न नारी मुक्त है न पुरुष - दोनों आधार हैं , पूरक हैं - सृष्टि का आरम्भ ही दोनों के साथ है . पुरुष सुरक्षा , नारी अन्नपूर्णा .... पर आतंक तो कहीं भी होता है अति का . पहले नारियों की संख्या अधिक थी , आज पुरूषों की है . व्यथा दोनों की एक सी है .... 'नारी की समझदारी ' और ' नारी मुक्ति ' के अर्थ अलग अलग हैं . किससे मुक्ति और किसे ? पति से मुक्ति या बेटे से ? जहाँ त्रिया चरित्र का संक्रमण होता है - वहाँ कभी माँ, पत्नी के बीच बेटे - पति की स्थिति को किसी ने समझा है ? उसे किससे मुक्ति चाहिए ? ...... ' घर को घर बनायें , एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें " कहना ये चाहिए . ' अति ' जिसके भी साथ हो , उसे सोचना ही चाहिए .

भाई उठा बहन के लिए या बहन उठी भाई के लिए - यह प्रसंग ही बेकार है ! परिवार होता क्यूँ है ? क्या सभी बोल पाते हैं ?

अगर मैंने सही ज़िन्दगी नहीं पायी तो क्या बेटी को यह कहूँ कि पहले दिन से अपना राग रखना ? ' नहीं - ' मुक्त होना है गलत विचारों से , अन्याय से .... न कि पुरुष से या पत्नी से '

नारी शोषण सबसे अधिक नारी करती है... बेटे को भड़काती है , बेटी को बजाये विनम्रता सिखाने के कहती है कि पति को जूते की नोक पर रखना . ' अन्याय नहीं सहना चाहिए , बात बस यही प्रमुख है और वह भी पहले दिन ही इसे नहीं तय कर सकते . किसी आग से बचकर निकलने में वक़्त लग जाता है ! 

विरोध करने से पूर्व माँ-बाप की स्थिति याद आती है , बच्चों का भविष्य सामने आता है , समाज के बीच की स्थिति डराती है कम उम्र में ............. पर मरने की ही नौबत हो तो निर्णय ज़रूरी है और वहाँ भी बच्चों के संस्कार को बनाये रखने के लिए ही . जन्म देना - ईश्वर के द्वारा माँ को यानि एक स्त्री को ईश्वरत्व देना है .... ' माँ ' किसी हाल में असुर नहीं बनती .

    रश्मि प्रभा 



नारी न भाये

कन्या पूजन करते हैं सब
पर कन्या ही न भाये
जन्में कन्या कहीं किसी के 
तो सब शोक मनायें ।

कन्या हुई तो दहेज की चिंता
पहले दिन से ही डराये
हो गई शादी अगर तो
दहेज के लिए फिर जलाये ।

नारी के बढ़ते कदम
किसी को भी न भायें 
घर बाहर सब जगह
विरूद्ध बात बनायें ।

नारी से सब डरते हैं
पर पीछे-पीछे मरते हैं
संसद में कर हंगामा
परकटी, सीटीमार कहते हैं ।

अब भैया तुम्हीं बताओ
नारी कहाँ पर जाये
नारी के बिना ये दुनिया
क्या एक कदम चल पाये।


स्त्री-पुरुष विभेद की मानसिकता

स्त्री और पुरुष में विभेद की मानसिकता बाल-मन में कैसे आती है, यह सवाल लम्बे समय से उठ रह है। हमारा परिवार, परिवेश और स्कूली शिक्षा कहीं-न-कहीं जाने या अनजाने ऐसी बातों को बढ़ावा देते हैं।  ऐसे में जरुरी है कि इस मानसिकता में बदलाव के लिए पहल की जाए। यहाँ तक कि स्कूली पाठ्यक्रम में यह विभेद खुलकर प्रतिबिंबित होता है। आज जब स्त्री-पुरुष दोनों कदम से कदम मिलकर हर क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, ऐसे में पुस्तकों के  अध्यायों में  नारी  को केवल घरेलू कामकाजी महिला के रूप में दर्शाया जाता है और पुरुष को ऑफिस में कार्य करते।  कई बार ये पुस्तकें स्त्री की छवि को केवल नर्स, डाक्टर या फिर टीचर तक सीमित करने का काम करती हैं, जबकि पुरूषों को पायलट, कलाकार, अंतरिक्ष यात्री, जादूगर, शासक, डाकिया, सब्जी विक्रेता, मोची, लाइब्रेरियन, ड्राइवर, नाटककार, संगीतकार, एथलीट, विद्वान, पहलवान, पुलिसमैन, खिलाड़ी आदि के रूप में दिखाया जाता है।  

 ऐसे में एक पहल के तहत  केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद ने कक्षा एक से पांँच तक की अपनी एनसीईआरटी पाठ्य पुस्तकों से ऐसे शब्दों और चित्रों को हटाने का फैसला किया है जिनसे लिंगभेद की बू आती हो। मसलन, हिंदी की कविता ’पगड़ी’ और ’पतंग’  औरत की नकारात्मक छवि दर्शाती है। पतंग में यह दिखाने की कोशिश  की गई है कि पतंग केवल लड़के ही उड़ा सकते हैं। इसी प्रकार एनसीईआरटी की कक्षा तीन की पर्यावरण पुस्तक में एक औरत को कुंँए से पानी खींचते हुए दिखाया गया है। मानो यह काम सिर्फ महिलाओं का ही हो। विभेद को ख़त्म करने के लिये परिषद द्वारा मिल्कमैन, पुलिसमैन जैसे शब्दों की बजाय अब पाठ्यपुस्तकों में मिल्कपर्सन, पुलिसपर्सन जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाएगा। 

वस्तुत: एनसीईआरटी के डिपार्टमेंट आॅफ वुमेन्स स्टडीज ने इस पर व्यापक शोध करने के बाद ऐसे शब्दों और चित्रों को पाठ्यपुस्तकों से हटाने का निर्णय लिया है। एनसीईआरटी का मानना है कि इससे स्कूली बच्चे इन फर्क के बारे में सोचेंगे नहीं और लड़का-लड़की का फर्क कम से कम किताबों में न झलके। परिवर्तन गणित, अंग्रेजी, हिंदी और कहानी की किताबों में किया गया है। कहानियों का चयन भी ऐसा होगा जिससे लिंग समानता की सीख मिले। वैसे तमाम महिला संगठन इस बात की लंबे अरसे से मांग करती आ रही हैं कि ऐसे शब्दों के प्रयोग पर बैन लगे जिनसे पुरूष प्रधानता की दुर्गंध आती है। खैर, देर से ही सही पर इस एक कदम से कइयों की मानसिकता तो जरुर बदलेगी !!

अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस : परिवार की महत्ता

परिवार की महत्ता से कोई भी इंकार नहीं कर सकता।  रिश्तों के ताने-बाने और उनसे उत्पन्न मधुरता, स्नेह और प्यार का सम्बल ही परिवार का आधार है।  परिवार एकल हो या संयुक्त, पर रिश्तों की ठोस बुनियाद ही उन्हें ताजगी प्रदान करती है।  आजकल रिश्तों को लेकर मातृ दिवस, पिता दिवस और भी कई दिवस मनाये जाते हैं, पर आज इन सबको एकीकार करता हुआ ''अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस'' मनाया जाता है।  परिवार का साथ व्यक्ति को सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक दृष्टि से भी मजबूत रखता है। परिवार के सदस्य  ही व्यक्ति को सही-गलत जैसी चीजों के बारे में समझाते हैं।  

परिवार की इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1993 में एक प्रस्ताव पारित कर प्रत्येक वर्ष 15 मई को अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।  वस्तुत : अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस परिवारों से जुड़े मसलों के प्रति लोगों को जागरुक करने और परिवारों को प्रभावित करने वाले आर्थिक, सामाजिक दृष्टिकोणों के प्रति ध्यान आकर्षित करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है.

Akanksha Yadav : आकांक्षा यादवउपभोक्तावाद एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या के इस दौर में जहाँ कुछ लोग अपने को एकाकी समझकर तनाव, डिप्रेशन और कभी-कभी तो आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं, वहीँ कुछ लोग अपने काम को इतनी प्राथमिकता देने लगते हैं कि परिवार के महत्व को ही पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं।  एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में वे ना तो अपने माता-पिता को समय दे पाते हैं और ना ही अपने वैवाहिक जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सक्षम होते हैं। 

ऐसे में एक तरफ जहाँ  परिवार के लोगों की वैयक्तिक जरूरतों के साथ सामूहिकता का तादात्मय परिवार को एक साथ रखने के लिए बेहद जरूरी है, वहीँ  परिवार और काम के बीच का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के लिए उसका परिवार बहुत महत्वपूर्ण होता है। व्यक्ति के जीवन को स्थिर  और खुशहाल बनाए रखने में उसका परिवार बेहद अहम भूमिका निभाता है।  


- आकांक्षा यादव 
कालेज में प्रवक्ता के बाद साहित्य,लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में प्रवृत्त।
www.shabdshikhar.blogspot.com/ 

अब समय है एक विराम का, मिलती हूँ एक छोटे से विराम के बाद.....

4 comments:

  1. आकांक्षा जी को इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए साधुवाद !
    रश्मि जी का कैप्शन बहुत ही संतुलित और प्रभावशाली है । स्त्री विषयक चिंतन में रश्मि जी का यह चिंतन एक अभिलेख की तरह माना जायेगा ।

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