाग कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं साथ ही एक नई दिशा समाज को भी प्रदान कर सकते हैं।जी के अवधिया जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ कि यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ही तो हिन्दी ब्लोग और आम पाठक के बीच सबसे बड़ा रोड़ा है, किन्तु दुःख की बात यह है कि इस महत्वाकांक्षा का त्याग करना किसी भी ब्लोगर, चाहे वह निजी ब्लोग का स्वामी हो या फिर सामूहिक ब्लोग का मॉडरेटर, के लिए बहुत ही कठिन साबित हो रहा है। काजल जी आपने जो सन्दर्भ दिया है हर उन ब्लोगरों के लिए है जो इंटरनेट को हिंदी के विकास का रोड़ा मानते हैं !

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  12. बहुत ही सही एवं सार्थक बात कही है आपने इस आलेख के माध्‍यम से ...।

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  13. नमस्कार !
    जी , आप कि बात सही है कि ब्लॉग कि पहुच आम आदमी तक होनी चाहिए , मगर या होगा कैसे . क्या हर कोई अपना स्वतन्त्र ब्लॉग बना कर या किसी पत्रिका से जुड , मगर इस में मैंने देखा है कि इस में भी किसी ना किसी प्रकार क ग्रुप बाजी हावी है खैर ... आप के विचार से सहमत हु कि आम आदमी तक ब्लॉग होना चाहिए औउर होगा भी !

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  14. यह पोस्‍ट लि‍खने से पहले हमें मालूम होना चाहि‍ये कि‍ हम आम पाठक कि‍से कह रहे हैं, मुझे लगता है इस पोस्‍ट में यह ही स्‍पष्‍ट नहीं है... आगे क्‍या बात करनी।

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  15. आम पाठक से मेरा अभिप्राय उन लोगों से है जो साधन और सूचना की न्यूनता के कारण अंतरजाल से दूर हैं राजे जी, उन्हें संघनाकीय विकास की प्रक्रिया से रूबरू कराने हेतु कार्यक्रम चलाया जा सकता है या फिर उन्हें अन्य उपक्रमों से जोड़कर प्रेरित करना होगा !

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  16. बहुत सार्थक और उपयोगी आलेख, इस दिशा में बहुत प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  17. सामूहिक ब्लॉग के माध्यम से हम उनकी आवाज़ को समाज की प्रतिनिधि आवाज़ के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं....साफ़ और सीधा सन्देश ...!

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  18. इसके लिए दो पहलूओं पर ब्लोगरों को केन्द्रित होना होगा : एक सूदूर गावों में एन जी ओ के माध्यम से जगह-जगह जनजागरूकता अभियान चलाना होगा, पर्चे और पंपलेट के माध्यम से उन्हें ब्लॉग लेखन और वाचन हेतु प्रेरित करना होगा तथा विशेषज्ञों की टीम के द्वारा कार्यशालाओं का आयोजन करना होगा तभी हम आम लोगों को ब्लोगिंग से जोड़ने में कामयाब हो पायेंगे !
    मुझको ही लें, नेट पर बहुत दिनों से आरकूट और फेसबुक से जुडा था, किन्तु ब्लोगिंग के बारे में नहीं जानता था, मनोज पाण्डेय जी ने मुझे एक बार ब्लोगिंग के बारे में बताया मैं उत्सुक हुआ किन्तु मुझे ब्लॉग बनाना नहीं आता था तो उन्होंने कहा तू रूक मैं एक सामूहिक ब्लॉग लेकर आ रहा हूँ तुझे उसी से जोड़ दूंगा और मैं भी इसप्रकार ब्लॉगजगत का हिस्सा बन गया ! ऐसे ही प्रयास सबको मिलकर करने होंगे !

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  19. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (19.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  20. सचमुच, इन बातों पर अमल करके ही सामुहिक ब्‍लॉग सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं।

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    ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का एक विनम्र प्रयास।

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  21. बहुत अच्छी पोस्ट,
    बड़े हौसले से दो शब्द कहने का मन बनाया,
    किन्तु यहाँ मॉडरेशन है, जिसका विरोध करना मैंने छोड़ दिया है ।
    किन्तु इसका बहिष्कार जारी है, अपने निजी जीवन में एक आम ब्लॉगर किसिम किसिम की वर्जनाओं से पहले ही घिरा हुआ होता है, अभिव्यक्ति के उन्मुक्त मँच पर भी एप्रूवल ( ब्लॉगलेखक द्वारा अनुमोदन = comments sustained Vs. comment overruled ! ) का ताला एक अपशकुन है । घनघोर विचारोत्तेजक सामग्री के अभाव में, यदि निजी सँबन्धों का लिहाज़ न हो या टिप्पणियों के वायदा विनिमय का ख़्याल न हो, आम पाठक तो क्या.. आम ब्लॉगर भी टिप्पणी देने से बचेंगे ! यह ब्लॉगिंग को एक वर्गीकृत बिलगाव की स्थिति की ओर ले जाती है ।
    रही बात आम पाठक की.. .. जब तक हम उन्हें मनोरँजक सामग्री, अच्छा साहित्य, चुनींदा पुरालेख, बेहतरीन शायरी, प्रगतिशील कविताओं, महत्वपूर्ण ऎतिहासिक अभिलेखों, विविध विषयों का एक ठोस डाटाबेस तैयार कर के नहीं देते, तब तक आम पाठक या आम जनता ब्लॉगिंग को एक अनुपयोगी ( non-productive ) बुद्धिविलास से अधिक का महत्व नहीं देगी ।
    रवीन्द्र जी, आपने लिखा है.. "गतिविधि है तो लक्ष्य है !" सहमत हूँ मित्र, पर लक्ष्य ही वह ज़ँज़ाल है जिसे लेकर अब तक उहापोह की स्थिति बनी हुई है... क्यों ?
    दूसरे बिन्दु पर, "......और लोग आपके लिखे पर प्रतिक्रया भी आसानी से दे सके इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है ? " इस मुद्दे पर मैं अपना विचार पहले ही रख चुका हूँ । अब आप ही देखिये न, मैं आपकी पोस्ट से प्रभावित होकर समय का ख़्याल किये बिना रात्रि 2.30 बजे टिप्पणी दे रहा हूँ, हो सकता है मेरी टिप्पणी एक घँटे बाद आने वाले आगामी पाठक को नागवार गुज़रे.. और वह उद्वेलित होकर अपना नज़रिया रखना चाहे.. किन्तु वह औपचारिकता निभाने वाली एक सीधी-साधी टिप्पणी देकर निकल लेगा.. क्योंकि उसे मेरी टिप्पणी सहित अपनी भी टिप्पणी कल किसी समय दिखेगी । आपही बताइये इस स्थिति में विचार-मँथन, परस्पर तर्क-वितर्क ( mutual interaction ) की सँभावनायें कहाँ पर टिकती हैं ?

    ब्लॉगिंग को एक मॅल्टीपरपॅज़ यूटिलिटी-टूल का रूप दिये बिना इसे आम पाठक तक ले जाने की कल्पना अभी तो सपना ही है, फिर यह पूर्वानुमानित अरण्य-रोदन क्यों ?

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  22. आपकी टिपण्णी देखकर सुखद अनुभूति हुयी, आशा है अब आप स्वस्थ-सानंद होंगे...ब्लॉगजगत में आपके सुझाव को सर-आँखों पे लिया जाता है, क्या करूं विवशता में मॉडरेशन लगाया है हटा दूंगा शीघ्र ! उल्लेखनीय है कि विगत दिनों कुछ लोगों के द्वारा लगभग ५० से ज्यादा असंसदीय टिपण्णी की गयी जिसे हटाते हुए मॉडरेशन लगाना पडा !

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  23. शायद आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी हो!
    सूचनार्थ

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आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.

 
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