समय,इंसान,पेड़,पौधे .... कुछ तो नहीं ठहरा है . विधि विधान सही हो तो आत्मा भी मुक्त हो जाती है . यादों के सिवा कुछ नहीं रह जाता और यदि इतिहास गवाह ना बने तो यादें भी कब तक !!! चलो जब तक है - जी लेते हैं .....

My Photoक्या नियति के क्रूर पंजों में इतनी ताकत है कि वो हमसे हमारा वेद छीन सके? या फिर काल इतना हठी हो सकता है कि उसे पूरी दुनिया में बस हमारा वेद ही पसंद आए? सब कह रहे हैं कि वेद हमारे बीच नहीं रहा,हमारा प्यारा वेद अब ईश्वर के दरबार में अपना रंग जमाएगा. हम में से कोई भी यह सोच भी नहीं सकता था कि ईश्वर के कथित ‘पैरोकारों’ से हमेशा दो-दो हाथ करने वाले वेद की जरुरत खुद ईश्वर को पड़ सकती है.शायद ईश्वर सीधे वेद से ही यह जानना चाहता होगा कि समस्याओं,चिंताओं और परेशानियों से भरी मेरी दुनिया में तुम इतने बेफ़िक्र-बेलौस और खिलंदड कैसे रह सकते हो?

    वेद यानि वेदव्रत गिरि, एटा के पास छोटे से गाँव की एक ऐसी शख्सियत जिसके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं था.वह पत्रकार भी था और यारों का यार भी,लेखक भी था और दोस्तों का आलोचक भी,कवि भी था और मित्रों का गुणगान करने वाला भी,पटकथा लेखक भी था और अपने ही भविष्य से खेलने वाला अभिनेता भी...क्या नहीं था हमारा वेद और क्या नहीं कर सकता था हमारा वेद. कल ही की बात लगती है जब हम सब यानि कुल जमा ४० युवा भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में मिले थे और पंख लगाकर उड़ते समय के साथ पत्रकार कहलाने लगे.जब हम सभी भोपाल और मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपना भविष्य तलाश रहे थे तो वेद को दिल्ली में अपनी मंजिल नज़र आ रही थी...आखिर सबसे अलग जो था हमारा वेद.जब दिल्ली में उसके पैर जमे तो उसने मुंबई की राह पकड़ ली और मुंबई में सराहना मिलने लगी तो इंदौर-भोपाल को पड़ाव बना लिया. कुछ तो खास था वेद में तभी तो वह जहाँ भी जाता मंजिल साथ चलने लगती. शायद यही कारण था कि साथ-साथ पढ़ने के कई साल बाद एकाएक इंदौर में अल्पना का हाथ थामा तो अल्पना की पढ़ाई और परीक्षा की तैयारियों में ‘जान’ आ गयी और वह पढते-पढते कालेज में अपने हमउम्र छात्रों को पढाने वाली प्राध्यापक बन गयी...कुछ तो अलग करता था वेद को हमसे तभी तो जब हम सब अपने बच्चों को ब्रांडनेम बन चुके स्कूलों में पढ़ाने की जद्दोजहद में जुटे थे तब वेद ने अपने बेटे को अपने से दूर बनारस में लीक से हटकर पढ़ाई करने के लिए भेज दिया ताकि वह भी हमारे वेद की तरह सबसे हटकर परन्तु सभी का चहेता इन्सान बने.

  आज के दौर में जब लोग गाँव से दूर भाग रहे हैं और परम्पराओं के नाम पर औपचारिकताएं निभा रहे हैं तब वेद ने त्यौहार मनाने के लिए भी अपने गाँव की राह पकड़ ली. वह आंधी की तरह आता था,ठेठ अंदाज़ में दिल की बात कह-सुन जाता था और फिर तूफ़ान की तरह चला भी जाता था. उसका अंदाज़ सबसे जुदा था और यही बेफ़िक्र शैली वेद को सबसे अलग,सबसे जुदा,सबका प्रिय और सबका चहेता बनाती थी. वेद, आत्मा के सिद्धांतों में न मुझे विश्वास था और न ही तुम भरोसा करते थे लेकिन अब होने लगा है इसलिए मैं न केवल तुमसे बल्कि अपने सभी दोस्तों से कह सकता हूँ तुमको हमसे कोई नहीं छीन सकता.तुम्हारी जिम्मेदारी भरी बेफिक्री,गहराईपूर्ण खिलंदडपन,आलोचना भरा अपनापन और गंभीरता के साथ बेलौस अंदाज़ हमारे साथ है. हम उसे जीवित रखेंगे और अपने झूठे बाहरी आवरणों,दिखावे की गंभीरता और तनाव बढ़ाती फ़िक्र को परे रखकर तुम्हारी तरह बनने का प्रयास करेंगे.हम एक वेद से अनेक वेद बनकर दिखायेंगे क्योंकि हम सभी वेद बन जायेंगे इसलिए मेरा दावा है कि वेद तुमको हमसे कोई नहीं छीन सकता..काल भी नहीं,नियति भी नहीं,तुम्हारी बेफिक्री भी नहीं और आँखों देखी सच्चाई भी नहीं...!!! (वेदव्रत गिरि देश के जाने-माने पत्रकार थे.दैनिक भास्कर से लेकर देश के तमाम समाचार पत्रों में वे रहे हैं और ‘मेरीखबर डाट काम’ तथा ‘मायन्यूज़ डाट काम’ नामक न्यूज़ पोर्टल का संचालन कर रहे थे.उनका हाल ही में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया है)   


वो स्कूल की सीड़ी पर प्यार भरी बातें,
आते जातों पर कमेंट की बरसातें,
वो स्लेबस की टेन्सन, वो इक्ज़ाम की रातें
वो कैंट्टीन की पार्टी, वो बर्थडे की लातें
वो रूठना मनाना, वो बंक वो मुलाकातें
वो लैब वो लाइब्रेरी,
वो सोना टैम्प्रेरी
वो मूवी वो म्युजिक
वो कार्ड के मैजिक
वो प्रपोज़ल की प्लानिंग में रात का गुजरना
हर एक को दोस्त की भाभी बताना
लैक्चर से ज्यादा उसको निहारना
फिर क्लास में पीछे की सीट में सोना
उसकी नज़र में शरीफ़ बनाया जाना
ना रहे वो दिन ना रही वो रातें
ना रही वो वो हँसी भरी मुलाकातें
रही अगर कुछ तो बस यादें

 भूली -बिसरी यादें(यादें - अमरेन्द्र शुक्ल -अमर)


"मैं कोई किताब नहीं,
जिसे जब चाहोगे, पढ़ लोगे तुम
मैं कोई असरार नहीं,
जिसे जब चाहोगे, समझ लोगे तुम ,
मैं हु, तुम्हारे दिल की धड़कन,
जिसे सुनना भी चाहो, तो न सुन सकोगे तुम

कितना ही शोर, हो, तुम्हारे चारो तरफ
न सुन सकोगे तुम ,
कितनी ही उजास हो तुम्हारी रातें,
न सो सकोगे तुम,
पल भर में खीच लायेंगी,
तुम्हे हमारी यादें,
एक पल भी बगैर हमारे,
न रह सकोगे तुम,

मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"


My Photoक्षमा कर देना हमको
ओ समय !
हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
हमारे अपराध के लिये
कि बस जी लेना चाहते थे हम
अपने हिस्से की गलीज जिंदगी
अपने हिस्से की चंद जहरीली साँसें
भर लेना चाहते थे अपने फेफड़ों मे
कुछ पलों के लिये ही सही
कि हमने मुक्ति की कामना नही की
बचना चाहा हमेशा
न्याय, नीति, धर्म की परिभाषाओं से
भागना चाहा नग्न सत्य से.

कि हम अपने बूढे अतीत को
विस्मृति के अंधे कुँए मे धकेल आये थे
अपने नवजात भविष्य को गिरवी रख दिया था
वर्तमान के चंद पलों की कच्ची शराब पी लेने के लिये,
बॉटम्स अप !
कि हम बस जी लेना चाहते थे
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से की जमीन
अपने हिस्से की खुशी
नहीं बाँटना चाहते थे
अपने बच्चों से भी

कि हम बड़े निरंकुश युग मे पैदा हुए थे
ओ समय
उस मेरुहीन युग में
जहाँ हमें आँखें दी गयी थीं
झुकाये रखने के लिये
इश्तहारों पर चिपकाये जाने के लिये
हमें जुबान दी गयी थी
सत्ता के जूते चमकाने के लिये
विजेता के यशोगान गाने के लिये
और दी गयी थी एक पूँछ
हिलाने के लिये
टांगों के बीच दबाये रखने के लिये

कि जिंदगी की निर्लज्ज हवस मे हमने
चार पैरों पर जीना सीख लिया था
सीख लिया था जमीन पर रेंगना
बिना मेरु-रज्जु के
सलाखों के बीच रहना,
कि हमें अंधेरों मे जीना भाता था
क्योंकि सीख लिया था हमने
निरर्थक स्वप्न देख्नना
जो सिर्फ़ बंद आँखों से देखे जा सकते थे
हमें रोशनी से डर लगने लगा था
ओ समय !

जब हमारी असहाय खुशियाँ
पैरों मे पत्थर बाँध कर
खामोशी की झील मे
डुबोयी जाती थीं,
तब हम उसमे
अपने कागजी ख्वाबों की नावें तैरा रहे होते थे

ओ समय
ऐसा नही था
कि हमें दर्द नही होता था
कि दुःख नही था हमें
बस हमने उन दुःखों मे जीने का ढंग सीख लिया था
कि हम रच लेते थे अपने चारो ओर
सतरंगे स्वप्नो का मायाजाल
और कला कह देते थे उसे
कि हम विधवाओं के सामूहिक रुदन मे
बीथोवन की नाइन्थ सिम्फनी ढूँढ लेते थे
अंगछिन्न शरीरों के दृश्यों मे
ढूँढ लेते थे
पिकासो की गुएर्निक आर्ट
दुःख की निष्ठुर विडम्बनाओं मे
चार्ली चैप्लिन की कॉमिक टाइमिंग
और यातना के चरम क्षणों मे
ध्यान की समयशून्य तुरीयावस्था,
जैसे श्वान ढूँढ़ लेते हैं
कूड़े के ढेर मे रोटी के टुकड़े;

कि अपनी आत्मा को, लोरी की थपकियाँ दे कर
सुला दिया था हमने
हमारे आत्माभिमान ने खुद
अपना गला घोंट कर आत्महत्या कर ली थी

हम भयभीत लोग थे
ओ समय !
इसलिये नही
कि हमें यातना का भय था,
हम डरते थे
अपनी नींद टूटने से
अपने स्वप्नभंग होने से हम डरते थे
अपनी कल्पनाओं का हवामहल
ध्वस्त होने से हम डरते थे,
उस निर्दयी युग मे
जब कि छूरे की धार पर
परखी जाती थी
प्रतिरोध की जुबान
हमें क्रांति से डर लगता था
क्योंकि, ओ समय
हमें जिंदगी से प्यार हो गया था
और आज
जब उसकी छाया भी नही है हमारे पास
हमें अब भी जिंदगी से उतना ही प्यार है

हाँ
हमे अब भी उस बेवफ़ा से उतना ही प्यार है !

इसी के साथ मैं आज के कार्यक्रम की संपन्नता की घोषणा करूँ , उससे पहले आपको ले चलती हूँ वटवृक्ष पर 
जहां सोनिया बहुखंडी गौड़ लेकर उपस्थित हैं अपनी कविता : कौन है सूने हृदय मे?

मुझे अनुमति दीजिये, कल फिर मिलती हूँ सुबह 10 बजे परिकल्पना पर , तबतक शुभ विदा !

12 comments:

  1. यादें ,,,,
    वक्त की दी हुई सौगात | कुछ अच्छी-कुछ बुरी , लेकिन सभी अपनी |
    अच्छा चयन ,
    वेद जी को विनम्र श्रद्धांजलि |

    सादर

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  2. (वेदव्रत गिरि) जी के लिये विनम्र श्रद्धांजलि ...
    सभी रचनाओं का चयन एवं प्रस्‍तुति सराहनीय
    सादर

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  3. वेद जी को विनम्र श्रद्धांजलि....
    Dr. Rama Dwivedi

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  4. नमन वेद जी को विनम्र श्रद्धांजलि........
    सराहनीय रचनाये

    उत्तर देंहटाएं
  5. मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
    किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"


    क्षमा कर देना हमको
    ओ समय !
    हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
    हमारे अपराध के लिये
    कि बस जी लेना चाहते थे हम
    अपने हिस्से की गलीज जिंदगी

    वेद जी को विनम्र श्रद्धांजली .....एक से बढ़ कर एक लिंक्स .....

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...वेद जी को विनम्र श्रद्धांजलि....

    उत्तर देंहटाएं
  7. क्षमा कर देना हमको
    ओ समय !
    हमारी कायरता, विवशता, निर्लज्जता के लिये
    हमारे अपराध के लिये
    कि बस जी लेना चाहते थे हम
    अपने हिस्से की गलीज जिंदगी
    अपने हिस्से की चंद जहरीली साँसें
    भर लेना चाहते थे अपने फेफड़ों मे
    कुछ पलों के लिये ही सही
    कि हमने मुक्ति की कामना नही की

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...वेद जी को विनम्र श्रद्धांजलि....

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  9. परिकल्पना दिनोंदिन चमक रही है ...सादर

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  10. वेद जी को हार्दिक श्रद्धांजलि..अति सुन्दर परिकल्पना उत्सव..

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