भावों का रेला जब उठता है तो 
एक नहीं कई बार शब्द गम हो जाते हैं ....
सिरहाने,दीवारों की पीछे,दाना चुगती चिड़िया की चोंच में 
खिड़की से छनकर आती रश्मियों में 
चांदनी में 
घुप्प अँधेरे में 
मन के कोलाहल में 
बाहर के शोर में ............ उफ़ कहाँ कहाँ नहीं ढूंढता रचनाकार शब्दों को 
ताकि एहसासों के समंदर में खुद की परछाईं को बढ़ा सके 
शब्दों से निर्मित चप्पुओं से ...

आइये गुजरें इस खेल से =
माँगा था सुख, दुख सहने की क्षमता पाया,
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।

पता नहीं कैसे, हमने रच दी है, सुख की परिभाषा,
पता नहीं कैसे, जगती है, संचित स्वप्नों की आशा,
पता नहीं जीवन के पथ की राह कहाँ, क्या आगत है,
पता नहीं किसका श्रम शापित, किन अपनों का स्वागत है,
सुख, संदोहन या भिक्षाटन या दोनों की सम्मिलित छाया। 
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।१।

मन की स्याह, अकेली रातें, घूम रहा मन एकाकी,
निपट अकेला जीवन उपक्रम, यद्यपि संग रहे साथी,
सुख के स्रोत सदा ही औरों पर आश्रित थे, जीवित थे,
सबके घट उतने खाली थे, कैसे हम अपने भरते,
सुख, आश्वासन अपने मन का या आश्रय का अर्थ समाया।
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।२।

सुख के हर एकल प्रयास में कुछ न कुछ तो पाया है,
विघ्न पार कर, सतत यत्न कर, मन का मान बढ़ाया है,
ना पाये आनन्द, नहीं मिल पाये जो सब चाह रहा,
श्यामवर्णयुत अपना ही है, जो अँधियारा स्याह रहा,
नहीं व्यर्थ कोई श्रम दिखता, जीवन का हर रंग लुभाया।
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।३।

गहरी चोट वहीं पर खायी, जो मन में गहराये थे,
पीड़ा उन तथ्यों में थी जो उत्सुकता बन छाये थे,
जिनकी आँखों में स्वप्न धरे, उनकी आँखें लख नीर बहा,
जिनके काँधों पर सर रखा, उनसे त्यक्ता, उपहास सहा,   
सागर की गहराई समझा, ज्यों ज्यों खारा नीर बहाया ।
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।४।

मेरे जैसे कितने ही जन, सुख की आशायें पाले,
अर्थ प्राप्ति ही सुख का उद्गम, साँचों में समुचित ढाले,
कितने जन इस अनगढ़ क्रम में, वर्षों से रहते आये,
कुछ समझे, कुछ समझ रहे हैं, अनुभव जो सहते आये,
दीनबन्धु की दुनिया, संग में, आज स्वयं को जुड़ते पाया ।
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।५।

सुख दुख की सर्दी गर्मी सह, जी लूँ मैं निर्द्वन्द्व रहूँ,
प्रतिपल उकसाती धारायें, क्यों विचलित, निश्चेष्ट बहूँ,
हर प्रयत्न का फल जीवन भर, नीरवता से पूर्ण रहे,
मन में शक्ति रहे बस इतनी, सतत प्राप्ति-उद्वेग सहे,
मा फलेषु का ज्ञान कार्मिक, अनुभव घट जाकर भर लाया।
कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।६।

Love: रचनाकार की मनोदशा(रेवा)

जब शब्द न मिले 
एहसास कहीं खो जाये 
हर चीज़ धुँधली हो जाये 
My Photoहर ओर निराशा नज़र आये ,
दिल कुछ और बोले 
दिमाग कुछ और राह दिखाए ,
तो रचनाकार रचना कैसे करे ?
और अगर रचना न करे 
तो जीये कैसे ? 
रचनाकार की तो ज़िन्दगी ही होती है न 
उसकी रचना ..........

बस रिश्तों को ढोते हैं...(अखिल http://akhilesh-akhil.blogspot.in/)

प्यार का बीज जाने कौनसी मिट्टी में बोते हैं,
साथ रह कर भी कई लोग बस रिश्तों को ढोते हैं.

कोई कोशिश नहीं होती दूरियों को मिटाने की,
किसी उलझे हुए धागे में बस मोती पिरोते हैं.
इंसानी मरासिम में वो गरमी कहाँ रही,
रिश्ते भी महज़ कागजों में दर्ज होते हैं.

My Photoबेवफाई फिर उन्हें इतना सताती है,
दामन के दाग उम्र भर अश्कों से धोते हैं.

मुकरर्र है वक़्त हर एक हरकत का जहाँ में,
रात भर जगते हैं जो लोग दिन में सोते हैं.

मय-परस्ती इक बला है जानते हैं सब,
शिद्दत से पैमाने में सब खुद को डुबोते हैं.


अरे ! ये तो मेरे अपने हैं ,
पर क्यों अब हम,
उन्हें मीठे नहीं लगते |
रिश्तों की इमारत से,
हमने तो कोई पाया नहीं खींचा ,
हाँ अनुपात ज़रूर एक,
एक का कर लिया था |
पर शायद यह इमारत,
उनकी सपनों  की इमारत ,
का एलिवेशन बिगाड़ रही थी ,
सो बड़े प्यार से,
अपने हिस्से के पाए ,
उन्होंने खिसका लिए |
और अब जब,
हमारे रिश्तों की ,
इमारत ढही ,
तो वह भी,
उनकी ही तरफ ढही |
मेरे पाए अब भी,
जस के तस हैं ,
पर वह कहते हैं ,
यह इमारत तो,
खँडहर हो गई |
मैं कहता हूँ ,
ढही  इमारत ,
के खंडहर भी ,
ख़ूबसूरत और आकर्षक ,
लगतें है ,
अगर देखने वाला ,
उनमें बची साँसों को ,
महसूस कर पाए |
पर शायद उन्हें तो ,
फितरत है ,
हर रोज ,
नई इमारतों की ,
और ऊब से गए है ,
ढोते ढोते बासी ,
रिश्तो को ।

यह क्रम आगे भी जारी रहेगा , एक मध्यांतर लूँ उससे पहले मैं आपको ले चलती हूँ वटवृक्ष पर जहां सुशील कुमार उपस्थित हैं अपनी कुछ क्षणिकाओं के साथ ...यहाँ किलिक करें 

12 comments:

  1. परिकल्पना के साथ साथ सभी को दिल से शुभकामनाएँ

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  2. प्यार का बीज जाने कौनसी मिट्टी में बोते हैं,
    साथ रह कर भी कई लोग बस रिश्तों को ढोते हैं.
    कोई कोशिश नहीं होती दूरियों को मिटाने की,
    किसी उलझे हुए धागे में बस मोती पिरोते हैं.
    इंसानी मरासिम में वो गरमी कहाँ रही,
    रिश्ते भी महज़ कागजों में दर्ज होते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. माँगा था सुख, दुख सहने की क्षमता पाया,
    कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया ।
    सभी रचनाओं का चयन एवं प्रस्‍तुति नि:शब्‍द करती हुई ...
    बधाई सहित अनंत शुभकामनाएं

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  4. आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (15-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. DIDI mujhe inmay shamil karne kay liye bahut bahut shukriya.....sabhi rachnayein bahut acchi hain....

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  6. सभी रचनाएँ बहुत सुंदर हैं !
    मैनें काफ़ी कुछ miss कर दिया ! शहर से बाहर जाने, और वापस आकर तबीयत खराब होने के कारण मैं online ही नहीं आई... :(
    ~सादर!!!

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  7. सभी रचनाएँ बहुत ही बेहतरीन है..
    अति उत्तम...
    :-)

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  8. कैसे कह दूँ , वापस खली हाथ मैं आया , बहुत उम्दा रचना |

    सादर

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  9. Ek-ek kavita moti ke saman hai jo lakho sipiyon me se dhundh ke nikali gayi hain... Bahot khoob...
    Yaha mere blog ka bhi link share kar raha hu, ek baar zarur dekhe aur agar koi kavita achchhi lage to apne blog me jagah zarur de... http://kavya-srijan.blogspot.in/

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