माई पोएम्स मेरी कवितायेँ - विजय कुमार क्षोत्रिये का ब्लॉग , आज मैं वहीँ गौरैये की तरह उड़ान भर रहा था , चोंच में दाने की तरह कुछ भाव उठाये और उत्सव में आ गया हूँ . भावों से भरे लोगों के लिए इससे बेहतर पौष्टिक आहार और क्या होगा ! सबको अच्छा लगता है उड़ना .... मेरी तरह निरंतर चलना , सच भी है - 'जो थम गए तो कुछ नहीं '


अच्छा लगता है हवा मे उड़ना
अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
भीड़ से दूर,
बाहनो के शोर से दूर
बादलों से बात करना
टिमटिमाती धरती को निहारना

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
आसमान की ओर
अनजानों के साथ
तारों को निहारना
ओर ऊंचाइयों को छूना.

अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना
यह जानते हुए भी
कि यह क्षणिक है
मैं यहाँ रह नहीं सकता
अनजानों के साथ
मैं एक क्षण भूल जाता हूँ
मुझे उतरना है
फिर जाना है
अनजानों से दूर
अपनों के पास
धरती पर

मुझे अच्छा लगना चाहिए
धरती पर रहना
हवा मे उड़ने से ज्यादा
फिर भी
यह क्षणिक अबुभुति अच्छी है
जानता हूँ
यह क्षणिक है

प्रायः क्षणिक अनुभूतियों हेतु
हम युद्ध करते हैं,
क्रुद्ध होते हैं
जानते हुए भी
जीवन क्षणिक सुख
क्षणिक अनुभूतियों के हेतु
नहीं बिताया जा सकता है.

प्यार, स्नेह, सम्बन्ध,
समन्वय, सम्भाव, सम्पन्नता
सब धरती पर ही है
फिर भी
अच्छा लगता है
हवा मे उड़ना,
आसमान की ओर
अपनों से दूर,
क्यों?
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मेरी आंखें और चश्मा

आंखें क्या क्या देखती हैं?
चश्मे की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
किस समय कौन सा चश्मा?

चश्मा
कभी देखने के लिए
कभी ना देखने के लिए
कभी लोगों को दिखाने के लिए -
मैं सब-कुछ देख सकता हूँ
या
मैं कुछ नहीं देख सकता

कभी यह भी दिखाने के लिए कि -
मैं क्या हूँ
मै क्या नहीं हूँ
चश्मा -
सब कुछ देख सकता है
चश्मा -
कई बार आँखों को विश्राम देता है
कई बार उसकी नग्नता को भी
इसलिए कि समय पडने पर,
नग्न होने पर
साफ़ और स्वच्छ रूप से देख सके

चश्मा -
देखने की गति बड़ा देता है
कई बार
चश्मा सब कुछ देख सकता है
यदि इस आशय से पहना जाये
चश्मा कुछ नहीं देख सकेगा
यदि इस आशय से पहना जाये
महत्वपूर्ण है
आशय
जो बदल भी सकता है
समय के साथ
परिस्थितियों के साथ
आप देखना चाहते हैं
या नहीं?

नग्न आंखें देखती हैं
वह भी - कई बार
जो देखना नहीं चाहते.
कई बार
नहीं देख पाती हैं
जो देखना चाहते हैं.
नग्न आंखें - नग्न हैं
आशय के महत्व से परे
नग्न आंखें क्या क्या देखती हैं
नग्न आंखें सब कुछ देख सकती हैं
सब कुछ देखती हैं
आंखें
झुकी हुई या उठी हुई
खुली या बंद
हंसती या रोती
कटी या फटी
शांत या अशांत
अपना कहना कहतीं हैं
अक्सर
चुप रहती हैं, शांत रहती हैं
अपना कहना कहती हैं
चीखती हैं, चिल्लाती हैं
अपना कहना कह जाती हैं
अक्सर
वाणी के बिना.

नग्न आंखें सब कुछ देख सकती हैं
सचमुच
काफी कुछ कह भी सकती हैं
वाणी के बिना.

आँखों की ध्वनि/आवाज
देखी जा सकती है - सुनी नहीं
अक्सर
देखना सुनने से अधिक
महत्वपूर्ण होता है.
विश्वास
देखने पर या सुनने पर - ?
नग्न आंखें बोलती हैं
अक्सर
वाणी के बिना.

अश्रु
आँखों का कहना कहते हैं
अपने समय पर बहते हैं
ख़ुशी मे हंसकर
दुःख मे फंसकर
बहुत कुछ सहते हैं
आँखों का कहना कहते हैं
एक माध्यम बनकर.

अश्रु का समय पर ना आना
किसी अभाव को प्रदर्शित करता है
उस व्यक्ति के मनोभाव को
चित्रित करता है
आंसुओं का समय पर ना आना
मौन रहकर
प्रयास करता है
कुछ कहने का
सब-कुछ सहने का
परन्तु
अश्रु का ना बहना
स्वयं एक माध्यम बन जाता है
कुछ कहने का
और कह जाता है
अक्सर
वाणी के बिना
प्रायः:
व्यक्ति करता है यही आशा
कैसे भी समझ सके
अश्रुओं की भाषा.

आंखें, चश्मा और अश्रु
चश्मा
आँखों पर
कई बार
अश्रुओं को आश्रय देता है
ना दिखा सके वह
जो दिखाना नहीं चाहती है
आंखें
ना कह सके वह
जो कहना नहीं चाहती हैं
आंखें -
आंखें
सब कुछ देखती हैं - देख सकती हैं
सब कुछ कहती हैं - कह सकती हैं
सब कुछ बोलती हैं - बोल सकती हैं
अश्रुओं की पीड़ा के परे
अक्सर
वाणी के बिना
शब्दों के बिना.


विजय कुमार श्रोत्रिय 
http://vkshrotryiapoems.blogspot.com/







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श्री विजय कुमार श्रोत्रिय  जी की रचनाओं के साथ आइये आगाज़ करते हैं चौदहवें दिन के कार्यक्रम का और चलते हैं प्रथम चरण में प्रस्तुत की जा रही रचनाओं से रूबरू होने :
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........................................................कहीं भी जाईयेगा मत, मिलते हैं एक अल्प विराम के बाद 



9 comments:

  1. विजय जी की दोनो कवितायें सोचने को बाध्य करती हैं बेहद मर्मस्पर्शी शानदार्।

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  2. विजय जी की रचनाओं में गज़ब का सम्मोहन है, बधाईयाँ !

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  3. सुन्दर रचना, अच्छी प्रस्तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  4. उत्सव का हर दिन अपने आप में गरिमामय होता है, आज भी देख रही हूँ इन रचनाओं से गुजरकर !

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं यहाँ रह नहीं सकता
    अनजानों के साथ
    मैं एक क्षण भूल जाता हूँ
    मुझे उतरना है
    फिर जाना है
    अनजानों से दूर
    अपनों के पास
    धरती पर....

    वाह!! विजय जी की दोनों रचनाएं विचारों को नई धरातल देती हैं..... उन्हें बधाई...
    सादर...

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  6. प्यार, स्नेह, सम्बन्ध,
    समन्वय, सम्भाव, सम्पन्नता
    सब धरती पर ही है
    फिर भी
    अच्छा लगता है
    हवा मे उड़ना,
    आसमान की ओर
    अपनों से दूर,
    क्यों?
    सच्ची भावाभिव्यक्ति

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  7. very insightful...subtle n deep...straight yet twisted...likhte rahiye...

    उत्तर देंहटाएं
  8. very insightful...subtle yet loud...straight yet twisted...likhte rahiye...

    उत्तर देंहटाएं

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