पुन: स्वागत है आप सभी का परिकल्पना उत्सव मे ........आगे बढ़ते हैं और लेते हैं आनंद वर्ष के कुछ महत्वपूर्ण ब्लॉग पोस्ट का ......


डॉ.मीनाक्षी स्वामी
My Photoएम ए पीएच डी समाजशास्त्र मध्यप्रदेश शासन मे प्राध्यापक चालीस पुस्तकें लगभग हर विधा मे हर वर्ग के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति के रुप में रचनाओं पर भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों एवं मध्य प्रदेश तथा उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा दो दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा फ़िल्म स्क्रिप्ट पर राष्ट्रीय पुरस्कार, केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा पं गोविंदवल्लभ पंत पुरस्कार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा भारतेंदू हरिश्चंद्र पुरस्कार संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा पं जवाहरलाल नेहरु पुरस्कार मध्यप्रदेश विधानसभा द्वारा डॉ भीमराव अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार आकाशवाणी नई दिल्ली द्वारा रुपक लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार महामहिम राज्यपाल मध्यप्रदेश तथा सहस्त्राब्दि विश्व हिंदी सम्मेलन में उत्कृष्ट लेखकीय योगदान के लिए सम्मानित मानव संसाधन मंत्रालय का राष्ट्रीय पुरस्कार उपन्यास "भूभल" पर अखिल भारतीय विद्वत् परिषद, वाराणसी द्वारा कादम्बरी पुरस्कार व मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार. उपन्यास "नतोहम्" पर मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार कई पुस्तकों का विभिन्न भारतीय भाषाओं व अंग्रेजी में अनुवाद। गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में एम.ए. पाठ्यक्रम में कहानी "धरती की डिबिया" शामिल . 

परिचय जड़ों की मजबूती बताती हैं .... जीवन से जुड़ी कहानी लेकर आई हूँ मैं आज इनकी यात्रा से -


दीपशिखा की निगाह घड़ी पर पड़ी, रात के ढाई बज रहे हैं । उसे अब तक नींद नहीं आ पाई है । रात ग्यारह बजे से वह सोने के लिए लेटी है । मगर साढ़े तीन घंटों से उसकी कोशिश जारी है और सफलता अभी तक नहीं मिल सकी है । घड़ियों की लगातार चल रही टिक...टिक...रात का सन्नाटा तोड़ रही है । दीपशिखा को लग रहा है, वह इसी शोर के कारण नहीं सो पा रही है ।  एक तो इस बड़े बेडरूम में दो दीवार घड़ियां हैं और पलंग के पास इधर, बिल्कुल कान के पास...सारी घड़ियों का  शोर...उफ... टिक...टिक...टिक...टिक...उसे शोर और तेज लगा । शायद पास के कमरों में लगी घड़ियों का शोर भी उसके कानों में पड़ने लगा । 

    हर कमरे में घड़ी जरूरी है । समय को साधने के लिए । फिर टेबल घड़ी अलार्म के लिए जरूरी है । उसे याद आया बचपन में घर में केवल एक घड़ी हुआ करती थी, केवल एक रिस्ट वॉच, वो भी बाबूजी दफतर लगाकर जाते थे । बाकी, समय देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी । मोटे तौर पर रेडियो कार्यक्रमों के आधार पर तथा बीच-बीच की गई समय की घोषणा से काम चल जाता था । फिर आसपास के बच्चों को स्कूल से आते-जाते देख समय का अंदाज हो जाता था और स्कूल सध जाता था । कभी देर नहीं हुई, परीक्षा में भी नहीं । 

    आसपास के कई घरों में से घड़ी केवल मोनू के यहां थी, पुराने जमाने की दीवार घड़ी, जो हर घंटे टन-टन करके बजती थी, जितनी बजी हो उतने घंटे । आसपास के सभी लोगों का काम उसके घंटे सुनकर चल जाता । फिर बीच में जरूरत पड़ी तो उन्हें आवाज देकर पूछ लिया । इसी बहाने बातचीत भी हो जाती । मगर यह पुरानी बात है, तब इतना धीरज और सहनशक्ति थी । न पूछने वालों को खीझ होती न बताने वालों को । तब तो किसी अजनबी के पास भी यदि घड़ी हो तो टाइम पूछने के बहाने बातचीत शुरू करने का अच्छा माध्यम हो जाती थी, घड़ी । 

    पर, उन दिनों यूं हर पल का हिसाब नहीं रखना होता था । अब तो टाइम पूछने जाने का भी टाइम नहीं है । बेडरूम में भी दो घड़ियां  दीपशिखा ने इसलिए लगा दी कि सिर घुमाकर टाइम देखने में दो पल भी बर्बाद न हों । आंख उठाई और टाईम देख लिया । 

    वो दिन कब हवा हो गए, दीपशिखा ने बहुत जोर डाला दिमाग पर, मगर याद नहीं आया । उसे बस याद आया नौकरी लगने, शादी होने के बाद से घड़ी के कांटों से जिंदगी बंध गई । सुबह यदि दो मिनिट भी देर हो गई तो पूरा दिन बेकार । बस छूट जाती, अगली बस दूर से लेना होता । पतिदेव की तो और मुश्किल, वे अपनी गाड़ी से जाते, मगर दो मिनिट की देरी उन्हें बड़े जाम में फंसा सकती थी । फिर बच्चों का स्कूल । उसे लगा शहर के बड़ा होने से ही ऐसा हुआ है ।

    आज उसकी सेवानिवृत्ति के बाद की पहली रात है । बच्चे नौकरियों पर बाहर हैं । पतिदेव दुनिया में नहीं हैं । सारी बातें उसे क्रम से याद आ रही हैं । नहीं आ रही है तो बस नींद । बीते बरस कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला और आज उनचालीस साल की नौकरी और साठ साल की उम्र पूरी करके फिर वह घड़ियों की टिक-टिक में उलझी है । दीपषिखा ने तय किया कि सुबह उठकर वह सबसे पहले सारी घड़ियों को हटा देगी । तभी उसे ख्याल आया, सुबह क्यों अभी क्यों नहीं । वह तुरंत उठी और उसने फुर्ती से सारी घड़ियों के सेल निकालकर उन्हें उतार दिया । घर में शांति फैल गई । वास्तव में यही टिक-टिक उसे चिड़चिड़ा किए दे रही थी, उसने सोचा । फिर आराम से लेट गई । सचमुच उसे नींद आ गई, घड़ियों का शोर बंद हो जाने से या रात बहुत बीत जाने से ।     सुबह दीपशिखा की नींद खुली तो धूप बेडरूम की खिड़की से उसके पलंग तक आ गई थी । आदतन उसकी निगाह दीवार पर गई । ओह ! वहां से तो घड़ी मैनें ही हटाई है । दीपशिखा को याद आया । अभी शायद नौ बजे होंगे । उसने पलंग तक आई धूप से अंदाज लगाया । हुंह । कितने भी बजे हों । अब मैं घड़ी के कांटों से आजाद हूं । वह जल्दी से दो-तीन कप चाय बना, केटली में भरकर ले लाई और वहीं पलंग पर टे् सहित रखकर आराम से पीने लगी । सचमुच घड़ियों के न होने से कितना सुकून लग रहा है । दीपशिखा सोच रही है । वरना अब तक तो जाने कितनी बार घड़ी पर निगाह जाती और वह चाय के साथ इतमीनान का लुत्फ नहीं ले पाती । चाय पीकर, घड़ी रहित बाथरूम में आराम से नहाकर वह बेफिक्री से देर तक तैयार होती रही । नहाने और तैयार होने में कितना समय लगा, उसे खुद नहीं पता और वह जानना भी नहीं चाहती है। मगर सच तो यह है कि घड़ियों को हटाकर भी वह घड़ियों से मुक्त नहीं हो पा रही है । 

    हां, वह घड़ियों के न होने से उपजे सुकून को हर पल महसूस कर रही है । तैयार होकर उसने हाथ में पहले आदतन घड़ी पहनी फिर निकाल दी । फिर घूमने के इरादे से बाहर निकल आई । बस या टेक्सी...कुछ पल सोचते हुए वह फिर मुसकाई । मन ही मन उसने तय किया कि जब कहीं पहुंचने की समय सीमा न हो तो बस से बेहतर कुछ नहीं । वह बस में बैठी । बैठती तो वह रोज भी थी । मगर आज की बात और है । आज बस से कहीं पहुंचने की जल्दी उसे जरा भी नहीं है । वह इतमीनान से बैठी है । खिड़की से बाहर का नजारा उसने आज ही देखा और महसूस किया । उसने बस में बैठे लोगों पर नजर डाली । सब लोग उसी बेचैनी में बैठे हैं, जिसमें कल तक वह बैठा करती थी । वे बार-बार घड़ी देखते हैं और खीझते हैं । सबको गन्तव्य तक पहुंचने की बेचैनी है । वह मुसकाई और उसने सोचा बेचैनी से बस की गति नहीं बढ़ती । फिर उसने पास में बैठी स्त्री को देखा । उससे बात करने की गरज से टाईम पूछा । मगर टाईम बताते ही वह स्त्री बहुत बेचैन हो गई । कुछ पल बाद खड़ी हो गई मानो उसके खड़े होने से बस जल्दी पहुंच जाएगी । 

    खैर । कई स्टॉप आए और गए । वह उतर सकती थी । मगर नहीं उतरी । वह आखिरी स्टॉप पर उतरी । सामने एक बड़ा शापिंग मॉल देख वह वहीं चल दी । भीतर जाते ही खाने की चीजों की बड़ी सी नामी दुकान देख उसे भूख लग आई । पेटपूजा कर वह वहीं मल्टीप्लेक्स की टिकिट खिड़की पर जा खड़ी हो गई । ‘‘अभी जो शो होने वाला है, उसी का टिकिट दे दो ।’’ उसने कहा तो बुकिंग क्लर्क चौंका । फिर बोला ‘‘एक शो अभी चल रहा है और अगले शो में अभी टाईम है ।’’ उफ, फिर आड़े आया ये टाईम । अपनी खीझ को परे झटक वह मुसकाई । उसने अगले शो का टिकिट ले लिया और इतमीनान से बाहर आकर प्रतीक्षा करने लगी । शो शुरू होने का अंदाज उसने दूसरे लोगों को थियेटर में जाते देखकर लगाया और वह भी चली गई । 

    फिल्म देखकर निकली तो पाया कि सूरज ढलने में अभी देर है । वह घर की ओर रवाना हुई और शाम होने के पहले पहुंच गई । बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए उसने पहली बार अपने घर से सूर्यास्त देखा और देर तक देखती रही । सब कुछ अंधेरे में डूबने के बाद जब सड़क की बत्तियां जली तब वह भीतर आई । लाइट जलाने के साथ ही उसकी निगाह, दीवार पर वहां पड़ी, जहां घड़ी नहीं थी । अब वह टाईम जानना चाहती थी क्योंकि अब उसे बिटिया के फोन का इंतजार था । रोज ठीक आठ बजे उसका फोन आता है । आठ बजने में कितना समय बाकी होगा, उसे जरा भी अंदाज नहीं हो पा रहा है । एक पल को घड़ी वापस लगाने का ख्याल आया, मगर इसके साथ ही खिझानेवाली टिक-टिक भी याद आ गई । उसने सोचा मोबाइल उठाकर घड़ी देखे पर यह विचार भी उसने झटक दिया । फिर उसने रिमोट उठाया और टी.वी. चालू कर दिया । मगर तभी लाइट चली गई । वह फिर बाहर आकर बैठ गई । पता नहीं कितने बजे हैं ! बिटिया का फोन कब आएगा ! लाइट कब आएगी ! समय पता होता तो काटना आसान होता शायद...। सोचती हुई वह उबने लगी । फिर फोन की घंटी बजी और दूसरी ओर से बेटी की आवाज सुनकर वह समझ गई कि रात के आठ बजे हैं । मगर फिर भी लंबे इंतजार की ऊब शब्दों में बदलकर निकली-‘‘आज बहुत देर हो गई...मुझे चिंता हो रही थी ।’’

‘‘ओह मां ठीक आठ बजे हैं चाहों तो घड़ी मिला लो ।’’ बेटी ने कहा तो वह फिर अपनी रौ में बह चली । घड़ियों से अपनी आजादी की बात बेटी को बताते हुए वह अतिरिक्त खुश थी । मां की खुशी में बेटी भी खुश हुई मगर घड़ियों से आजाद जिंदगी की कल्पना उसे अजीब लगी । पर वह कुछ नहीं बोली।

    फिर रात का खाना खाते हुए वह टी.वी. देखती रही । और जब रीपीट सीरीयल  शुरू हुए तो उसने टी.वी. बंद कर दिया और सोने की तैयारी करने लगी । बिस्तर पर लेटते ही आदतन उसकी नजर दीवार पर पड़ी । उसे सूनापन लगने लगा ।शांति उसे काटने लगी । घोर सन्नाटा । कैसा मनहूस लग रहा है । कुछ मिसिंग है । दीवारों पर बार-बार नजर जाती । घड़ी देखते हुए समय कट जाता है, और कुछ नहीं तो यही सोचकर कि तीन घंटे हो गए नींद नहीं आई या सुबह होने में चार घंटे बाकी हैं । उसे लगा टिक-टिक की लोरी सी सुनते हुए नींद कब आ जाती थी, पता ही नहीं चलता था । टिक-टिक में किसी के होने का एहसास था । कैसी लयबद्ध टिक-टिक आती थी, हर कमरे से...कैसा सुमधुर संगीत...। उसे घड़ियों की टिक-टिक याद आने लगी । उसने सोचा सुबह उठकर सबसे पहले सारी घड़ियां चालू करके लगाउंगी । तभी उसे ख्याल आया, सुबह क्यों, अभी क्यों नहीं । वह फौरन उठी और उसने फुर्ती से सब घड़ियों में सेल डालकर उन्हे उनकी जगह पर टांग दिया ।

और इस नीरवता में घड़ियों की टिक-टिक ने उसे जीवंतता के एहसास से भर दिया । उसे अपना घर अपना सा लगने लगा, और घड़ियां अपनी सहेलियां ।

नारी और उसकी आधुनिकता को लेकर सतवीर वर्मा ने एक तठस्थ नज़रिए की बानगी दी है -

आज की शिक्षा ना तो नारी के लिए और ना ही नर के लिए जीवन निर्माण में सहयोग देती है। आज की शिक्षा से सिर्फ पैसों के पीछे दौङ लगा सकते हैं पर जीवन जीने में वास्तविक आनन्द नहीं ले सकते। नारी ये सोचती है कि अगर हम ज्यादा पढेंगी तो हमारी उन्नति होगी। पर वो ये नहीं जानती कि प्रकृति नें उन्हें नारी बनाया है, ना कि पुरुष।

आधुनिक शिक्षा में डूबकर नारी अपना नारित्व खो रही है और पुरुष अपना पुरुषत्व। नारी स्वभाव से कोमल होती है और अपेक्षाकृत कठोर। घर से बाहर जाने पर कोमलता काम नहीं करती है। अस्तित्व बनाए रखने के लिए कठोरता होनी जरुरी है। ये कठोरता पुरुषों में प्रकृतिस्थ होती है जबकि नारी को उपार्जित करनी पङती है। दो कठोर हृदय कभी एक नहीं हो सकते। एक को कोमल बनना पङता है।

चूँकि पुरुष स्वभावतः कठोर प्रकृति के होते हैं, और अगर नारी भी कठोरता अपनाने लगेगी तो टकराव निश्चित है। टकराव से हमेशा विनाश होता है सृजन नहीं। नर और नारी का आवरण ही उनका शील है। अगर आवरण या पर्दा नहीं रहेगा तो शील के लिए कहाँ जगह बचती है। तब तो एक जानवर और इन्सान में कोई फर्क नहीं रहेगा।

आज कहा जा रहा है कि बच्चों को यौन शिक्षा देना जरुरी है। पर मैं कहता हूँ कि बच्चों को यौन शिक्षा की कोई जरुरी नहीं बल्कि नैतिक शिक्षा की जरुरत है। यौन शिक्षा से बच्चा बहुत जल्दी परिपक्व हो जाता है और चूँकि ये विषय बहुत आकर्षक होता है इसलिए बच्चे इस पर प्रायोगिक करके देखते हैं। ये प्रायोगिक आजकल हर गाँव या शहर में हो रहे हैं।

हमारी शिक्षा अँग्रेजी संस्कृति से प्रभावित है। जब अँग्रेज इतने बुरे थे तो उनके द्वारा स्थापित शिक्षा क्या अच्छी हो सकती है? हमारा भविष्य अँग्रेजी शिक्षा मेँ नहीं बल्कि स्वदेशी शिक्षा में है। किसी भी अँग्रेजी माध्यम विद्यालय में भारतीय संस्कृति के बारे में नहीं बतलाया जाता है बल्कि अँग्रेजी संस्कृति के बारे में बताया जाता है। हमारा भला अँग्रेजी शिक्षा से नहीं हो सकता।

आज लगभग हर स्कूली बच्चे के पास उत्तम क्वालिटि का मोबाइल मिल जाएगा। एक पढने वाले बच्चे या बच्ची के पास मोबाइल क्या काम आ सकता है। वो अपनी पढाई पर ध्यान ना देकर गेम, गाने, मैसेज, फालतू बातें करता है। प्रेम कहानियाँ इसी मोबाइल की वजह से ज्यादा अस्तित्त्व में आयी हैँ। मोबाइल की वजह से ही अश्लीलता ज्यादा बढी है। बच्चों के हाथ में मोबाइल नहीं देना चाहिए।

एक नारी को बच्चा जनने की शक्ति प्रकृति नें दी है। साथ ही उस बच्चे का पालन पोषण करने के लिए कोमल भावनाएँ दी हैं। हम प्रकृति के खिलाफ जाकर क्यों नारी को एक पुरुष बना रहे हैं। पुरुष अब तक एक पुरुष ही है जबकि नारी अपने नारित्व को मिटाकर पुरुषत्व अपनाने की चेष्टा कर रही है। जबकि पुरुष अपने पुरुषत्व में ही खुश है। एक नारी की इज्जत उसके नारित्व से होती है ना कि उसके पुरुषत्व से। अगर दोनों ही पुरुष के गुणों से युक्त हो जाएँगे तो सृष्टि का निर्माण कैसे होगा?

नारी के इस पुरुषत्व अपनाने के पीछे हमारा समाज भी जिम्मेदार हैं। अगर नारी को गुजरे जमाने में इतनी हीन ना समझा जाता (जैसा कि अरब या कुछ देशों में समझा जाता है।) तो आज नारी अपने नारीत्व के गुणों के साथ जी रही होती।

बच्चों में आज जो संस्कृति घर कर रही है उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हम खुद व हमारी शिक्षा पद्धति है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे अँग्रेजी माध्यम में पढें ताकि बहुत से पैसे कमाए और सबसे आगे मेरा बच्चा हो। हम ये नहीं देखते कि अँग्रेजी माध्यम में जाकर पढने वाले बच्चे अपने माता पिता की कम जबकि खुद की ज्यादा सोचते हैं। अँग्रेजी माध्यम में पढने वाले बच्चे अपनी संस्कृति से बिल्कुल भी लगाव नहीं रखते हैं। जब वो खुद ऐसे होंगे तो सोचिए उनके बच्चे क्या करेंगे आगे जाकर। बच्चे हमेशा अपने माँ बाप से दो कदम आगे रहते हैं।

बच्चों को अगर अपनी मातृभाषा के स्कूल में शिक्षा दी जाए तो पाश्चात्य संस्कृति हम पर हावी नहीं होगी। पाश्चात्य देशों में नारी के पास पैसा मिल जाएगा पर सुख, पति, इज्जत नहीं मिलेगी। एक लङकी को अगर कहा जाए कि पूरे कपङे पहना करो तो वो इसे अपना अपमान समझती है। जबकि एक इन्सान की इज्जत कपङों से ही होती है। एक पुरुष कभी आधे कपङे पहनकर बाजार या कार्यालय नहीं जाता पर एक स्त्री जाती है। उन छोटे कपङों में वह खुद को दूसरों की नजरों में आकर्षक दिखने के लिए पहनती है ना कि सुरक्षा के लिए। जहाँ पुरुष बाहर रहता है और स्त्री घर पर रहती है वो वैवाहिक जीवन अपेक्षाकृत शान्त होता है उनसे, जहाँ दोनों नर नारी बाहर रहते हैं। अगर नारी बाहर रहेगी तो बच्चा कमजोर रहता है। बच्चे को सही शिक्षा नहीं मिल पाएगी। बच्चे का पूर्ण विकास माँ पर निर्भर करता है। अगर बच्चे की माँ बच्चे के साथ शुरुआती पाँच साल साथ रहती है तो वो बच्चा उन बच्चों से ज्यादा संस्कारित है जिनके माता पिता उनको हॉस्टल में रखते हैं या नौकरी की वजह से बच्चे के पास ज्यादा समय नहीं बिता पाते।

मैं ये नहीं कहता कि नारी का घर से बाहर निकलना गलत है या पढना गलत है। पर एक अच्छी शिक्षा नारी को और नारी से होते हुए बच्चों तक को अच्छा सुसंस्कृत बनाती है। आधुनिक शिक्षा के बहकावे मेँ आकर अपने नारीत्व को बलिदान मत कीजिए। अपने आवरण के द्वारा ही अपनी योग्यता प्रदर्शित कीजिए ना कि आवरण हटाकर।

विचारों का सैलाब उन तिनकों को भी समेट लाता है,जिन्हें हम बेकार समझते हैं ...... समुद्र मंथन ने बताया कि मंथन में देवताओं और असुरों का सम्मिलित सहयोग अपेक्षित था .... पर एक स्वाभाविक स्थिति से कोई इधर उधर हो जाये तो वह ग्राह्य नहीं होता 

कहीं मत जाईएगा, आज के उत्सव मे कई  आयाम देने अभी शेष हैं । मध्यांतर की बात करें उससे पहले चलिये आपको मिलवाती हूँ आज के उत्सव के मुख्य अतिथि हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रताप सहगल जी से .....उनसे बातचीत करने जा रहे हैं युवा कवि ललित लालित्य .........यहाँ किलिक करें 

मैं मिलती हूँ एक अल्प विराम के बाद ......

10 comments:

  1. ...आप के विचारों से सहमत हूँ!

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  2. मिनाक्षी जी की कहानी को पढ़िए और गुलज़ार साब की ये नज्म गुनगुनाइए -
    "जी ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन "

    सादर

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  3. विचारों का सैलाब उन तिनकों को भी समेट लाता है,जिन्हें हम बेकार समझते हैं ... बिल्‍कुल सच
    बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार

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  4. विचारों का सैलाब उन तिनकों को भी समेट लाता है,जिन्हें हम बेकार समझते हैं ... बिल्‍कुल सच
    बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार

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  5. सतवीर ळिरकाली कि विचारोँ से मैँ पूर्णत: सहमत हूँ। नर-नारी मेँ जो भावनात्मक अंतर है वह जरुरी है, उसी से दोनोँ की पहचान है। वर्तमान बच्चे तो 'इलेक्ट्रोनिक बेब्बी' बन गये।
    www.yuvaam.blogspot.­com

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  6. । आधुनिक शिक्षा के बहकावे मेँ आकर अपने नारीत्व को बलिदान मत कीजिए। अपने आवरण के द्वारा ही अपनी योग्यता प्रदर्शित कीजिए ना कि आवरण हटाकर

    बहुत सही लिखा है ॥
    रश्मि दी दोनों कहानियाँ बहुत बढ़िया हैं ...
    लाजवाब लिंक चयन ...

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  7. घड़ी की टिक टिक ही जीवन बन गयी है...मीनाक्षी जी की बहुत सुन्दर कहानी...

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