औरतें - 
रिश्ते अपनी जगह, नियति समाज की देन
ये समाज - फिर वही प्रश्न चीख बनकर गले में फंसा है 
अरे आखिर यह समाज हम सही क्यूँ नहीं बना पाते 
हम सिर्फ किताबी बातें करते हैं घर के अन्दर 
और बाहर खुली हवा में कृत्रिम अंदाज में सर हिलाते हैं ...
आज भी ऐसे लोगों की भीड़ हैं 
जो मुक्त नहीं अपनी पीड़ा से 
'समाज क्या कहेगा'
बच्चों की शादी कैसे होगी !'
विधवा का साज श्रृंगार अशोभनीय है 
पुरुषों को रिझाने के लिए .............. बेचारे पुरुष !
रीझ ही जाते हैं - बेचारे जो हैं !
तलाकशुदा !
फंसाने की ताक में रहती है !!
रात दिन की कलह के बाद 
सोलह श्रृंगार किये जो दिखे 
वह पतिव्रता !!!
कोई नहीं हो सकता मुक्त 
चीखते रहो - इंकलाब .....
अरे इंकलाब अपने आँगन के परिवर्तन से होता है 
अपनी दृढ़ता 
किसी एक का हौसला बन पाती है 
जनसंख्या के हिसाब से सोचिये 
अपने कदम बढ़ाइए 
इसकी बेटी उसकी बेटी की कहानी बंद कीजिये 
सिर्फ खुद को देखिये - कहाँ कमी है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!

 

रश्मि प्रभा 
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आज बहुत याद आ रही हैं वे
मेरे घर कि औरतें

बहन

एक बहन थी छोटी
उस वक्त की नीली आँखें याद आती हैं
ब्याह दी गई जल्दी ही
गौना नहीं हुआ था अभी
पति मर गया उसका 

इक्कीसवीं सदी में
तेजी से विकासशील और परिवर्तनशील इस समाज में
ब्राह्मण की बेटी का नहीं होता दूसरा ब्याह
पिता, भाई, परिवार के रहम पर जीना था उसे

नियति के इस खेल को
बीते बारह सालों से झेल रही थी वह
अब मर गई

फाँसी पर झूलने के ठीक पहले
कौनसा विचार आया होगा उसके मन में आखिरी बार

क्या जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं रहा था
जिसके मोह ने उसे रोक लिया होता

मात्र तीस साल की उम्र में
क्या ऐसा कोई भी सुख नहीं था
जिसे याद कर उसे
जीने की इच्छा हुई होती
फिर एक बार

मासी

बडी मासी से सबको डर लगता था
कोई भरोसा नही था उनके मिजाज़ का
घर की छोटी मोटी बातों में
सबसे अलग रखती थी राय

मासी अब नहीं रही
मासी की मौत जल कर हुई थी
कहते हैं उस वक्त घर में सब लोग छत पर सो रहे थे
सुबह चार बजे अकेले रसोई में क्या करने गई थी मासी
अगर पानी पीने के लिए उठी थी
तो चूल्हा जलाने की क्या ज़रूरत आ पड़ी थी
क्या सच में मौसा तुम्हें छत पर न पाकर रसोई में आए थे
क्या सच में उनके हाथ आग बुझाने की कोशिश में जले थे...

आज बहुत बरस गुज़र गए
तुम्हारी मौत को भी कई ज़माने हुए

अपनी साफगोई
अपने प्रतिवादों की
कीमत चुकाई तुमने
दुनिया के आगे रोए नहीं तुमने अपने दुख
पति की शराबखोरी और बेवफायी से लड़ती थी अपने अन्दर
और बाहर सबको लगता था
तुम उनसे झगड़ रही हो

तुमने जब देखा किसी स्त्री को उम्मीद से
हमेशा उसे पुत्रवती होने का दिया आशिर्वाद
तुम कहती थी
लड़कियाँ क्या इसलिए पैदा हों
ताकि उन्हें पैदा होने के दुख
उठाने पडें
इस तरह

बुआ

सोलहवाँ साल
जब आईने को निहारते जाने को मन करता है
जब आँचल को सितारों से सजाने का मन करता है
जब पंख लग जाते हैं सपनो को
जो खुद पर इतराने
सजने, सँवरने के दिन होते हैं
उन दिनों में सिंगार उतर गया था
बुआ का

गोद में नवजात बेटी को लेकर
धूसर हरे ओढ़ने में घर लौट आई थी
फूफा की मौत के कारण जानना बेमानी हैं
बुआ बाल विधवा हुई थी
यही सच था

वैधव्य का अकेलापन स्त्रियों को ही भोगना होता है
विधुर ताऊजी के लिए जल्दी ही मिल गई थी
नई नवेली दुल्हन
बूढे पति को अपने कमसिन इशारों से साध लिया था उसने
इसलिए सारे घर की आँख की किरकिरी कहलाई
लेकिन लड़कियों से भरे गरीब घर में पैदा हुई
नई ताई ने शायद जल्दी ही सीख लिया था
जीवन में मिलने वाले दुखों को
कैसे नचाना है अपने इशारों पर
और कब खुद नाचना है

नानी

अपने से दोगुनी उम्र के नाना को ब्याह कर लाई गई थी नानी
ससुराल में उनसे बड़ी थी
उनकी बेटियों की उम्र
जब हमउम्र बेटे नानी को
माँ कह कर पुकारते थे
तो क्या कलेजे में
हाहाकार नहीं उठता होगा

कहते हैं हाथ छूट जाता था नाना का
बडे गुस्सैल थे नाना
समाज में बड़ा दबदबा था
जवानी में विधवा हो गई नानी
सारी उम्र ढोती रही नाना के दबदबे को
अपने कंधों पर

गालियों और गुस्से को हथियार की तरह पहन लिया था उसने
मानो धूसर भूरी ओढ़नी
शृंगार विहीनता और अभाव
कम पडते हों
अकेली स्त्री के यौवन को दुनिया की नज़रों से बचाने
और आत्मसम्मान के साथ जीने को

जवानी में बूढ़े पति
और बुढ़ापे में जवान बेटों के आगे लाचार रही तुम
छत से पैर फिसला तुम्हारा
फिर भी जीवन से मोह नहीं छूटा
हस्पताल में रही कोमा में पूरे एक महिने तक
आखिर पोते के जन्म की खबर के साथ
मिला तुम्हारी मृत्यु का समाचार

मामी

कोई भी तो चेहरा नहीं याद आता ऐसा
जिस पर दुख की काली परछाइयाँ न हों
युवा मामी का झुर्रियों से भरा चेहरा देखती हूँ
तो याद आते हैं वे दिन
जब इसके रूप पर मोहित मामा
नहीं गया परदेस पैसा कमाने
बेरोजगारी के दिनो में पैदा किए उन्होंने
सात बच्चे

चाची

चाची रेडियो नही सुनती है अब
नाचना तो जैसे जानती ही नहीं थी कभी

पडौस के गाँव से
बडे उल्लास के साथ लाई थी दादी
सबसे छोटे लाड़ले बेटे के लिए
होनहार बहू
गाँव भर में चर्चा में होते थे
स्कूल में गाए उसके गाने और उसके नाच
चाची
जो सब पर यकीन कर लेती थी
अब सब तरफ लोग कातिल नज़र आते हैं
या दिखाई देते हैं उसे
सजिशों मे संलग्न

कहा था बडे बाबा ने एक दिन
इस घर की औरतों के नसीब में नहीं है सुख
आज याद आ रही हैं वे सब
जिन्होंने अपने परिवार के पुरुषों
के सुखों के लिए लगाया अपना जीवन
और ढोती रही दुख
अपने अपने नसीब के
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देवयानी 

16 comments:

  1. नारी के हर रूप में छिपी पीड़ा का सूक्ष्म अवलोकन और अभिव्यक्ति ...भावुक करती रचना .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. नारी के हर रूप में छिपी पीड़ा का सूक्ष्म अवलोकन और अभिव्यक्ति ...भावुक करती रचना .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल झकझोर कर रख दिया !
    जाने कितने घरों का सच होगा ये... :(
    हमारे यहाँ हर बार स्त्री ही क्यों सलीब पर चढ़ती है.....~यही सवाल आजकल दिमाग़ में घूमता रहता है...
    ~सादर!!!

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  4. इन सभी रचनाओं को पढ़कर यह अहसास हुआ की एक अकेली औरत का जीवन एक अभिशाप है ...लेकिन क्यों ...इतने सालों बाद भी हम क्यों नहीं कुरीतियाँ त्याग देते ...क्यों आज भी उसका एक सिरा हर घर के आँगन तक पहुंचा मिलता है ......वह जो हर एक की ख़ुशी का ख़याल रखती है ...क्या उसकी ख़ुशी ....किसी की ज़िम्मेदारी नहीं ......बहुत सुन्दर रचनायें ...हर रचना गहरे उतरती हुई

    उत्तर देंहटाएं
  5. चीखते रहो - इंकलाब .....
    अरे इंकलाब अपने आँगन के परिवर्तन से होता है
    अपनी दृढ़ता
    किसी एक का हौसला बन पाती है
    नि:शब्‍द करते रचना के भाव ... बेहद सशक्‍त लेखन
    सादर

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  6. आस पास कितनी ही मिल जाती हैं ये व्यथित औरतें...घर से सुधार की शुरुआत ही समाज को सुधारेगी|

    उत्तर देंहटाएं
  7. इन सभी रचनाओं को पढ़कर यह अहसास हुआ की एक अकेली औरत का जीवन एक अभिशाप है ...लेकिन क्यों ...इतने सालों बाद भी हम क्यों नहीं कुरीतियाँ त्याग देते ...क्यों आज भी उसका एक सिरा हर घर के आँगन तक पहुंचा मिलता है ......वह जो हर एक की ख़ुशी का ख़याल रखती है ...क्या उसकी ख़ुशी ....किसी की ज़िम्मेदारी नहीं ......बहुत सुन्दर रचनायें ...हर रचना गहरे उतरती हुई

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  8. बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  9. नारी के हर रूप के पीड़ा के कारण समाज में चली आ रही कुरीतियाँ और उसके रक्षक है दबंग लोग,रस्मी प्रभा जी के शब्द
    " अपने कदम बढ़ाइए
    इसकी बेटी उसकी बेटी की कहानी बंद कीजिये
    सिर्फ खुद को देखिये - कहाँ कमी है !!!!!!!!!!!!!!!!!!!"
    को अपनाने से ही समाज आगे बाद सकता है .

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  10. "लड़कियाँ क्या इसलिए पैदा हों
    ताकि उन्हें पैदा होने के दुख
    उठाने पडें
    इस तरह"
    ये बहुत कडुवा सच है | माना मेरी बेटी/बहन मेरे घर में सुखी है लेकिन क्या जिस घर में वो जा रही है उस घर में भी वही माहौल है , माना कि उस घर में भी वही माहौल है , वहाँ भी वो सुखी है लेकिन जहां वो उठती-बैठती है आती-जाती है वहाँ भी वही मानसिकता है जैसी हम कल्पना करते हैं , मानसिकता बदलनी ही होगी |

    सादर

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  11. रश्मि जी ...आज एक-एक रचना पढ़ी ..बहुत ध्यान से ... भटकने ही नहीं दिया आपने..ऐसा लगा मनो सबकी कहानी आँखों के आगे घूम रही है... बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना!

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  12. सुधार घर से ही शुरु हो..सच है..

    उत्तर देंहटाएं

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