रश्मि के साथ उत्सव की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते आज मैं मिला कविता किरण से .... मिलना तो पहले भी हुआ , सुना , पढ़ा...पहले भी , पर आज इस उत्सव में उनको लाने में मेरी सहयात्री रश्मि को सफलता मिली है और ....... सफलता इसलिए कि मैं रश्मि के साथ हूँ - हहाहाहा , सही भी है , मैं साथ हूँ ही ना . और मैं इतनी बातें कर रहा हूँ , क्योंकि रश्मि लगातार कहती है- समय बोलो बोलो ....
लेकिन आज हमारे आगे बोलेंगी कविता जी -अपनी ग़ज़लों के माध्यम से ( विगत दिनों  ब्लॉगोत्सव पर उनके मनमोहक आवाज़ में आपने सुना होगा, आज उनकी एक और ग़ज़ल प्रस्तुत है )
आईना रोज़ संवरता कब है
अक्स पानी पे ठहरता कब है

हमसे कायम ये भरम है वरना
चाँद धरती पे उतरता कब है

न पड़े इश्क की नज़र जब तक
हुस्न का रंग निखरता कब है

हो न मर्ज़ी अगर हवाओं की
रेत पर नाम उभरता कब है

लाख चाहे ऐ 'किरण' दिल फ़िर भी
दर्द वादे से मुकरता कब है

कविता किरण 
http://kavitakiran.blogspot.com/

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कविता जी के बाद मिलते हैं संध्या शर्मा से ....

क्यों नहीं अपनी हस्ती......... संध्या शर्मा

उसकी इजाज़त के बगैर जब पत्ता भी नहीं हिलता है,
वह ख़ामोशी से दुनिया का तमाशा क्यों देखता है ..
क्या सब कुछ उसकी मर्जी से ही होता है...?
क्यों नहीं अपनी हस्ती आप ही मिटा देता है ...?
ना होते गिरिजाघर, गुरूद्वारे,
ना मस्जिद, ना मंदिर होता.
ना कोई हिन्दू, मुस्लिम,
ना सिक्ख, ईसाई होता.
ना कोई दुश्मन होता,
ना कोई किसी से नफरत करता.
दिल बनाकर उसमे झूठ और फरेब ना देता,
तो आपस में एक प्यार का रिश्ता ही होता..
हर रूप में इंसान यहाँ इंसान ही होता....

"ज़िन्दगी मर रही है,
मौत यहाँ जिन्दा है....
अपने बनाये जहाँ पर,
तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"


संध्या शर्मा 
http://sandhyakavyadhara.blogspot.com/


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और ये हैं हमारे साथ अब प्रियंका राठौड़ -

जिन्दगी खूबसूरत है.....

जिन्दगी खूबसूरत है
बस देखने के लिए
एक नजर चाहिए ......

क्या देखा कभी ध्यान से
नीले - नीले अम्बर में
कहीं रंगों भरे कैनवास भी हैं ......
शांत से दिखने वाले जल में
कितना गहरा संसार भी है ......
बारिश की बूंदों में
रुनझुन रुनझुन आवाज भी है ......
ची ची करती चिड़ियों में
कहीं मनमोहक गान भी है .......
रंग बिरंगे फूलों में
खूबसूरत मुस्कान भी है ......
हवा के ठन्डे झोखों में
एक अल्हड़ सी पुकार भी है .....
इठलाती बलखाती तितलियों में
कहीं प्यार का राग भी है ......
कहीं मंदिर के घंटों में
आत्म बोध का ज्ञान भी है ....
कही चौकड़ी भरते बच्चों में
जीवन का आधार भी है .......

देख सको तो देख लो एक बार -
जिन्दगी खूबसूरत है
बस देखने के लिए
एक नजर चाहिए .................
प्रियंका राठौड़
http://rathorepriya.blogspot.com/


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और अब चलिए बढ़ते हैं उत्सव के दुसरे चरण की ओर इन प्रस्तुतियों के साथ :


Lonely[7]

अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारा कीजिये

अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारा कीजिये ग़मों में ही सही अपनी, मुझे अपना सहारा कीजिये तेरी महक...
phc 6

कविता और बांसुरी

ललित निवंध कविता और बांसुरी का क्या संबंध है? कोई कविता पढ़े और बांसुरी भी बजाये तो कैसा लगेगा?...
waheeda

चौदहवीं का चाँद हो

चाँद आज भी लुभाता है , अपनी चाँदनी साझा करता है … विज्ञान ने जो भी सत्य बताया हो उस पर अपने कदम...
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चर्नोबिल के बाद एकाकी प्रिप्यात नदी

कविता (१९८६ में अविभाजित रूस में विश्व इतिहास में सबसे दुखद नाभिकीय दुर्घटना चर्नोबिल में हुई...
life-sq-sm

कर्तव्यपालन की सज़ा

कहानी जब जल्दी हो तो सारे काम भी उल्टे होते हैं . कभी हाथ से दूध गिरता है तो कभी बर्तन तो कभी सब्जी...


इसी के साथ अट्ठारहवें दिन का कार्यक्रम संपन्न,कल उत्सव में अवकाश का दिन है, मिलते हैं परसों यानी २२ जुलाई को ११ बजे परिकल्पना पर ....!



8 comments:

  1. सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक ...रचनाकारों को बधाई परिकल्‍पना का आभार ।

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  2. परिकल्पना में शामिल सभी रचनाएँ भावपूर्ण हैं और बहुत ही अच्छी हैं. रश्मि दी मुझे और मेरी रचना को यहाँ भी अपना प्यार और आशीर्वाद देने के लिए आपका बहुत - बहुत आभार...शुभकामनायें...

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  3. meri rachna ko is khoobsurat manch mei shamil karne ke liye bahut bahut dhanybad....aabhar

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  4. सारी रचनाएँ वेहद उम्दा है, बधाईयाँ !

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, सुन्दर सचानाओं का संयोजन और सुन्दर अभिव्यक्ति हेतु आभार !

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  6. ''परिकल्पना ''के इस सफ़र में ....किरण जी,संध्या जी और प्रियंका जी .. आपने ...बहुत खूबसूरत भावों से पिरोई है आज की माला ....!!
    आभार.

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  7. सुन्दर रचनाओं का संयोजन और सुन्दर प्रस्तुति हेतु आभार !

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