चाहने में इच्छाशक्ति प्रबल हो तो असंभव भी संभव है ... रुकावटें,भय,अस्तित्व का प्रश्न सबके सामने होता है . मझदार,व्यूह,जमीं के नीचे से खिसकती धरती सबके हिस्से आती है,समय अलग अलग है ! संस्कार अपने होते हैं, आनेवाली हवाओं में कौन सा तिनका आँखों में पड़ेगा - यह तय नहीं होता . व्यूह अपना अपना होता है - कोई अभिमन्यु होता है,कोई कृष्ण, कोई पितामह,कोई अर्जुन तो कोई कर्ण ...........आलोचना से न अभिमन्यु जीवित होगा,न पितामह विरोधी स्वर लिए अर्जुन के साथ होंगे .... पर चाह लो तो अमरत्व है इच्छाशक्ति का . होनी का वरदान कृष्ण को कृष्ण बना गया,यशोदा को कृष्ण के मुख में ब्रह्माण्ड दिखा गया ........ असंभव को संभव करने में ही तो कृष्ण भगवान् हुए, अवतार कहलाये,उद्धारक हुए . 

सोच लो तो मरकर भी रास्ते ख़त्म नहीं होते ....

Akanksha: आत्म संतोष(आशा सक्सेना)

पहले भी रहे असंतुष्ट
आज भी वही हो
पहले थे अभाव ग्रस्त
पर आज सभी सुविधाएं
 कदम चूमती तुम्हारे
फिर प्रसन्नता से परहेज क्यूं ?
कारण जानना चाहा भी
 पर कोइ सुराग न मिल पाया
परन्तु मैंने ठान लिया
कारण खोजने के लिए 
तुम्हें टटोलने के लिए |
जानते  हो तुम भी
सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं
समझोते भी करने होते हैं
परिस्थितियों से ,
 यह भी तभी होता संभव
जब स्वभाव लचीला हो
समय के साथ परिपक्व हो
कुंठा ग्रस्त न हो  |
चाहे जब खुश हो जाना
अनायास गुस्सा आना
 उदासी का आवरण ओढ़े
अपने आप में सिमिट जाना |
कुछ तो कारण होगा
जो बार बार सालता होगा
वही अशांति का कारण होगा
जो चाहा कर न पाए
कारण चाहे जो भी हो |
क्या सब को
 सब कुछ मिल पाता है ?
जो मिल गया उसे ही
अपनी उपलब्धि मान
भाग्य को सराहते यदि
 आत्मसंतुष्टि का धन पाते |
सभी पूर्वनिर्धारित  है
भाग्य से ज्यादा कुछ न मिलता
जान कर भी हो अनजान क्यूँ ?
हंसी खुशी जीने की कला

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हमारे जीवन में जब कोई विपत्ति आती है, उसको सहने की शक्ति केवल भक्ति में ही है. हम अकेले नहीं हैं, अस्तित्व हमारे साथ है, वही हमारे जीवन का रथ हांकता है और हमारा सच्चा सुह्रद है, हितैषी है. विपत्ति हमें हिलाना चाहती है पर कोई हमें सम्भाल लेता है, इसका अनुभव हमें कई बार हुआ है, हर बार उसी ने हमें बचाया है जो हमारी आत्मा है. उसे यदि हम भूल भी जाएँ तो वह हमें अपनी याद दिलाता है, वही विपत्ति से बचाकर पुनः शरण में ले आता है. हर क्षण वह हमारे अपराधों को क्षमा करता है, वह क्षमा करता है क्योंकि वह प्रेम करता है, प्रेम की शक्ति अपार है, वह अपने उदाहरण से हमें भी सिखाता है कि हम भी औरों को क्षमा करें, निर्णय सुनाने का अधिकार हमें नहीं है, यदि ईश्वर हमें निर्णय सुनाने लगे तो हम इस धरा पर रहने के काबिल नहीं हैं, पर वह हमें हजारों बार अवसर देता है धीरे-धीरे जैसे कोई बच्चे को हाथ पकड़ कर चलना सिखाता है वैसे ही वह कान्हा हमें जीना सिखाता है. वह अपने प्रतिनिधि सद्गुरु को हमारे जीवन में भेजता है. उनके सान्निध्य में हम परम के मार्ग पर चलते हैं. वह हमें कितने विभिन्न उपायों से अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराते हैं. हमारे मन पर अज्ञान की जो मैल जम गयी है, उसे धोना सिखाते हैं. सच्चे हृदय से जब हम उनकी शरण में जाते हैं तो वह कृपा करके आनंद, शांति, प्रेम तथा ज्ञान का उपहार देते हैं, उनकी कृपा के हम पात्र बनें तो वह लुटाने को तैयार हैं. सद्गुरु का जीवन हमारे सम्मुख ईश्वर का रहस्य खोलकर रख देता है.
My Photoकई दिन से एक बात बहुत परेशान कर रही है, सोचता हूं कि आखिर मैं यहां यानि ब्लाग जगत में क्या करने आया था और जो करने आया था वो कर रहा हूं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्लाग पर आकर सिर्फ अपना समय खराब कर रहा हूं। यदा कदा लिखना और घंटो साथी ब्लागर्स के ब्लाग पर जाकर उन्हें पढ़ना। क्या इसे ही ब्लागिंग कहते हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं नहीं, ये तो ब्लागिंग नहीं हो सकती। दरअसल दिल्ली में मीडिया से जुड़े होने की वजह से सियासत के हर रंग को काफी करीब से देखने का मौका मिलता है। मीडिया संस्थानों की अपनी सीमाएं होती है, उसी दायरे में रहकर आपको अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। मुझे लगा कि मैं इस ब्लाग के जरिए उन बातों का यहां जिक्र करुंगा जो खेल पर्दे के पीछे चलता है।
मीडिया आजाद है, आपके साथ मैने भी सुना है, पर मीडिया रहते हुए मैने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। खैर आज मैं मीडिया पर नहीं ब्लाग परिवार पर बात करने आया हूं। मित्रों मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है कि जब हम सभी ब्लागर्स को दिल पर हाथ रखकर सोचना होगा कि क्या हम जो कर रहे हैं, यही सोच कर हमने ब्लागिंग की शुरुआत की थी। क्या वाकई हमारा मकसद सिर्फ ये था कि यदा कदा हम कुछ लिख दें और दूसरे साथियों के ब्लाग पढ़ें, उन पर कमेंट करें, फिर उनसे भी यही अपेक्षा करें। ब्लागिंग बस इतनी ही है क्या ?

आप मेरी बात से सहमत होंगे कि सोशल नेटवर्किंग साइट को अब अपनी ताकत को साबित करने की जरूरत नहीं है। इजिप्ट आंदोलन में सोशल नेटवर्किंग ने लोगों को जागरूक करने में एक अहम भूमिका निभाई। अन्ना का आंदोलन सही है या गलत है, इस पर विवाद हो सकता है, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि अन्ना को सोशल नेटवर्किंग साइट का भारी समर्थन रहा है। इसी की बदौलत एक बड़ा तूफान सड़कों पर दिखाई देता है। ऐसे में मुझे लगता है कि ब्लागिंग में जो बिखराव है, इसे समेटने की जरूरत है।

हमें सोचना होगा कि कैसे हम समाज की अनिवार्य जरूरतों में शामिल हो सकते हैं। मसलन जिस तरह लोग अगर एक दिन समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं तो उन्हें लगता है कि उनके दिन की शुरुआत ही नहीं हुई। मैं देखता हूं कि एक ही अखबार को ट्रेन में कितने लोग पढ़ते रहते हैं। बोगी में अखबार का हर पन्ना एक दूसरे में बट जाता है। क्रिकेट का मैच हम टीवी पर पूरा लाइव देखते हैं, फिर भी  अगले दिन अखबार का इंतजार रहता है। वो क्यों ? इसलिए कि टीवी पर सिर्फ वो दिखाई देता है,जो मैदान पर हो रहा है, लेकिन मैदान के बाहर जो खेल हो रहा है, वो अखबार ही बता पाएगा। कहने का मतलब ये है कि लोग अखबार पढ़ने के लिए जब इतना आतुर हो सकते हैं तो ब्लाग पर क्यों नहीं। हम ब्लाग को भी लोगों से जोड़ सकते हैं, पर इसके लिए पहले हमें लोगों का भरोसा जीतना होगा। हमें साबित करना होगा कि हम भी ईमानदारी से लेखन करते हैं।

आज बड़ा सवाल ये है कि हम कब तक “ चूं चूं करती आई चिड़िया, दाल  का दाना लाई चिड़िया “ लिखकर लोगों की झूठी वाहवाही लूटते रहेगें। हम जिम्मेदार कब बनेगें ? जिम्मेदार कोई एक दिन में नहीं बन सकता, सवाल ये है कि हम इसकी पहल कब करेंगे ? अच्छा ऐसा भी नहीं है कि इसके लिए हमें हिमालय पर्वत पड़ चढना है, हमें सिर्फ सामाजिक सरोकारों से जुडना होगा। समाज के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा। मै ये नहीं कहता कि हम अभी सामाजिक बुराइयों को लेकर संवेदनशील नहीं है, हम संवेदनशील हैं, लेकिन बिखरे हुए हैं। हम किसी बुराई को देखते हैं, एक लेख या फिर कविता के जरिए दो आंसू बहाकर आगे बढ़ जाते हैं। मुझे लगता है कि इतने भर से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता। ये समझ लें, इससे तो हम किसी भी मुद्दे की शुरुआत भर करते हैं।

मित्रों अब वक्त आ गया है कि जब हमें लगे कि ये काम ठीक नहीं है, फला राज्य की  सरकार मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही है। तो हम सब को मिलकर आंदोलन छेड़ देना होगा। मैं दो एक मसले की चर्चा करना चाहता हूं। ब्लाग परिवार में महिलाओं की अच्छी संख्या है। राजस्थान  के एक मंत्री ने वहां की नर्स भंवरी देवी के साथ पहले अवैध संबंध बनाया, अब वो महिला गायब है। अभी तक उसका कोई सुराग नहीं मिला। मंत्री की कुर्सी चली गई, जांच सीबीआई कर रही है। क्या आपको लगता है कि इतना ही काफी है ? क्यों नहीं ब्लाग पर महिलाओं की आग दिखाई दी..। आपको नहीं लगता कि ये ऐसा मुद्दा था कि महिलाओं के साथ हम सब ब्लाग को भंवरी देवी से रंग कर लाल कर देते।


हम 21 वीं सदी की बात करते हैं, गोरखपुर में अज्ञात बीमारी से सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई। आज तक सूबे की सरकार ये नहीं बता पा रही है कि मौत की वजह क्या थी। क्या हमारे भीतर इतनी संवेदनशीलत नहीं है, कि हम इसे एक मुद्दा बनाकर ब्लाग को रंग देते। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ विभाग का भ्रष्टाचार किसी से छिपा नही हैं। यूपी के ब्लागर्स ने कितनी बार इस मुद्दे पर अपनी  कलम चलाई। आज राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। आए दिन सुनते रहते हैं कि उन्हें  यूपी सरकार के बेईमानी पर गुस्सा आता है। कोई उनसे पूछ सकता है कि राहुल आपको केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार पर आज तक गुस्सा क्यों नहीं आया ? जिस पार्टी की वजह से (डीएमके) केंद्र की सरकार बदनाम हो रही है, उससे किनारा क्यों नही कर लेते। क्या  सरकार में बने रहने के लिए बेईमान पार्टियों का सहयोग लेने से परहेज नहीं है कांग्रेस को। आपको नहीं लगता कि ये ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें अपनी बेबाक राय रखनी चाहिए।

हम सब भारतीय संविधान में आस्था रखते हैं। हम जानते हैं कि हमारे देश की खूबसूरती हमारा लोकतंत्र है। पडोसी देशों में लोकतंत्र कमजोर हुआ तो उसका हश्र देख रहे हैं। मैं बार बार कहता रहा हूं कि अन्ना का मुद्दा सही हो सकता है, पर तरीका गलत है। आप संसद को बंधक बनाकर काम नहीं ले सकते। देश में भ्रष्टाचार गंभीर समस्या है, भ्रष्टाचारियों को सख्त सजा होनी ही चाहिए। लेकिन मित्रों लोकपाल भी तभी काम कर पाएगा, जब देश में लोकतंत्र होगा। बताइये जिस सरकार से टीम अन्ना दो दो हाथ करने निकली है, उन्हीं से अनशन के लिए मैदान का शुल्क माफ करने की भीख मांग रहे हैं। मेरा मानना है कि जनता की ताकत और जनता के पैसे को उन्होंने दो कौड़ी के नेताओं के पैरों में डाल दिया। मुझे इस बात की तकलीफ है कि जब भी आंदोलन अन्ना ने आंदोलन किया है, जंतर मंतर पर या रामलीला मैदान पर, वहां जितना खर्च हुआ, उससे कई गुना ज्यादा पैसा जनता ने उन्हें चंदा दे दिया, फिर ये फीस माफी के लिए क्यों अर्जी देते हैं ? यही वजह की मुंबई हाईकोर्ट से भी अन्ना को खरी खरी सुननी पड़ी।

खैर अब वो समय आ गया है जब लोगों को एक सूत्र में बंधना ही होगा। हमें सरकार से ये आवाज भी उठानी होगी कि जो सहूलियते इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया को दी जाती हैं, वो सहूलियतें ब्लागर्स को भी दी जानी चाहिए। क्योंकि हम भी तो लोगों की आवाज हैं, हम भी तो सूचनाओं का आदान प्रदान करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ब्लागर साथी हमें माफ करें तो मैं कुछ लोगों के नाम लेना चाहता हूं, जिनसे मैं कहना चाहता हूं कि वो ब्लाग परिवार में काफी वरिष्ठ हैं और उन्हें इसकी अगुवाई हाथ में लेनी ही चाहिए। चूंकि मेरी जानकारी कम है तो हो सकता है कुछ नाम छूट जाएं, लेकिन मै डा. रूपचंद्र शास्त्री, रश्मि प्रभा, पूर्णिमा वर्मन, रवींद्र प्रभात, ललित शर्मा, अविनाश वाचस्पति, वंदना गुप्ता, हरीश सिंह, डा. अनवर जमाल, राज भाटिया, यशवंत माथुर, राकेश कुमार, अनुपमा त्रिपाठी, विजय माथुर, आशुतोष, अंजू चौधरी, कविता वर्मा, चंद्रभूषण मिश्र गाफिल, दिनेश कुमार उर्फ रविकर, प्रवीण कुमार, सुमन, डा. मोनिका शर्मा का नाम लेना चाहता हूं जो ब्लाग परिवार से काफी समय से जुडे हैं और ये ब्लाग परिवार को नेतृत्व भी दे सकते हैं।

शुरुआत में दिक्कत हो सकती है, लेकिन हम अगर एक सूत्र में बंध गए और बुनियादी सवालों पर चट्टान की तरह खड़े हो गए, तो कोई ताकत नहीं, जो हमारी एकता के आगे नतमस्तक ना हो जाए। इससे दो फायदा होगा, पहला हमारी ताकत को लोग नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे और दूसरा आम जनता की जरूरतों की कोई अनदेखी करने की हिमाकत नहीं कर सकेगा। बडा सवाल ये है कि क्या हम ऐसा करने के लिए तैयार हैं और हमारे वरिष्ठ ब्लागर साथी क्या नेतृत्व देने के लिए आगे आएंगे ? अगर ऐसा नहीं  होता है, तो मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि हां मैं ब्लागर होने पर शर्मिंदा हूं..।

महेन्द्र श्रीवास्तव के आधा सच के बाद आइए चलते हैं वटवृक्ष पर जहां संजय व्यास उपस्थित हैं अपनी लघुकथा : चारपाई पर बुढ़िया लेकर । आप इस अनोखी प्रस्तुति को आत्मसात करें और मैं उपस्थित होती हूँ एक मध्यांतर के बाद । 

10 comments:

  1. उम्दा लिंक्स .ब्लॉग्गिंग के बारे में महेंद्र जी का लेख वास्तव में विचारणीय

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  2. तीनों लिंक्स बहुत बढ़िया ...
    शुभकामनायें ...सभी को ...

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  3. आभार महेंद्र जी ....इस सम्मान के लिए ...

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  4. तीनों ही लिंक्स बहुत अच्छे हैं रश्मि दी ...नियमित पढ़ती हूँ ...

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  5. चयन एवं प्रस्‍तुति ... अनुपम

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  6. महेंद्र जी का पक्ष सचमुच विचारणीय है | मैं भी यही सोचता हूँ कि यदि इंटरनेट कि दुनिया का इतना सशक्त माध्यम अगर सामजिक विकास में अपना सक्रीय य्ग्दान नहीं दे पा रहा , तो हम यहाँ सिर्फ समय बर्बाद कर रहे हैं | महेंद्र जी के वरिष्ठ ब्लोग्गर्स से किये गए अनुरोध में मैं भी शामिल हूँ |

    सादर

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